आयुर्वेद एक वरदान

भोपाल [महामीडिया] देवता एवं दैत्यों के सम्मिलित प्रयास के शांत हो जाने पर समुद्र में स्वयं ही मंथन चल रहा था जिसके चलते भगवान धन्वंतरि हाथ में अमृत  का स्वर्ण कलश लेकर प्रकट हुए। विद्वान कहते हैं कि इस समय अनेक प्रकार की औषधियां उत्पन्न हुईं और उसके बाद अमृत निकला। भगवान धन्वंतरि को आयुर्वेद का जन्मदाता माना जाता है। उन्होंने विश्वभर की वनस्पतियों पर अध्ययन कर उसके अच्छे बुरे प्रभाव-गुण को प्रकट किया। धन्वंतरि के हजारों ग्रंथों में से अब मात्र धन्वंतरि संहिता ही पाई जाती है, जो आयुर्वेद का मूल ग्रंथ है। आयुर्वेद के आदि आचार्य सुश्रुत मुनि ने धन्वंतरिजी से ही इस शास्त्र का उपदेश प्राप्त किया था। बाद में चरक आदि ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। आयुर्वेद विश्व की सबसे प्राचीनतम चिकित्सा पद्धति है जो की अनादि एवं शाश्वत है। जो शास्त्र या विज्ञान आयु का ज्ञान कराये उसे आयुर्वेद की संज्ञा दी गयी है। ऋग्वेद जो की मनुष्य जाति के लिए उपलब्ध प्राचीनतम शास्त्र है, आयुर्वेद की उत्पत्ति भी ऋग्वेद के काल से ही है। ऋग्वेद के अतिरिक्त अथर्ववेद में भी आयुर्वेद का उल्लेख हैं। आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि सृष्टि की उत्पत्ति के समय ब्रह्मा जी ने आयुर्वेद का स्मरण किया तथा इस ज्ञान को उपदिष्ट किया। चरक संहिता के अनुसार आयुर्वेद का प्रयोजन है स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य का संरक्षण करना एवं यदि व्यक्ति रूग्ण हो जाता है तो  उसकी चिकित्सा करना। आयुवेर्दानुसार, स्वस्थ व्यक्ति के मानदंड हैं- ‘वह व्यक्ति जिसके शारीरिक एवं मानसिक दोष साम्य हों तथा परिणामतः शरीरस्थ अग्नि साम्य हो एवं उनसे उत्पन्न धातु निर्माण प्रक्रिया भी साम्य हो तथा फलस्वरूप परिपाचित मल निष्कासन प्रक्रिया भी साम्य होगी उस व्यक्ति की आत्मा, इन्द्रिय तथा मन भी प्रसन्न होगा’। स्वस्थ प्रयोजनार्थ सभी ग्रंथो में दिनचर्या, ऋतुचर्या, रात्रिचर्या, रसायन चिकित्सा, सद्धत्त पालन, योगाभ्यास एवं त्रयोपस्तम्भ (आहार, निद्रा, ब्रह्मचर्य) का सम्यक पालन करने का निर्देश दिया है इन सभी उपायों के सम्यक पालन से व्यक्ति न मात्र शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक एवं भावनात्मक रूप से स्वस्थ रहता है अपितु पूर्ण उजार्वान एवं रोगों से मुक्त होकर पूणार्यु शतायु का भोग करता है। इसके विपरीत मिथ्याहार विहार के सेवन से पन्च भूतात्मा शरीर की साम्यावस्था का हास हो जाता है फलतः शरीरस्थ दोष, धातु एवं मल दूषित हो जाते हैं एवं रोगों व्याधि का प्रादुर्भाव होता है। इससे जीवन शैली आधारित, ऋतु जन्य रोग तथा जीवाणु एवं विषाणु जनित रोग भी प्रभावी होने लगते हैं अतः आयुर्वेदिय स्वस्थवृत्त के सिद्धान्त देहस्थ दोष, धातु आदि के साम्यावस्था को बनाये रखने के निमित्त से ही वर्णित हैं सभी ग्रंथो में आयुर्वेद के आठ अंगों का वर्णन किया गया है कायचिकित्सा, बाल रोग, उध्र्वाग चिकित्सा, शल्यचिकित्सा, विष चिकित्सा, जरा चिकित्सा एवं वाजीकरण चिकित्सा का अष्टांग आयुर्वेद के रूप में वर्णन किया है। स्वस्थवृत्त एवं योग भी आयुर्वेद के अभिन्न अंग है जो की वर्तमान के परिपेक्ष में  काफी महत्वपूर्ण सिद्ध हो रहा है पूर्वोक्त स्वस्थ प्रयोजनार्थ उपायों का विस्तृत वर्णन स्वस्थवृत्त के सिद्धांत के रूप में उपलब्ध है। ये सिद्धान्त न मात्र आधुनिक जीवन शैली से होने वाले रोग अपितु जीवाणु एवं विषाणु जनित रोगों के निवारण एवं उन्मूलन में सहायक है आयुर्वेद की चिकित्सा रोग सामान्य चिकित्सा के बारे में न बता कर ‘पुरूष पुरूष वीक्ष्यं’ के सिद्धांत की अनुपालन का निर्देश देती है और ये चीज आयुर्वेद को सभी चिकित्सा शास्त्रों से अलग रूप में प्रदर्शित करती है। आज समूचे विश्व में असम्यक जीवन पद्धति के कारण नित नये  रोगों का प्रादुर्भाव हो रहा है। समस्त विश्व नई महामारियां झेल रहा है जो कि मानव जाति के अस्तित्व के लिए संकट हैं। इस परिपेक्ष में आयुर्वेदिक आहार एवं विहार का सम्यक सेवन ही समस्त मानव जाति के स्वास्थ्य तथा भविष्य के लिए लाभदायक है, अतः मानव आयुर्वेद के उपदेशों का पालन कर स्वस्थ ओजपूर्ण, ऊर्जा सम्यक कार्य कुशल रहकर पूर्ण आयु का भोग तथा फलस्वरूप धर्म, अर्थ, काम मोक्ष का भागी बन सकता है तथा स्वस्थ व्यक्ति ही एक स्वस्थ समुदाय एवं स्वस्थ विश्व का निर्माण करने में सक्षम होता है।

जय गुरुदेव ,जय महर्षि 

- ब्रह्मचारी गिरीश

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