कारपोरेट लोन में बड़े रिस्ट्रक्चरिंग की तैयारी

कारपोरेट लोन में बड़े रिस्ट्रक्चरिंग की तैयारी

नई दिल्ली [ महामीडिया ] कोविड-19 ने देश की इकोनोमी को जिस तरह से प्रभावित किया है उसे देखते हुए कारपोरेट लोन में बड़े रिस्ट्रक्चरिंग करने को लेकर गंभीर चर्चा का दौर शुरु हो गया है। शुक्रवार को भारतीय रिजर्व बैंक  के निदेशक बोर्ड की बैठक में भी यह एक अहम मुद्दा रहा। देश के Covid-19 की जद में आने के बाद आरबीआइ बोर्ड की यह पहली बैठक थी जो वर्चुअल हुई और इसकी अध्यक्षता गवर्नर डॉ. शक्तिकांत दास ने की। अभी इस बारे में वित्त मंत्रालय और आरबीआइ के बीच कुछ और विमर्श होगा जिसके बाद अंतिम फैसला किया जाएगा। संभावना इस बात की है कि सावधि कर्ज भुगतान में मोराटोरियम की अवधि की समाप्ति (31 अगस्त, 2020) से पहले लोन रिस्ट्रक्चरिंग की घोषणा होगी।वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को यह संकेत दिया था कि सरकार लोन रिस्ट्रक्चरिंग को लेकर गंभीर है और सभी पक्षों से बातचीत की जा रही है। उन्होंने गैर एमएसएमई सेक्टर को कर्ज चुकाने में आ रही समस्याओं की बात स्वीकार की थी और उसी संदर्भ में आगे कदम उठाने के संकेत दिए थे। जानकारों का कहना है कि सरकार व आरबीआइ बैंकों की तरफ से लागू किये गये मौजूदा मोराटोरियम को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मामले में फैसले की भी प्रतीक्षा कर रहे हैं। आरबीआइ की तरफ से बताया गया है कि ''बोर्ड को गवर्नर और डिप्टी गवर्नर की तरफ से कोविड की वजह से वैश्विक व घरेलू इकोनोमी के प्रभावित होने के तमाम पक्षों के बारे में बताया गया। देश के फाइनेंसिएल सेक्टर पर पड़ने वाले असर और नियमन संबंधी चुनौतियों के बारे में भी विस्तार से चर्चा की गई है। बैठक में जुलाई, 2020 से जून, 2021 के दौरान आरबीआइ की तमाम गतिविधियों को लेकर भी विमर्श हुआ है।''बैंकिंग सेक्टर के सूत्रों ने बताया है कि उनकी तरफ से वित्त मंत्रालय के सामने यह स्पष्ट कर दिया गया है कि एक बार लोन रिस्ट्रक्चरिंग के बगैर मौजूदा वित्तीय संकट से निपटना मुश्किल होगा। बैंक मान रहा है कि चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही से बड़ी संख्या में कारपोरेट लोन डिफॉल्ट हो सकते हैं। इससे उनके फंसे कर्जे का स्तर का बढ़ेगा और इसके लिए अतिरिक्त राशि समायोजित करने से उनकी वित्तीय स्थिति भी डांवाडोल होगी। इससे बचने का एक रास्ता यह है कि जिन कंपनियों पर कोविड-19 का असर है उन पर बकाये कर्ज के भुगतान के लिए नए सिरे से समय दिया जाए। इसे ही लोन रिस्ट्रक्चरिंग कहा जाता है। इसके तहत बैंकों में एनपीए के स्तर को बढ़ने से रोका जा सकेगा और प्रभावित कंपनियों को भी राहत मिलेगी। 
 

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