ध्यान आनंद से

भोपाल (महामीडिया) यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्। ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत्।। (गीता -६/२६)
गीता कहती है- 'यह अस्थिर और चंचल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँ से हटाकर इसको एक परमात्मा में ही लगायें।' साधक ने जो ध्येय बनाया है, उसमें यह मन टिकता नहीं, ठहरता नहीं। अत: इसको अस्थिर कहा गया है। यह मन भिन्न-भिन्न प्रकार के सांसारिक भोगों का, पदार्थों का चिन्तन करता है। अत: इसको 'चंचल' कहा गया है। तात्पर्य है कि यह मन न तो परमात्मा में स्थिर होता है और न संसार को ही छोड़ता है। इसलिये साधक को चाहिये कि यह मन जहाँ-जहाँ जाय, जिस-जिस कारण से जाय, जैसे-जैसे जाये और जब-जब जाये, इसको वहाँ-वहाँ से, उस-उस कारण से वैसे-वैसे और तब-तब हटाकर परमात्मा में लगायें। इस अस्थिर और चंचल मन को नियंत्रित न करने में सावधानी रखें, ढिलाई न करें। मन को परमात्मा में लगाने का तात्पर्य है कि जब यह पता लगे कि मन पदार्थों का चिन्तन कर रहा है, तभी ऐसा विचार करें कि चिन्तन की वृत्ति और उसके विषय का आधार और प्रकाशक परमात्मा ही हैं। यही परमात्मा में मन लगाना है। मन जिस किसी इन्द्रिय के विषय में, जिस किसी व्यक्ति, वस्तु, घटना, परिस्थिति आदि में चला जाय अर्थात् उसका चिन्तन करने लग जायें, फिर चला जाय तो फिर लाकर परमात्मा में लगायें। इस प्रकार मन को बार-बार अपने ध्येय में लगाते रहे। जहाँ-जहाँ मन जाय, वहाँ-वहाँ ही परमात्मा को देखें। जैसे गङ्गाजी याद आ जायें, तो गंगा जी के रूप में परमात्मा ही हैं, गाय याद आ जाय, तो गाय के रूप में परमात्मा ही हैं- इस प्रकार
मन को परमात्मा में लगायें। दूसरी दृष्टि से, गंगा जी आदि में सत्ता रूप से परमात्मा-ही-परमात्मा हैं; क्योंकि इनसे पहले भी परमात्मा ही थे, इनके मिटने पर भी परमात्मा ही रहेंगें और इनके रहते हुए भी परमात्मा ही हैं-इस प्रकार मन को परमात्मा में लगायें। साधक जब परमात्मा में मन लगाने का अभ्यास करता है, तब संसार की बातें याद आती हैं। इससे साधक आश्चर्यचकित हो जाता है कि जब मैं संसार का कार्य करता हूँ, तब इतनी बातें याद नहीं आतीं, इतना चिन्तन नहीं होता; परन्तु जब परमात्मा में मन लगाने का अभ्यास करता हूँ, तब मन में भिन्न-भिन्न प्रकार की बातें याद आने लगती हैं! पर ऐसा समझकर साधक को भयभीत नहीं चाहिये, क्योंकि जब साधक का उद्देश्य परमात्मा का बन गया, तो अब संसार के चिन्तन के रूप में भीतर से कूड़ा-कचरा निकल रहा है, भीतर से स्वच्छ हो रहा है। तात्पर्य है कि सांसारिक कार्य करते समय भीतर जमा हुए पुराने कार्यों को बाहर निकालने का अवसर नहीं मिलता। इसलिये सांसारिक कार्य छोड़कर एकान्त में बैठने से उनको बाहर निकालने का अवसर मिलता है और वे बाहर निकलने लगते हैं। साधक को भगवान् का चिन्तन करने में कठिनता इसलिये होती है कि वह अपने को संसार का मानकर भगवान का चिन्तन करता है। अत: संसार का चिन्तन स्वत: होता है और भगवान का चिन्तन करना पड़ता है, फिर भी चिन्तन होता नहीं। इसलिये साधक को चाहिये कि वह भगवान का होकर भगवान का चिन्तन करे। तात्पर्य है कि 'मैं तो मात्र भगवान का हूँ और मात्र भगवान ही मेरे हैं, मैं शरीर और संसार का नहीं हूँ और शरीर और संसार मेरे नहीं हैं', इस प्रकार भगवान के साथ सम्बन्ध होने से भगवान का चिन्तन स्वाभाविक ही होने लगेगा, चिन्तन करना नहीं पड़ेगा।
ध्यान करते समय साधक को यह ध्यान रखना चाहिये कि मन में कोई कार्य स्थिर न हो अर्थात 'अमुक कार्य करना है, अमुक स्थान पर जाना है, अमुक व्यक्ति से मिलना है, अमुक व्यक्ति मिलने के लिये आने वाला है, तो उसके साथ बातचीत भी करनी है' आदि कार्य स्थिर न रखें। इन कार्यों के संकल्प ध्यान को लगने नहीं देते किंतु विचलित न हों धीरे-धीरे समस्त बाधाएं दूर हो जावेंगी और आप ध्यान के आनन्द का अनुभव करने लगेगें। अत: ध्यान में शान्त चित्त होकर बैठना चाहिये। पहले नासिका के एक छिद्र से श्वास को गहरी श्वास लें फिर धीरे- धीरे नासिका के दूसरे छिद्र से इसे बाहर निकालने के पहले भीतर ही कुछ सेकंड रोकने का प्रयास करें। जितनी देर श्वास रोक सकें, उतनी देर रोककर फिर धीरे- धीरे श्वास लेते हुए स्वाभाविक श्वास लेने की स्थिति में आ जायें। ऐसा दो तीन बार करें। अब आप पायेंगे की आपकी श्वॉस शान्त हो रही है और आप शनै-शनै ध्यानस्थ हो रहे हैं। इस प्रकार प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या को 10 से 15 मिनट भावातीत ध्यान का अभ्यास करने से आप स्वयं शांति एवं आनंद का अनुभव करने लगेगें इसे व्यक्त करना कठिन है किंतु इसके आनंद का अनुभव आपको आनंदित करेगा। क्योंकि जीवन आनंद है।


।।जय गुरूदेव जय महर्षि।।
 

- -ब्रह्मचारी गिरीश 

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