तेल की कीमतों का अर्थशास्त्र

भोपाल (महामीडिया) मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में प्रीमियम पेट्रोल की कीमत का तीन अंकों में पहुंच जाना न केवल दुखद, बल्कि चिंताजनक भी है। भोपाल में जहां पेट्रोल की कीमत 100 रुपये से ज्यादा है, वहीं मुंबई में यह 97, दिल्ली में 89, लखनऊ में 88, पटना में 91 और रांची में 87 रुपये के आस-पास है। फरवरी में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 10 बार बढ़ोतरी हो चुकी है, जबकि बीते 47 दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 20 दफे बढ़ोतरी हो चुकी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी कच्चे तेल की कीमत 13 महीनों में सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गयी है. वर्ष 2021 में कच्चे तेल की कीमत में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। आधुनिक जीवन में पेट्रोल अनिवार्यता है, यदि पेट्रोल के भाव में वृद्धि होगी, तो जाहिर है, आम आदमी का जीवन प्रभावित होगा।
वैश्विक स्तर पर आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होने से ईंधन की मांग बढ़ रही है, तो दूसरी तरफ ओपेक और सहयोगी देशों द्वारा कच्चे तेल के उत्पादन में कटौती करने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक बैरल की कीमत 63.58 डॉलर के स्तर पर पहुंच गयी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में बढ़ोतरी की संभावना बनी हुई है।  दरअसल, लॉकडाउन में कच्चे तेल की कीमत में वैश्विक गिरावट के बाद सरकार ने मार्च 2020 में राजस्व बढ़ाने के लिये पेट्रोलियम पदार्थों पर उत्पाद कर बढ़ाया था। लेकिन अब जब कोरोना संकट कम हुआ है तो कच्चे तेल के वैश्विक परिदृश्य में बदलाव हुआ है। सरकार की दलील है कि तेल उत्पादकों ने उत्पादन नहीं बढ़ाया ताकि कृत्रिम संकट बनाकर मनमाने दाम वसूल सकें, जिससे खुदरा कीमतें बढ़ रही हैं। मगर सरकार ने उत्पादन शुल्क कम करने का मन नहीं बनाया है। दरअसल, भारत 85 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। हकीकत यह भी है कि खुदरा दामों में केंद्र व राज्य सरकारों के करों की हिस्सेदारी साठ फीसदी है। इतना ही नहीं, हाल ही में प्रस्तुत आगामी वर्ष के केंद्रीय बजट में पेट्रोलियम पदार्थों पर नया कृषि ढांचा व विकास उपकर लगाया गया है, जिसका परोक्ष प्रभाव आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा। कहने को उपकर तेल कंपनियों पर लगा है।
पेट्रोल एवं डीजल के खुदरा बिक्री मूल्य का निर्धारण रोज किया जाता है।  सरकारी तेल विपणन कंपनियां अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों की हर पखवाड़े यानी एक और 16 तारीख को समीक्षा करती हैं। हालांकि, रोज सुबह छह बजे से पेट्रोल एवं डीजल की नयी कीमत लागू होती हैं। यह प्रक्रिया विकसित देशों अमेरिका, जापान आदि में भी लागू हैं। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के लेन-देन में खरीदार, बेचने वाले से निश्चित तेल की मात्रा पूर्व निर्धारित कीमतों पर किसी विशेष स्थान पर लेने के लिए सहमत होता है। ऐसे सौदे नियंत्रित एक्सचेंजों की मदद से संपन्न किये जाते हैं। कच्चे तेल की न्यूनतम खरीदारी 1,000 बैरल की होती है. एक बैरल में करीब 162 लीटर कच्चा तेल होता है। चूंकि, कच्चे तेल की कई किस्में व श्रेणियां होती हैं, इसलिए, खरीदार एवं विक्रेताओं को कच्चे तेल का एक बेंचमार्क बनाना होता है।
भारत में पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल देर-सवेर राजनीतिक मुद्दा भी बन जाता है। सवाल उठाया जा रहा है कि जो भाजपा कांग्रेस शासन में पेट्रोल व डीजल के मुद्दे पर बार-बार सड़कों पर उतरा करती थी, क्यों पहली बार पेट्रोल के सौ रुपये के करीब पहुंचने के बाद खामोश है। बताते हैं कि पेट्रोलियम पदार्थों की कीमत में वृद्धि के प्रतीकात्मक विरोध के लिये 1973 में वरिष्ठ भाजपा नेता अटलबिहारी वाजपेयी बैलगाड़ी पर सवार होकर संसद पहुंचे थे। निस्संदेह सभी दलों के लिये यह सदाबहार मुद्दा है लेकिन सत्तासीन दल कीमतों के गणित में जनता के प्रति संवेदनशील नहीं रहते। कोरोना संकट की छाया में तमाम चुनौतियों से जूझ रही जनता को राहत देने के लिये सरकार की तरफ से संवेदनशील पहल होनी चाहिए।
1 फरवरी को बजट के बाद से छठी बार कीमतों में बढ़ोतरी देखी गई है और 1 जनवरी से 17वीं बार। यह भी गौरतलब है कि मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा तेल कर वसूलता है और इसीलिए यहां तेल कीमतें ज्यादा हैं। मध्य प्रदेश सरकार पेट्रोल पर 39 प्रतिशत और डीजल पर 28 प्रतिशत कर वसूलती है। इसके अलावा, प्रति लीटर पेट्रोल पर 31 रुपये और प्रति लीटर डीजल पर 23 रुपये केंद्रीय कर के रूप में वसूले जाते हैं। केंद्र सरकार अगर चाहे, तो कीमतें कम हो सकती हैं, पर राज्य सरकारों के हाथों में भी बहुत कुछ है। फिर भी अभी कोई भी सरकार जनता को राहत देने के पक्ष में नहीं है।
 

- -प्रभाकर पुरंदरे

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