प्रतिक्षा का प्रतिमान

भोपाल (महामीडिया) वैदिक सनातन परम्परा आज पुन: गौरवान्वित अनुभव कर रही है। सनातन का अर्थ है- शाश्वत सदैव रहने वाला अर्थात् जिसका न आदि हो न अंत। ऋग्वेद कहता है 'यह पथ सनातन का है और समस्त देवता और मनुष्य इसी मार्ग से उत्पन्न हुए हैं और अपनी प्रगति की है। हे मनुष्य आप अपने उत्पन्न होने की अवधारणा अपनी माता को विनष्ट न करे।' (ऋग्वेद-3-18-1)। प्राचीन वैदिक सनातन धर्म में गाणपत्य, शैवदेव, वैष्णव, शाक्त और सौर नामक पांच समुदाय हुआ करते थे। और यह गणेश, शिव, विष्णु, शक्ति एवं सूर्य की उपासना किया करते थे। सभी मानते थे कि एक सत्य की विभिन्न मान्यताएं है। परन्तु फिर भी मतभेद हुआ करते थे और आपसी वैमनस्य बना रहता था ऐसी परिस्थितियों में सम्प्रदायों के धर्मगुरू अपने-अपने अनुयायियों को समझाते थे कि हम सभी एक हैं। आज जब राम जन्मभूमि पर आये सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से पहले व बाद में भी यही स्थिति निर्मित हुई। सभी धर्मगुरुओं ने एक साथ कहा कि हम सब एक है। समय अवश्य बदल गया किंतु समस्यायों के निराकरण की प्रकिृया वही सनातनी है कि हम सब एक हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के एक प्राध्यापक और मुख्यधारा के उदारवादी बौद्धिक का कहना है कि सर्वोच्च अदालत के द्वारा दिया गया निर्णय भारत के एक हिंदू राष्ट्र के निर्माण की दिशा में उठाया गया सबसे बड़ा कदम है। पता नहीं, वो भारत-देश को कितना समझते हैं, किंतु जहां तक मैं भारत को जानता हूं, मेरा मानना है कि भारत कभी वैसा आक्रामक हिंदू राष्ट्र ना बने, जैसा पाकिस्तान एक इस्लामिक राष्ट्र है, इस दिशा में राम मंदिर का निर्माण एक महत्वपूर्ण निर्णय सिद्ध होगा, क्योंकि एक यह निर्णय हिंदू मानस में सदियों से पैठे आक्रोश, अपमान और अन्याय की भावना को निर्मूल करने में जितनी दूर तक जाएगा, उतना कोई और निर्णय कभी नहीं जा सकता था। इससे जहर की गांठ खुल जाएगी, मवाद निकल जाएगा। यह निर्णय सामुदायिक सौहार्द की अनिवार्य पीठिका सिद्ध होगा और पहले ही सहिष्णुता की भावना से जी रहे बहुसंख्यकों को और सदाशय व विनम्र बनाएगा। सम्पूर्ण विश्व में भारत में शांति बने रहना प्रसन्नता का विषय है। क्योंकि विश्व में भारत जनसंख्या की दृष्टि से दूसरा तथा क्षेत्रफल की दृष्टि से सांतवां राष्ट्र है। परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी सदैव कहा करते थे कि ज्यों-ज्यों भावातीत ध्यान योग शैली का अभ्यास विश्व में बढ़ता जाएगा उसके प्रभाव से उसके अभ्यासकर्ता की चेतना का स्तर महनीय होता जावेगा। सामूहिक भावातीत का प्रभाव आस-पास के वातावरण पर भी पड़़ता है क्योंकि हम प्रकृतिमय हो जाते हैं। एक ऐसी स्थिति जहां अनुभव होता है हम सब एक हैं और एक दूसरे पर निर्भर हैं। अर्थात आनंद, शांति और सम्पन्नता सभी के लिए स्थाई है। इसी केन्द्रीय भाव को मूल में रखकर परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने धरती पर स्वर्ग की कल्पना को साकार करने के लिए वैश्विक रूप से लगभग 124 राष्ट्रों में भावातीत ध्यान योगी शैली का प्रचार-प्रसार किया एवं ध्यान शिक्षकों को प्रेरित तथा प्रशिक्षित किया। आज भलेही परमपूज्य महर्षि जी देहिक रूप से हम सब के बीच नहीं हैं किन्तु आध्यात्मिक रूप से वह हम सभी का मार्गदर्शन कर रहे हैं। उसी का यह परिणाम है कि भारत में पुन: भारतीयता का प्रस्फुटन हुआ है। जो हमारे संविधान की आत्मा है। अनेकता में एकता इस पुण्य समय में समस्त भावातीत ध्यान योग-शैली का नियमित अभ्यास करने वाले समस्त अभ्यस्थों को शुभ्कामनायें प्रेषित करता हूं और यह आशा करता हूं कि इसी प्रकार महर्षि परिवार समस्त विश्व में आनंद प्रदान करता रहे। 'अयोध्या' अर्थात ऐसा स्थान जहां पर युद्ध न हो और एक ऐसा नगर जिसे युद्ध में जीता न जा सके। रामायण के अनुसार 'अयोध्या' राजा मनु द्वारा सरयू के तट पर बसाया गया एक पवित्र नगर है। वेदों में अयोध्या को ईश्वर का नगर वर्णित किया गया है। अयोध्या मथुरा, माया, काशी, कांची, आवन्तिका और द्वारिका मोक्षदायिका हैं। पुराणों में इसे सात मोक्षदायिनि नगरों में प्रथम स्थान दिया गया है।

जय गुरुदेव, जय महर्षि

- -ब्रह्मचारी गिरीश

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