श्रमिकों की घोर उपेक्षा पर हाईकोर्ट की चिंता जायज !

मद्रास हाईकोर्ट ने देशभर में श्रमिकों के साथ हो रहे बर्ताव, उनकी उपेक्षा और हादसों में हो रही उनकी मौतों पर सख्त नाराजगी जताई है। कोर्ट का कहना है कि इस पूरे लॉकडाउन के दौरान प्रवासी श्रनिकों की घोर उपेक्षा हुई है और कहा कि इन श्रमिकों की  देखभाल की जिम्मेदारी केवल उस राज्य की नहीं है जहां के ये रहने वाले हैं, बल्कि उन राज्यों की भी है जहां वे काम करते  हैं। कोर्ट का मानना है कि किसी भी राज्य ने इन श्रमिकों के देखभाल के प्रति अपनी जिम्मेदारी ठीक से नहीं निभाई है।केंद्र या राज्य सरकारें भले ही यह दावें कर ले कि  उन्होंने लाखों प्रवासी श्रमिकों के लिए बहुत से उपाय किए। लेकिन आए दिन सड़कों पर पैदल चलने को विवश इन श्रमिकों के साथ होने वाले हादसों, मीडीया में दिखाए जाने वाले करुण दृश्यों और उनकी पीड़ा पढ़ने या सुनने के बाद किसी की भी आँखें नम होना स्वाभाविक है।ऐसा लगता है जैसे इन श्रमिकों की विवशता कोरोना महामारी से भी भी ज्यादा भीषण है।एक हफ़्ते पहले महारष्ट्र में औरंगाबाद के निकट माल गाड़ी के नीचे कटकर 16 श्रमिकों की मौत हुई थी। हाल ही में उत्तरप्रदेश के इटावा-लखनऊ हाई-वे पर एक भयावह हादसे में 25 श्रनिकों की मौत की घटना ने सबको झकझोर कर रख दिया। श्रनिकों क़े लिए विशेष ट्रेनें शुरू किए जाने के बाद भी यह स्थितियां क्यों बन रही है कि उन्हें अमानवीय तरीके से निजी वाहनों में जानवरों की भरकर अपने गंतव्य स्थान पर पहुँचना पड़ रहा है?यह साफ है कि घर लौटना चाह रहे सभी मजदूरों को इन विशेष ट्रेनों की सुविधा नहीं मिल रही है या फिर उन्हें उचित मार्गदर्शन नहीं मिल पा रहा है।चूंकि घर लौट रहे श्रनिकों के सड़क हादसों में हताहत होने की ख़बरें आए दिन आ रही हैं, ऐसे में राज्य सरकारों के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वे अपनी सीमा में उन्हें पैदल गुजरने से रोकें।लॉकडाउन के तीसरे चरण में जो उम्मीद की रही थी कि उसके खत्म होते-होते कोरोब संकट से उपजे हालात सुधर जाएंगे, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।कोरोना महामारी के कारण विश्व में जो हालात बने हैं, वे असाधरण है। किसी को भी भी ऐसे हालात का सामना करने का अनुभव नहीं था। केंद्र सरकार ने व्यापारियों, मजदूरों, किसानों आदि के लिए कई कदम अवश्य उठाए, उनसे फायदा भी अवश्य होगा। लेकिन बात तो तब बनेगी जब आर्थिक-व्यापारिक वातावरण सुधरेगा, मजदूरों का पलायन रुकेगा। आर्थिक पैकेज की व्याख्या भले ही  प्रोत्साहन पैकेज के रूप में की जा रही हो, लेकिन उसमें नीतिगत घोषणाएं अधिक है। श्रमिकों का पलायन और उनकी यह दयनीय स्थिति एक मानव त्रासदी है।
 

- प्रभाकर पुरंदरे

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