मन और मस्तिष्क का संवाद है ‘‘गीता’’

भोपाल (महामीडिया) मानव जीवन में प्रत्येक व्यक्ति कभी न कभी ऐसी परिस्थिति के बीच खड़ा होता है और उस स्थिति में उसका सर्वोच्चय निर्णय के लिए वह स्वयं से वाद-विवाद करता यह ठीक उसी प्रकार होता है जिस प्रकार कुरुक्षेत्र में सब कुछ थम-सा गया था मात्र कृष्ण और अर्जुन संवाद कर रहे थे। सम्भवत: मन और मस्तिष्क के इस द्वन्द में हमें चेतना का स्मरण नहीं होता। वह चेतना ही कृष्ण है जो अर्जुन को अपने मार्ग पर तठस्षठ रहने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित करते हुए निडर बनाती है यही तो आत्म ज्ञान है। जब हम स्वयं को ब्रह्म् मानते हैं तभी तो उस ब्रह्म् के समान हम निर्णय कर पाते हैं क्योंकि वह निर्णय काम, क्रोध, मद, लोभ, भय से अभिन्न, अछूता प्राकृतिक होता है। यह वही चेतना है जब हम अपने कर्म और कर्मफल में से कर्म का चयन करते हैं। चाहे परिणाम जो भी हो। आज का मनुष्य जो सुखी जीवन की बड़ी इच्छा लिए खड़ा है, उसका मार्ग उसके कर्म में ही निहित है और उसे अपने कर्म के रहस्य को समझना होगा जो कि गीता के कर्मयोग के माध्यम से ही सम्भव है। इसमें भगवान श्री कृष्ण ने मनुष्य को बिना फल चिंता के कर्म करने का उपदेश दिया है क्योंकि जब मनुष्य बिना फल प्राप्ति के अपना कार्य कुशलता पूर्वक करता है, तब मनुष्य की सारी शक्तियां केन्द्रित होकर एकात्म हो जाती है तथा आध्यात्मिक ऊर्जा उतपन्न होती है क्योंकि बिना आध्यात्मिक ऊर्जा के मनुष्य अपने कर्म को श्रेष्ठ एवं उपयोगी नहीं बना सकता और इस ऊर्जा से जो कर्म होता है, वो मात्र मानव मात्र के लिए ही शुभ नहीं होता वरन पूरे अस्तित्व के लिए हितकारी होता है। आवश्यकता है गीता के कर्मयोग के रहस्य को जानकर मानव जीवन को आनन्दित बनाया जाये। आज जीवन आधुनिकता से परिपूर्ण है। मनुष्य का जीवन विज्ञान के सम्पूर्ण विकास के साथ जीवन की सभी उच्चकोटि सुविधाओं से परिपूर्ण लगता है। परन्तु कुछ ऐसे विकसित देश या कुछ विकसित होने के समीप देशों की बात करें तो यहां के लोग सभी आधुनिक सुविधाओं से सम्पन्न हैं साथ ही उतने संताप से भरे हुए हैं, वो अपने जीवन में सुख सुविधाओं की चाहत में सुख और आनंद से उतना ही दूर होता जा रहे हैं। यदि हम पश्चिम की दृष्टि से देखें तो मनुष्य ने विज्ञान के सहारे जो उन्नति की है और आज सम्पूर्ण विश्व इसका अनुसरण कर रहा है। हमने बाहरी तल पर अर्थात भौतिकतावादी दुनिया में किसी लोभ के लालच में दूसरो का शोषण करते हुए एक प्रतियोगिता के वातावरण में कुछ पाने का प्रयास किया है। प्राप्त आंकड़ों से पता चलता है कि आज अमेरिका सबसे विकसित देश है जो कि विज्ञान की प्राप्ति करने में विश्व में उच्च स्थान बनाये हुए है किंतु इस देश के नागरिक सबसे अधिक दु:खी है, जिन्हें सोने के लिए नींद की गोलियां लेनी पड़ती हैं। इतनी सुविधाओं से युक्त जीवन होने पर भी आज मनुष्य बैचेनी, दु:ख और संताप को झेल रहा है और विचित्र स्थिति में जाकर खड़ा हो गया है। क्या मनुष्य से कहीं चूक हो रही है? ये ऊपर कुछ प्रश्न हैं जो हमें सोचने पर मजबूर कर रहे हैं । यदि हम श्रीकृष्ण जी की गीता में अध्यात्म को देखें तो इसमें बहुत से मार्ग हैं जो मानवता को प्रगति की ओर ले जाते हैं जैसे ज्ञान योग, भक्ति योग और कर्मयोग गीता में जो कर्मयोग है ये मार्ग एक ऐसा मार्ग है, जो बिना कुछ किये हुए अनायास ही मनुष्य से जुड़े हुए हैं। आवश्यकता है तो बस इसके रहस्य को भीतर से समझने की और इसको समझकर अपने हर कार्य में उपयोग करने की, जिसकी सहायता से मनुष्य आनन्द को प्राप्त करे और अपने कार्य को सम्पूर्णता देते हुए जब मनुष्य अपने मन को आनन्दित बनाएगा तभी वह श्रेष्ठ कार्य कर पायेगा। अध्यात्म हमें सीधे मन से जोड़ता है। अध्यात्म हमारी चेतना को जागृत करते हैं। इसका लाभ सभी प्रकार के लोगों को समान रूप से मिलता है चाहे वह महिलाओं के घर के कार्य हों, किसान खेतों में हों या फिर मजदूर कारखानों में हों और नेता सबको अपने मन की बात समझा रहे हों। अत: जो विकास होगा वह आसक्ति रहित मानवता का विकास होगा तथा व्यर्थ के दु:ख और संतापों से रहित होगा क्योंकि उसने अपने मन को नियंत्रित कर लिया है और उसका प्रत्येक कार्य ही पूजा बन गया है। मनुष्य जितना अंत:करण की ओर से शक्तिशाली होगा उतना ही बाहरी संसार की आरे से विज्ञान के साथ मिलकर नई ऊंचाइयां छुएगा। कहने का अभिप्राय है कि धर्म और विज्ञान के मिलन से एक नए समाज का निर्माण होगा। महर्षि महेश योगी जी ने गीता का रहस्य ‘‘भावातीत ध्यान योग-शैली’’ में खोजा और उसका विस्तार सम्पूर्ण विश्व में करते हुए अनेक मानवों के जीवन को आनन्दित किया। प्रेम भारती जी ने बहुत सामान्य भाषा में अपनी पुस्तक में गीता सरल एवं प्रत्येक व्यक्ति के लिये लिखी है जो गीता को समझने में रामबाण का कार्य करगी अनन्त शुभकामनाओं सहित।
जय गुरुदेव, जय महर्षि
 

- Brahamchari Girish

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