जीवनः सुख एवं उन्नति

भोपाल (महामीडिया) शिव-पुत्र कार्तिकेय का नाम ही स्कन्द है। स्कन्द का अर्थ होता है- क्षरण अर्थात् विनाश। भगवान शिव संहार के प्रतीक देवता हैं। उनके पुत्र कार्तिकेय शक्ति के रूप में जाने जाते हैं। तारकासुर का वध करने के लिए ही इनका जन्म हुआ था। यह अठारह पुराणों में सबसे बड़ा है। पुराणों के क्रम में इसका तेरहवां स्थान है। अपने वर्तमान में इसके खंडात्मक और संहितात्मक दो रूप उपलब्ध है और दोनों में से प्रत्येक में 81 हजार श्लोक हैं। इस प्रकार यह आकार की दृष्टि से सबसे बड़ा पुराण है। इसमें स्कंद (कार्तिकेय) द्वारा शिवतत्व का वर्णन किया गया है। इसीलिए इसका नाम स्कंद पुराण पड़ा इसमें तीर्थों के उपाख्यानों और उनकी पूजा पद्धति का भी वर्णन है। स्कंद पुराण बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस पुराण में धर्म-अधर्म से संबंधित व्यवहार के संबंध में अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारी है। इन्हें समझकर मनुष्य जीवन में सफलता पा सकता है। पुराण में ऐसी अनेक बातें बताई गई हैं, जो प्रत्येक मनुष्य के व्यवहार में होना चाहिए जिससे वह जीवन के प्रत्येक सुख और उन्नति को प्राप्त करता है।
सत्यं क्षमार्जवं ध्यायमानृशंस्यहिंसनम्। दम: प्रसादो माधुर्यं मृदुतेति यमा दश।।
अर्थ- सत्य, क्षमा, सरलता, ध्यान, क्रूरता का अभाव, हिंसा का त्याग, मन और इन्द्रियों पर संयम, सदा प्रसन्न रहना, मधुर व्यवहार करना और सबके लिए अच्छा भाव रखना- ये समस्त बातें सभी किसी के लिए अनिर्वाय कही गई हैं। सत्य बोलना मनुष्य के लिए सबसे आवश्यक माना गया है। जीवन में सफलता पाने के लिए सत्य का गुण होना बहुत आवश्यक है। जो मनुष्य सदैव सत्य बोलता है और सत्य का साथ देता है, उस पर भगवान सदैव प्रसन्न रहते हैं और उनकी हर इच्छा पूरी होती है। हमारे मन में क्षमा करने की भावना होनी चाहिए। जो व्यक्ति दूसरों की बातों को मन से लगाकर बैठ जाता है और उन्हें क्षमा नहीं करता, ऐसे स्वभाव वाले मनुष्य को जीवन में अनेक परेशानियों का सामना करना पड़ता है। वह सदैव बदले की भावना में जलता है और लंबे समय तक प्रतिशोध पूरा ना होने पर अवसाद (डिप्रेशन) में चला जाता है। अत:, सदैव मन में दूसरों को क्षमा करके आगे बढ़ने की भावना होनी चाहिए। साथ ही छल-कपट की भावना को सबसे नकारात्मक कहा गया है। जिस व्यक्ति के मन में दूसरों के लिए छल-कपट की भावना रहती है, वह दुष्ट स्वभाव का होता है। ऐसा मनुष्य किसी का भी बुरा करने से पहले कुछ नहीं सोचता और दूसरों को दु:ख देने वाला होता है। अत: ऐसी भावनाओं को कभी मन में नहीं आने देना चाहिए। लोगों के मन में असमानता का भाव होता है। वे धनी-निर्धन, छोटे-बड़े में भेद करते हैं और उनके साथ व्यवहार भी उसी प्रकार करते हैं। जो कि, निंदनीय है, सर्वथा भगवान की पूजा-अर्चना प्रतिदिन (प्रात: एवं संध्या) को करना उनका ध्यान करना बहुत आवश्यक होता है। जो मनुष्य, देव पूजा और भक्ति नहीं करते, वह नास्तिक स्वभाव के होते हैं। ऐसे मनुष्य अपने लाभ के लिए कुछ भी कर सकते हैं। अत: प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिदिन अपना कुछ समय देव भक्ति और पूजा-अर्चना में देना चाहिए। जो दूसरों को दु:ख पहुंचाता है और उनके साथ हिंसा करता है, वह हिंसक प्रवृत्ति का इंसान होता है। ऐसा व्यक्ति किसी के भी साथ बुरा व्यवहार करने से कभी भी कतराता नहीं हैं। हिंसक प्रवृत्ति के लोग ऐसा करने से दूसरों का ही नहीं वरन् स्वयं को भी हानि पहुंचाते हैं। जो मन से स्वस्थ रहता है, वह शरीर से भी स्वस्थ ही रहता है। जो सदैव हंसने-मुस्कुराने वाला होता है, वह अपनी समस्त कठिनाईयों का सामना बहुत ही सरलता से कर लेता है। व्यक्ति को प्रत्येक परिस्थिति में प्रसन्न रहना चाहिए और नकारात्मक भावों को स्वयं से दूर ही रखना चाहिए।
।। जय गुरुदेव, जय महर्षि।।
 

- -ब्रह्मचारी गिरीश

अन्य संपादकीय