किसानों की समस्या का समाधान शीघ्र होना चाहिए

भोपाल (महामीडिया) लम्बे समय से चल रहा किसान आंदोलन अब दुनिया का ध्यान अगर अपनी ओर खींचने लगा है तो यह न केवल विचारणीय, बल्कि चिंताजनक भी है। किसान आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में बुधवार का घटनाक्रम इतनी तेजी से घूमा कि राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर गाहे-बगाहे इसकी चर्चा होती रही। संसद में हंगामा हुआ, राज्यसभा से आप के तीन सांसदों का निष्कासन हुआ और राहुल गांधी ने प्रेस कानफ्रेंस करके कृषि सुधारों के मुद्दे पर सरकार पर तीखे हमले बोले। दुनिया की तमाम सरकारें जानती हैं कि भारत में कृषि कानून संसद में बहस के बाद बहुमत से पारित हुए हैं। कुछेक देशों की सरकारों या जिम्मेदार नेताओं के अलावा किसी की टिप्पणी देखने में नहीं आई थी, पर जब चर्चित गायिका रिहाना, पर्यावरणविद् ग्रेटा थनबर्ग और अमेरिकी उपराष्ट्रपति की एक रिश्तेदार की टिप्पणी किसान आंदोलन के समर्थन में आई तब चिंता बढ़ना स्वाभाविक है I
 इसके बाद विदेश मंत्रालय की टिप्पणी आई और बॉलीवुड से भी आक्रामक जवाब आये। विदेश मंत्रालय ने कहा कि सोशल मीडिया पर अंतर्राष्ट्रीय हस्तियों को तथ्यों को समझकर जिम्मेदारी से व्यवहार करना चाहिए। अंतर्राष्ट्रीय टिप्पणीकारों के विरुद्ध बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत, अजय देवगन, सुनील शेट्टी, करण जौहर व कैलाश खेर की टिप्पणियां सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बनी रही। ये ऐसी हस्तियां हैं, जिनकी टिप्पणी करोड़ों लोगों के बीच चर्चा की वजह बनती हैं। चिंता की बात यह है कि किसान आंदोलन के जरिए केंद्र सरकार की आलोचना कहीं पूरे भारत की आलोचना में न बदल जाए। ऐसा अक्सर देखने में आता है कि किसी देश में घटने वाली एक घटना का खामियाजा उस पूरे देश को भुगतना पड़ता है।
निस्संदेह 26 जनवरी की ट्रैक्टर रैली के बाद जिस तरह से हिंसा हुई और लाल किले का जो अप्रिय घटनाक्रम घटा, उसने पुलिस को अतिरिक्त सुरक्षा करने को बाध्य किया। लेकिन सवाल उठ रहा है कि ये कवायदें समस्या के समाधान की तरफ तो कदापि नहीं ले जाती। आखिर सरकार ये क्यों नहीं सोच रही है कि सुधार कानूनों की तार्किकता किसानों के गले नहीं उतर रही है। जब जिनके लिये सुधारों का दावा किया जा रहा है, वे ही स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं तो फिर राजहठ का क्या औचित्य है? खेती-किसानी आम किसान के लिये महज कारोबार ही नहीं है, उसके लिये भावनात्मक विषय है। जिसके चलते किसान सुधार कानूनों के चलते खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। सही मायनो में सरकार सुधारों को लेकर किसानों को विश्वास में नहीं ले पा रही है। किसान आंदोलन की हताशा समाज में नकारात्मक प्रवृत्तियों को प्रश्रय दे सकती है।
लोकतंत्र में लोक की आवाज को नजरअंदाज करके नहीं चला जा सकता, इस तथ्य के बावजूद भी कि आंदोलन से तमाम राजनीतिक दल अपने हित साधने की कवायद में जुटे हैं।  कुल मिलाकर, किसान आंदोलन को मिल रहा अंतरराष्ट्रीय वांछित-अवांछित समर्थन और उस पर विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया कोई ऐसी बात नहीं, जिससे हमारा गौरव बढे़। समस्या का समाधान मिल बैठकर जल्द से जल्द करना होगा। लंबे समय तक लड़ने की तैयारी दर्शाना न किसानों के लिए ठीक है, न सरकार के लिए। दोनों की लड़ाई में देश के सम्मान की फिक्र सबसे ऊपर रहनी चाहिए।

- -प्रभाकर पुरंदरे

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