महर्षि सिद्ध निर्माण योजना

भोपाल [ महामीडिया ] यस्यनिश्वशितम् वेदा यो वेदाभ्योडखिलमं जगत्।
निर्ममे तमहम वंदे विद्यातीर्थ महेश्वरम्।।
ऐंकार ह्रींकार रहस्ययुक्त: श्रींकार गूढ़ार्थ महाविभूत्या।
ऊँ कार मर्मप्रतिपादिनीभ्यां नमो नम: श्रीगुरूपादुकाभ्याम्।।

गुरूदेव (स्वामी ब्रह्मानंद सरस्वती श्री महाराज, तत्कालीन शंकराचार्य, ज्योतिष्पीठ, बद्रिकाश्रम, हिमालय) की कृपा से ज्ञानयुग का समागम, ज्ञानयुग के तृतीय वर्ष (1977) का आरंभ हुआ है। सब लोगों के लिये, समस्त मानव जाति के लिये परम सौभाग्य  का समय है। ज्ञानयुग का आधार है विशुद्ध ज्ञान। विशुद्ध ज्ञान का क्षेत्र है शुद्ध चेतना। विशुद्ध ज्ञान का स्वरूप हैं वेद। त्रिकालबाधित नित्य अपौरूषेय सनातन वेद शुद्ध ज्ञान का स्वरूप है और वेदवति प्रतिभा, वेदवान प्रज्ञा, वेदवान चेतना, ज्ञानयुग के मनुष्य की चेतना है। जब हम इस ज्ञान के तृतीय वर्ष का आव्हान करते हैं तो उसका आधार है कि इस पीढ़ी की मानव चेतना में वेद चेतना-वैदिक चेतना वेद संबंधी चेतना-शुद्ध चेतना का उदय होना। यह देखें कि जिस काल से इस ज्ञान का काल प्रार्दुभूत हो रहा है, जिस युग से यह ज्ञानयुग उभर रहा है, वह अज्ञान युग ही तो था जिसमें क्लेश और हर प्रकार की गलत बातें, दुःख अशांति का बोलबाला था। लोगों ने समझ लिया था कि जीवन संघर्ष का नाम है, संघर्ष ही को जीवन कहते हैं। ज्ञान के युग में क्या होगा? मनुष्य की आत्मा ज्ञान स्वरूप है। प्रज्ञानम ब्रह्म। यह जो मनुष्य की प्रज्ञा है, वो ब्रह्म है, वो महान है। अनंत, अखंड, सच्चिदानंद स्वरूप है यह मनुष्य की प्रज्ञा। यह आनंदमयीता, यह ज्ञानस्वरूपता जिसका स्वाभाव है आनंदमयिता और नित्य है, शाश्वत् हे, सनातन है। भगवान ने गीता में कहा ‘‘अजो नित्यः शाश्वतोडयं पुराणो ने हन्यते हन्यमाने शरीरे’’ कि आत्मा अजर अमर अविनाशी है, मानव चेतना अजर अमर अविनाशी आनंद रूप है। ऐसी आनंदरूप चेतना का प्रस्फुटन, ज्ञानयुग का स्वाभाविक गुण यह है कि चेतना दुःख न रहे, मनुष्य की चेतना में दुःख न हो, सुख अपार हो। भूतानी जायन्ते’’। आनंद से यह सारा विश्व ब्रह्माण्ड उत्पन्न हुआ। उसी आनंद स्वरूप चेतना से सच्चिदानंद स्वरूप ब्रह्म से, यह सारे विश्व ब्रह्मांड का उद्भव है, इसका प्रकाश हुआ है।
‘‘आनन्दाद्धयेव खल्विमानी भूतानी जायन्ते आनन्देन जातानी जीवन्ति’’। उसी आनंद की सत्ता से यह विश्व स्थित हुआ, आनंद की सता से जगत स्थिर है यह सब विराट संकुचित होकर प्रलय में जाता है तो वो विशुद्ध आनंद सत्ता में समाता है। उपनिषद् कहते हैं ‘‘सैषा भार्गवी वारूणी विद्या’’ यह भ्रगु ने अपने पुत्र वारूण्य को दिया था। यह यहां है? इस विज्ञा का क्षेत्र कहां है? ‘‘परमे व्योमन्प्रतिष्ठिता।’’ ये विद्या परम आकाश में प्रतिष्ठित है, परमेव्योमन-परम आकाश में प्रतिष्ठित है। अब यह परम आकाश कहां है देखें उनको। परम आकाश अर्थात् आकाश के परे के क्षेत्र में यह विद्या है। जीवन आनन्द रूप है। प्रवाह है और आनंद सागर में ही इसकी पूर्णाहुति होती है। यह जीवन की धारा आनंद से निकली है, आनंद में बह रही है, आनंद रूप होकर इसकी गति होनी है और वह आनंदरूपता कहां है, परमेव्योमन-व्योम के परे है, आकाश के परे है। आकाश कैसे जानते हैं, कहते हैं शब्द जो हैं वो आकाश का गुण हैं, तो जहां तक शब्द है वहां तक आकश का है। आकाश के परे जाना होगा तो क्या करना होगा? शब्द के परे जाना होगा। शब्द के परे कैसे जाते हैं? अपने बोलते हैं तो शब्द जोर-जोर से होता है। अगर धीरे-धीरे बोलने लगें, और धीरे-धीरे बोलें, मन ही मन बोलने लगें, तब वो मानसिक शब्द हो जाते हैं और सूक्ष्म से पश्यन्ति का शब्द है। पश्यन्ति का सूक्ष्म-अति सूक्ष्म मानसिक उच्चारण से भी परे जायेंगे तो वो शब्द के परे हो गया। वहां पर शब्द नहीं रह जाता है, शुद्ध चेतना रह जाती है पश्यन्ति के परे। बैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति, परा थे वाणी के शब्द के चार भेद हैं। बड़े-बड़े बोल बोलते हैं तो वह बैखरी का स्तर होता है। धीरे-धीरे मन ही मन सोचते हैं तो उसका कहते हैं- मध्यमा वाणी और जब भाव मानसिक उच्चारण से भी सूक्ष्य होता है तो उसको पश्यन्ति कहते हैं। फिर कहते हैं परा हो गया। शब्द के परे चेतना तब जाती है जब सूक्ष्मातिसूक्ष्म भाव का अनुभव करके भावातीत होती है। भावातीत ध्यान इसी को कहते हैं कि भाव की स्थूलता का अनुभव करते हुये अपनी चेतना, भाव को सूक्ष्मता का अनुभव करते हुये सूक्ष्म अतिसूक्ष्म भाव को पार करते हुये और फिर बिना भाव हुये सूक्ष्म ‘‘निस्त्रैगुण्योभवार्जुन।’’ त्रिगुतीत हो जायें अर्थात् राजसिक, तामसिक और सात्विक स्पंदनों से चेतना हटकर और निस्पंद हो जाये, समाधि की चेतना हो जाये। भावातीत शुद्ध चेतना हो जाये तो वह परमेव्योमन हुआ। आकाश के परे चले गये हम और आकश के परे क्या है? आनंद की सत्ता है, विशुद्ध की सत्ता है। वो नित्य अखंड आनंद की सत्ता है, जिस सत्ता से यह जगत निकला है, जिसमें समाया हुआ है और इसमें ही इसका अंत होना है। भावातीत ध्यान के द्वारा अपनी चेतना में अनेक विश्व ब्रह्मांडों का स्त्रोत पाते हैं, जो शुद्ध आनंद हैं और जो शुद्ध ज्ञान का स्वरूप हैं।.....

- -ब्रह्मचारी गिरीश

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