म. प्र. के उप-चुनाव: दोनों पार्टियों के लिए "करो या मरो" की स्थिति

भोपाल (महामीडिया) मध्य प्रदेश विधानसभा की इस वक्त 28 सीटें खाली हैं। इनमें से ज्यादातर सीटें कांग्रेस विधायकों द्वारा पाला बदलकर भाजपा के साथ खड़े होने से खाली हुई हैं। इस दलबदल के कारण वहां लंबे अंतराल के बाद बनी कमल नाथ के नेत्रुत्ववाली कांग्रेस सरकार धराशायी हो गई थीI सत्ताधारी भाजपा के पास आज भी स्पष्ट बहुमत से नौ सीटें कम हैंI यही वजह है कि इन उप-चुनावों पर देश भर की निगाहें लगी हुई हैं।
भाजपा और कांग्रेस, दोनों के लिए मध्य प्रदेश के ये उप-चुनाव ‘करो या मरो’ की स्थिति वाले हैl  इसीलिए तिथि की घोषणा के बहुत पहले से दोनों पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता मतदाताओं से संवाद बनाने में जुट गए थे। अफसोसनाक पहलू यह भी देखने को मिला कि कई कार्यकर्ता सम्मेलनों में दोनों पार्टियों के नेताओं ने महामारी के मद्देनजर मान्य एहतियातों का भी ख्याल नहीं रखा। वह भी तब, जब मध्य प्रदेश के कई शीर्ष नेता खुद इस वायरस की जद में आ चुके हैं। प्रदेश में कोरोना संक्रमितों की संख्या एक लाख के पार हो चुकी हैl
अब जब राज्य में आचार संहिता लागू हो गई है, तो स्थानीय प्रशासन को चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशों के अनुरूप यह सुनिश्चित करना होगा कि ये उप-चुनाव प्रदेश में महामारी बढ़ाने वाले साबित न होने पाएं और संबंधित क्षेत्रों की जनता को उनका लोकप्रिय प्रतिनिधि भी मिल सके। संविधान निर्माताओं ने एक तय अवधि के भीतर खाली सीटों पर उप-चुनाव कराने का प्रावधान ही इसीलिए किया है, ताकि शासन में प्रत्येक क्षेत्र की नुमाइंदगी होती रहे। अगर महामारी न फैली होती, तो इन तमाम क्षेत्रों को उनका निर्वाचित प्रतिनिधि पहले ही मिल चुका होता।
मध्य प्रदेश के 28 विधानसभा क्षेत्रों के लोगों को यह तय करना है कि वे कर्नाटक की तरह मौजूदा सरकार को स्थिरता देने के लिए वोट करते हैं या फिर दलबदल के खिलाफ अपना जनादेश देते हैं।
 

- प्रभाकर पुरंदरे

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