भागवत की चिंता: चाल ,चरित्र और चेहरे .......?

भोपाल [ महामीडिया ]   केन्द्र सरकार व उस पर सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के साथ राष्ट्र के हिन्दूवादी संगठनों के मौजूदा परिवर्तित चाल, चरित्र और चेहरे को लेकर यदि आज कोई सबसे अधिक चिंतित है, तो वे हैं राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत उन्होंने भोपाल आकर इन सभी संगठनों को तत्संबंधी नसीहतें भी दी। भोपाल के तीन दिनी कार्यक्रम के दौरान संघ से सम्बद्ध छत्तीस अनुषांगिक संगठनों के साथ भारतीय जनता पार्टी के दिग्गज भी शामिल हुए। पूरे तीन दिवसीय कार्यक्रम के दौरान भागवत काफी चिंतित व उदास दिखाई दिए, उनके कचेहरे से सदैव झलकने वाली मोहक मुस्कान इस बार गायब थी। उनकी सबसे बड़ी चिंता नरेन्द्र मोदी का चमत्कार क्षीण होना तो थी ही साथ ही वे देश के मौजूदा माहौल तथा इस दौरान हिन्दूवादी संगठनों की निष्क्रिय भूमिका को लेकर, जिसका उन्होंने अपने भाषणों के दौरान जिक्र भी किया, को लेकर थी। वे यह समझ नहीं पा रहे थे ऐसी प्रतिकूल बनती जा रही परिस्थिति को अपने अनुकूल कैसे बनाया जाए? यहां गहन विचार-मंथन के दौरान उन्होंने इन्हीं चिंताओं पर चिंतन किया तथा अनुषांगिक संगठनों व भाजपा के लोगों से मौजूदा चाल, चरित्र व चेहरे में यथाशीघ्र परिवर्तन लाने की अपील की। यहां यह उल्लेखनीय है कि नरेन्द्र भाई मोदी के अब तक के साढ़े पांच वर्षीय शासनकाल में संघ व संघ प्रमुख को कोई खास महत्व नहीं दिया जा रहा था, यही नहीं बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव के समय तो भाजपा ने अपनी हार का ठीकरा ही संघ प्रमुख के सिर पर यह कहते हुए फोड़ दिया था कि आरक्षण संबंधी भागवत के बयान के कारण बिहार में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा व नीतीश कुमार के साथ मिली-जुली सरकार बनानी पड़ी। उसके बाद जनसंख्या संबंधी भागवत के बयान को भी सवालों के कटघरे में खड़ा किया गया। किंतु जब पिछले साल मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ व उसके बाद महाराष्ट्र में भाजपा को सत्ता से हाथ धोना पड़ा, तब मोदी सरकार व भाजपा ने भागवत जी व उनके संघ को महत्व देना शुरू किया और अब भाजपा का नेतृत्व भागवत जी के सामने नतमस्तक है और भागवत जी ने स्वयं को केन्द्र सरकार व भाजपा का संरक्षक मानकर इन दोनों की चिंता करना शुरू कर दिया और वह भी इस हद तक कि वे खुद अपनी चाल व चेहरे की चमक खोते जा रहे हैं, चरित्र में कोई खास फर्क नहीं है। यह एक हकीकत भी है कि २०१४ में नरेन्द्र भाई मोदी के प्रधानमंत्री बनने के कुछ ही अर्से में भारत के कितने राज्यों पर भाजपा का कब्जा था, और आज कितने राज्यों पर है? यह किसी से भी छुपा हुआ नहीं है। जम्मू-कश्मीर, मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र व झारखंड जैसे दम-खम वाले राज्य भाजपा के हाथों से फिसल गए। अब अगले सप्ताह उस दिल्ली विधानसभा के भी परिणाम आने वाले हैं, जिस पर फतह करने के लिए नरेनद्र मोदी व अमित शाह ने कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी है, एड़ी से चोटी तक का जोर लगा दिया है, फिर भी चुनाव परिणाम के पूर्वानुमान भाजपा के खिलाफ ही जा रहे हैं, भाजपा ने अब डूबती नाव को उभारने के लिए केन्द्र सरकार के माध्यम से राममंदिर ट्रस्ट का फैसला आ रहा  है, इस उम्मीद में कि इससे हिन्दू वोटर कुछ प्रभावित होगा, किंतु दिल्ली का कहना है कि ऐसे दुष्प्रयासों से परिणाम प्रभावित होने वाला नहीं है और परिणाम वही आने वाला है, जिसकी कि वहां उम्मीद की जा रही थी। इन्हीं सब स्थिति-परिस्थितियों को लेकर संघ्ज्ञ प्रमुख काफी चिंतित हैं, उन्होंने कई बार व्यक्तिगत चर्चाओं में यह उजागर भी किया है कि अब हिन्दूवादी राजनीतिक दलों व संगठनों के लोगों में दायित्व व कर्तव्यों के साथ संगठनों के उद्देश्यों को हासिल करने के प्रति यह समर्पण भाव व निष्ठा नहीं रहे जो आज से कुछ वर्ष पहले तक इनके दिल-दिमाग में थे। अब अनुषांगिक संगठनों के लोगों में भी राजनेताओं जैसी व्यक्तिगत स्वार्थ व पद लिप्सा की भावना समाहित हो गई है, इसलिए उनकी प्राथमिकताएं बदल गई हैं और वे संगठन के बजाए व्यक्तिगत हितों को ही ज्यादा, महत्व देने लगे हैं। इसलिए अब भागवत जी की धारणा यह हो गई है कि अब इन संगठनों से नए आम-आत्मसमर्पित सदस्यों की भर्ती कर उनमें समर्पण भाव पैदा करेंगे और फिर नए सिरे से नई दिशा में प्रयास शुरू कर भाजपा सहित हिन्दूवादी, संगठनों में नई चेतना जागृत करने का प्रयास करेंगे और इन्हें अतीत का स्वरूप प्रदान करेंगे। डॉ. भागवत ने अब अपने आपको इन्हीं प्रयासों में झोंक दिया है और अब इसीलिए उन्होंने हर कहीं इसी की अलख जगाना शुरू कर दिया है, अब वे अपने इस संकल्प की पूर्ति में कहां तक सफल हो पाते हैं और मौजूदा सरकार व संगठन पर विराजित महान हस्तियां उन्हें कितना सकारात्मक सहयोग प्रदान करती हैं? यह भविष्य के गर्भ में है।

ओम प्रकाश मेहता 

- ओम प्रकाश मेहता

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