श्रमिकों की घर वापसी

केंद्र सरकार ने शुक्रवार को देशव्यापी लॉकडाउन की अवधी को दो सप्ताह के और आगे बढाने का निर्णय लिया है।  25 मार्च को लागू किया गया लॉकडाउन 3 मई को ख़त्म होना था। विश्व का यह सबसे लंबा लॉकडाउन पिरियड हैं।
लेकिन अच्छी खबर यह है क़ि "श्रमिक दिवस" (1 मई) पर केंद्र सरकार ने कई राज्यों में फंसे प्रवासी श्रनिकों को अपने-अपने राज्यों में लौटने की अनुमति दे है। रेल मंत्रालय ने इसके लिए खास तौर पर " श्रमिक स्पेशल ट्रेन"  शुरू कर दी है। शुक्रवार को 1200  श्रमिकों को लेकर यह "स्पेशल श्रमिक ट्रेन" तेलंगाना से झारखंड के लिए  रवाना हुई। इसी तरह, नाशिक से करीब 350 श्रमिकों को लेकर एक  स्पेशल ट्रेन शनिवार शाम भोपाल पहुंचेगी। अपने घर-गांव से  हज़ारों किलोमीटर दूर मेहनत-मजदूरी करने वाले श्रनिकों के लिए रेल मंत्रालय का यह निश्चित ही अनूठा उपहार  है।
पंजाब, महाराष्ट्र, राजस्थान, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ आदि राज्यों में कई प्रान्तों  के लाखों  श्रमिक लॉकडाउन  के कारण बुरी परिस्थितियों में फंसे है। काम बंदी के चलते काफी मुश्किलों का  सामना कर रहे हैं। भुखमरी  और आर्थिक तंगी के चलते हज़ारों श्रमिक तो पैदल ही अपने-अपने राज्यों और गांवों की ओर चल पड़े थे। कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने इन भटके हुए मजदूरों को बसों के माध्यम से अपने-अपने  राज्यों में लाने का प्रयास भी किया। लेकिन इन श्रमिकों की संख्या इतनी अधिक है कि इन्हें  बसों से लाने में कई हफ्ते लग जाते। ऐसे में रेल मंत्रालय का  विशेष ट्रेन चलाने का निर्णय स्वागत योग्य है।
इन ट्रेनों में यात्रा करने वाले सभी श्रनिकों का यात्रा आरंभ करने और गंतव्य स्टेशन पर पहुंचने पर  स्वास्थ्य परीक्षण किया जाएगा। किसी के भी रिश्तेदारों या परिचितों को इनसे प्लेटफॉर्म पर मिलने नहीं दिया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर इन्हें क्वारंटाइन भी किया जा सकता है।
केंद्र सरकार यदि यह निर्णय लॉकडाउन के पहले सप्ताह में ही ले लेती तो हज़ारों-हज़ारों मज़दूर न तो बेहाल होते और न ही पुलिस की लाठी-चार्ज का शिकार होते।
देश की अर्थ-व्यवस्था और आर्थिक उन्नति में श्रमिक वर्ग का बहुत बड़ा योगदान है। एक अनुमान के मुताबिक देश में करीब चालीस करोड़ श्रमिक है। चीन के बाद भारत ही ऐसा देश है  जहाँ इतनी बड़ी संख्या में मज़दूर वर्ग मौजूद हैं। इनमें 94 प्रतिशत मजदूर तो असंगठित क्षेत्र से जुड़े हैं। इनमें हाथ-ठेला गाड़ी पर सब्जी-फल बेचने वालों से लेकर हीरों पर कारीगरी करने वाले तक शामिल हैं।
काम बंद होने के कारण दिहाड़ी वाले श्रनिकों की हालत बहुत ख़राब हो गई है। जाहिर है कि खुद के स्वास्थ्य से ज्यादा इन्हें अपने भविष्य और घर-परिवार की चिंता सता रही थी। यही कारण है कि हज़ारों श्रमिक पैदल ही अपने गांवों की और चल पड़े थे। भूख और आर्थिक तंगी से जूझ रहे इन श्रनिकों  के लिए रेल मंत्रालय का यह निर्णय स्वागत योग्य है।
 

- प्रभाकर पुरंदरे

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