आध्यात्मिक आनंद

भोपाल (महामीडिया) आनन्द क्या है? हम जो भौतिक वस्तुओं का उपयोग करते है उसमें हमें जो सुख मिलता है हम उसे ही आनन्द समझ लेते हैं किन्तु यह आनन्द नहीं यह तो सुख है जो क्षणिक है। ‘‘तद्विज्ञाने न परिपश्यन्ति धीरा आनंद रूपनर्मृवम्’’ अर्थात् ज्ञानी अपने ज्ञान से अपने अतंर में स्थित उस आनंदरूपी ब्रहम का दर्शन कर लेते हैं। सुख भौतिक है तो आनंद आध्यध्मिक होता है। हम सभी की ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से भौतिक वस्तुओं के उपयोगमें एक जैसी अनुकूति होती है। स्पर्श, गंध, स्वाद, स्वर, सौन्दर्य। किन्तु आनन्द आत्मिक होता है एवं सभी को आनन्द की अनुभूति भिन्न-भिन्न होती है और वह आनन्दित होकर प्रसन्न हो जाता है। जो अनन्त एवं सार्वभौमिक है। सांसारिक भोगों में एक विचित्र सा आकर्षण होता है। अत: मनुष्य को वह स्वत: ही अपनी और आकर्षित कर लेता है। एक बात और यह भी सही है कि जितनी की मात्रा में यह प्राप्त हो जाये इससे सन्तुष्टि नहीं होती और हम ययाती हो जाते हैं। यह निर्विवाद सत्य है कि भोगों की अधिकता मनुष्य की शारीरिक, मानसिक और आत्मिक शक्तियों का शमन कर उसे भोगी बना देती है। मनुष्य को स्वयं का स्वामी होना चाहिये न कि चाकर। इस स्थिति से उबरने के लिये हमें संयम का उपयोग करना चाहिये क्योंकि संयम हमारी शक्ति है और यह आपका सम्मान भी बढ़ाती है। अत: भोगों के विनाशकारी चुंगल से बचने के लिये संयम शक्ति का उपयोग करना चाहिये। गृहस्थ आश्रम में भी संयम को मुक्ति का मार्ग बताया गया है। दार्शनिक, समाज सुधारक, विचारक, वैज्ञानिक एवं सनातनी ऋषि-मुनि साधु सतों, चेतनावान लोग सदैव संभवित जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करते हैं। अत: आनन्द को प्राप्त करने के मार्ग में आपका सहयात्री संयम हमें हमारे जीवन को आनंदित करने में हमारी सहायता करेगा। अत: अब हम हमारे अक्षय आनन्द के लक्ष्य तक पहुंचाने वाले दूसरे सहयोगी को खोजने का प्रयास करते हैं तो वह है ‘संतोष’। कहा भी गया है कि संतोषी सदा सुखी अत: यदि हम संयम व संतोष, दो नियमों को हमारे जीवन में आत्मसात कर लेते हैं तो हम शीघ्र ही आध्यत्मिक आनंद को प्राप्त कर लेंगे। सुकरात ने कहा है। ‘‘संतोष ईश्वर प्रदत्त संपदा है और तृष्णा अज्ञान के द्वारा थोपी गई निर्धनता है।’’ क्योंकि आनन्द किसी भौतिक वस्तु पर आधारित नहीं है और न ही किसी विशेष व्यक्ति के अनुग्रह की आवश्यकता है। और न ही किसी विशेष स्थान व परिस्थितियों की आवश्यकता है, मात्र आत्मभाव व साथ ही परिणाम में संतोष और अपने कार्य में उत्कृष्टता का समावेश कर उसे कहीं भी और कभी भी प्राप्त किया जा सकता है। अत्मीयता ही प्रसन्नता है। मात्र पदार्थो में, प्राणियों में, सुंदरता, सरसता ढूंढ़ना व्यर्थ है। परमपूज्य महर्षि महेश योगी सदैव विश्व कुटुम्बकम की बात किया करते हैं और सदैव प्रकृतिमय होने का कहा करते थे। वह कहते थे ‘‘मानव का सर्वांगीर्ण विकास प्रकृति ही करती है। आवश्यकता उसको समझने कि आत्मसात करने की है’’और इसका एक सरल एवं सुलभ उपाय है भावातीत ध्यान योग शैली का प्रात: व सन्ध्या में 15 से 20 मिनट नियमित अभ्यास यही आपको सुखी से आनन्द की और ले जायेगा क्योंकि जीवन आनन्द है।


जय गुरुदेव, जय महर्षि
 

- Brahamchari Girish

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