महर्षि महेश योगीः एक त्रिवेणी

भोपाल (महामीडिया) प्रथम शब्द- महर्षि शब्द से स्पष्ट है- महा+ऋषि अर्थात श्रेष्ठ ऋषि (सर्वोच्च ऋषि)। वे व्यक्ति जो अपने सांसारिक रूप से आवश्यक कर्म करते हुए दर्शन के दोनों पक्षों 'आरण्यक और उपनिषद' के अनुसार उच्चतर स्तर को पाने के लिए ध्यान, चिन्तन और साधना करते हुए आध्यात्म पथ पर पूर्णता प्राप्त कर सामज सेवा में जुट जाते हैं, उन्हें "महर्षि" कहा जाता है।
मध्य शब्द- महेश अर्थात सक्षम, हंसमुख, ध्यान, भाग्यशाली, मैत्रीपूर्ण, आधुनिक, रचनात्मक, स्वैच्छिक, उदार, सक्रिय, गंभीर, यह व्यक्ति की चेतना के अन्तयार्मी हैं। आत्मज्ञानी है और महेश शब्द के पर्यायवाची है।
अंतिम शब्द- योगी वह है, जो आसक्ति को त्याग कर सिद्धि एवं असिद्धि में समान बुद्धि रखते हुए, अपने कर्तव्यों का पालन करे। समत्व ही योग है और उसका पालन करनेवाला, योगी। ऐसा मनुष्य पाप एवं पुण्य, दोनों को, इसी लोक में त्याग देता है और कर्म-बंधन से मुक्त हो सकता है। गीता के अनुसार जो व्यक्ति इंद्रियों को वश में कर, अनासक्त भाव से कर्म करने की क्षमता रखता है, वह योगी है। कृष्ण ने कहा है कि योगस्थ या योगारूढ़ व्यक्ति वह है जो स्थितप्रज्ञ है और जो नींद में भी जागा हुआ रहता है। योग का मूल मंत्र है चित्त वृत्तियों का निरोध कर मन के पार जाना।
जहां त्रिवेणी हैं वहीं पर तीर्थ है। त्रिवेणी को संगम भी कहते हैं। महर्षि की त्रिवेणी ज्ञान की त्रिवेणी है। ज्ञान और अज्ञान में इतना ही भेद है कि बीच में एक भ्रम का परदा लगा हुआ है। जहां परदा खुल गया, अज्ञान समाप्त हो गया, ज्ञान की ज्योति जग गई, मनुष्य जो अपने आपको भूला हुआ था, चेतना में आ गया कि मैं कौन हूं? मेरा लक्ष्य क्या है? मैं क्या करने आया था और क्या करने लगा? मैं क्या लेकर आया था और मुझे क्या लेकर जाना है? इस प्रकार अज्ञान रूपी अंधकार में फंसा हुआ जीव प्रकाश होते ही सत्य को देखने लगता है। यह बात अत्यंत विचारणीय है कि- हे मनुष्य, तू हंस स्वरूप हैं। जब तक तू कर्तापन के भ्रम में फंसा हुआ है कि तू नर है या नारी, वृद्ध है या युवा है, पूजा- पाठ, क्रिया-कर्म, गीता-भागवत, रामायण, वेद शास्त्र, उपन्यास जितना चाहे पढ़ लो किंतु ज्ञान के बिना सब अधूरा है क्योंकि ज्ञान में ही सब लय है। अगर ज्ञान नहीं है तो सब कुछ अधूरा-सा ही लगेगा। इसलिए हे मनुष्य! तू चेतना है, पहले अपने चेतना में आ जा। चंचल मन से चंचल रहते - रहते मन की शांति होने तक - ध्यान कहलाता है और जब पूर्ण शांत हो जाय तो समाधि कहलाती है। महर्षि जी का कहना है कि ध्यान मन की दौड़ती स्थिति को धीमे चलाना, धीमे चलाने से मन को विश्राम देना और सुला देना अर्थात पूर्ण शांत कर देना, साधारण भाषा में यही ध्यान की प्रक्रिया कहलाती है। इस प्रकार ध्यान के द्वारा हम अपने मन को शांत कर समाधि को प्राप्त करते हैं। हम हमारा संबंध योगिक क्षेत्र से होता है जिससे हमारा संबंध अनंतता से, आत्मा से स्थापित हो जाता है। ध्यान के माध्यम से हम संकल्प- विकल्प से परे होकर शांत स्थिति को प्राप्त होतें हैं हमें गहन विश्राम प्राप्त होता है। जिससे हमे शारिरिक स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है। हमारा मन फिर मन न रहकर आत्म स्वरूप हो जाता है। आत्मा से तात्पर्य है कि पूर्ण ज्ञान की जागृति होना जिससे हमें प्रकृति का पूर्ण सहयोग प्राप्त हो जाता है। प्रकृति के सहयोग से तात्पर्य यह है कि हमारी संपूर्ण इच्छाओं, कामनाओं की पूर्ति होना। कुछ लोग आसन-प्राणायाम का अभ्यास करे बगैर भी उस स्थिति को प्राप्त कर लेते हैं, जिसको योग में समाधि कहा गया है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार तो योग में प्रवेश करने की भूमिका मात्र है, इन्हें साधकर भी कई लोग इनमें ही अटके रह गए, लेकिन साहसी हैं वे लोग, जिन्होंने धारणा और ध्यान का उपयोग तीर-कमान की तरह किया और मोक्ष नामक लक्ष्य को भेद दिया। वेदों में जड़बुद्धि से बढ़कर प्राणबुद्धि, प्राणबुद्धि से बढ़कर मानसिक और मानसिक से बढ़कर 'बुद्धि' में ही जीने वाला श्रेष्ठ कहा गया है। बुद्धिमान लोग भुलक्कड़ होते हैं ऐसा जरूरी नहीं और स्मृतिवान लोग बुद्धिमान हों यह भी आवश्यक नहीं, किंतु उक्त सबसे बढ़कर वह व्यक्ति है जो विवेकवान है, जिसकी बुद्धि और स्मृति दोनों ही दुरुस्त हैं। उक्त विवेकवान से भी श्रेष्ठ होता है वह व्यक्ति जो मन के सारे क्रिया-कलापों, सोच-विचार, स्वप्न-दु:ख से पार होकर परम जागरण में स्थित हो गया है। ऐसा व्यक्ति ही मोक्ष के अनंत और आनंदित सागर में छलाँग लगा सकता है। अपनी विश्व यात्रा की प्रारंभ 1959 में करने वाले महर्षि योगी के दर्शन का मूल आधार था, ‘जीवन परमआनंद से भरपूर है और मनुष्य का जन्म इसका आनंद उठाने के लिए हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति में ऊर्जा, ज्ञान और सामर्थ्य का अपार भंडार है तथा इसके सदुपयोग से वह जीवन को सुखद बना सकता है।' वर्ष 1990 में हॉलैंड के व्लोड्राप गाँव में ही अपनी सभी संस्थाओं का मुख्यालय बनाकर वह यहीं स्थायी रूप से बस गए और संगठन से जुड़ी गतिविधियों का संचालन किया। सम्पूर्ण विश्व में लगभग करोड़ों अनुयाईयों के माध्यम से उनकी संस्थाओं ने भावातीत ध्यान-योग शैली का प्रचार-प्रसार किया।
।। जय गुरुदेव, जय महर्षि।।
 

- -ब्रह्मचारी गिरीश

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