अजीत जोगी : छात्र नेता से मुख्यमंत्री तक का सफर

ब्यूरोक्रेट से राजनेता बन मुख्यमंत्री तक का सफर सफलतापूर्वक तय करने वाले अजीत जोगी के निधन से छत्तीसगढ़ की राजनीति में एक ठहराव सा आ गया हैl  हलांकि उनकी हालत पिछले कई महीनों से बेहद खराब थी और वे सक्रिय राजनीति से दूर थेIजोगी का जन्म बिलासपुर के पेंड्रा में 29 अप्रैल, 1946 को हुआ था। बेहद पिछड़े आदिवासी क्षेत्र में जन्म लेने के बावजूद उन्हें तरक्की की राह चुनी। बचपन में वे नंगे पैर स्कूल जाया करते थे। पिता के ईसाई धर्म अपनाने के बाद उन्हें मिशनरी से मदद मिली। भोपाल से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने कुछ समय तक प्रोफेसर की नौकरी की। 1968 में आइपीएस बने और दो साल बाद आइएएस बने। अविभाजित मध्यप्रदेश में 13 वर्ष तक कलेक्टरी की, वह भी इंदौर समेत कई बड़े जिलों में।
1986 में राजीव गांधी के कहने पर अजीत जोगी ने कलेक्टर की नौकरी छोड़ी और कांग्रेस से राजनीतिक सफर की शुरुआत की। जोगी 1986 से 1998 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। इस दौरान कांग्रेस में वे अलग-अलग पदों पर काम करते रहे। 1998 में रायगढ़ से लोकसभा सांसद चुने गए।
जोगी, अर्जुन सिंह को गॉडफादर मानते थे I  यह भी कहा जाता है अर्जुन सिंह ने राजीव को जोगी का नाम सुझाया था। 1993 में दिग्विजय सिंह के सीएम बनने का नंबर आया तो जोगी ने भी अपनी दावेदारी पेश कर दी। उनकी दावेदारी चली नहीं, लेकिन जोगी ने दिग्विजय सिंह से दुश्मनी जरूर मोल ले ली। कहते हैं न राजनीति में लंबे समय तक कोई दोस्त या दुश्मन नहीं होता है। अजीत जोगी और दिग्विजय के साथ भी यही हुआ। जोगी को विधायक दल का नेता बनाने के लिए दिग्विजय सिंह ने भरपूर समर्थन दिया। 31 अक्टूबर 2000 को अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बन गए।
जोगी जब तक कांग्रेस में रहे उन्हीं की तूती बोलती रही। संगठन में पदाधिकारी तय करने से लेकर पंचायत से लेकर विधानसभा और लोकसभा चुनाव में टिकट जोगी की ही मर्जी से फाइनल होते थे। विरोधी खेमा को यह पसंद नहीं आता था, लेकिन चाहकर भी वे कुछ नहीं कर पाते थे।
जोगी ने एक ही जीवन में सब कुछ हासिल किया -- इंजीनियर, वकील, प्रोफेसर, आइपीएस, आइएएस, राज्यसभा सदस्य और मुख्यमंत्री का पद I यद्यपि उनका जीवन बेहद उतार-चढाव वाला और विवादों से भरा रहाl इसके बावजूद हमेशा जीतते रहना ही उनका स्वभाव थाl
 

- प्रभाकर पुरंदरे

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