भोजपुर मंदिर में होगा एतिहासिक निर्माण

भोजपुर मंदिर में होगा एतिहासिक निर्माण

भोपाल (महामीडिया) राजा भोज ने लुटेरे महमूद गजनवी से सोमनाथ मंदिर का प्रतिशोध लेने के बाद विजय स्वरूप जिस शिव मंदिर का निर्माण कराया गया था, वह भोजपुर मंदिर के नाम से जाना जाता है। भोपाल से 32 किमी दूर भोजपुर स्थित इस मंदिर को इसी कारण मध्य भारत का सोमनाथ कहा जाता है। तब इसका शिखर और कुछ हिस्सा अपूर्ण रह गया था, जिसे अब करीब 1000 साल बाद केंद्र सरकार पूर्ण कराने जा रही है। राजा भोज द्वारा तैयार कराए गए मूल नक्शे की परिकल्पना के अनुरूप ही इसे बनाया जाएगा। वह नक्शा भी प्रांगण में पाषाणखंडों पर उत्कीर्ण है।
इतिहासकारों का मानना है कि संभवत: राजा भोज के निधन के कारण तब निर्माण को विराम देना पड़ा होगा। मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की देखरेख में है, जो अब इसे भव्य रूप देने की तैयारी में जुट गया है। भोजपुर मंदिर के नाम से विख्यात यह शिवालय वास्तुकला का अनुपम उदाहरण है। पुरातत्वविद डॉ. नारायण व्यास के अनुसार, लाल पत्थर से तराशा गया विशाल व भव्य शिवलिंग इसे विश्व के अन्य शिवालयों से आगे ला खड़ा करता है। शिवलिंग की ऊंचाई 21.5 फीट और परिधि 17.8 फीट है। यह शिवलिंग अन्य मंदिरों में सबसे ऊंचा और विशाल है। शिवलिंग को चूने के पाषाण खंडों से निर्मित वर्गाकार और विस्तृत फलक वाले त्रिस्तरीय ऊंचे चबूतरे पर स्थापित किया गया है। शिवलिंग तक पहुंचने के लिए पुजारी को सीढ़ी लगानी पड़ती है।
मंदिर के विशालकाय पत्थर इंटरलॉकिंग पद्धति से जुड़े हैं। इसका अधूरा प्रवेशद्वार लगभग 66 फीट ऊंचा है। इसे भी किसी हिंदू भवन के प्रवेशद्वारों में सबसे ऊंचा और बड़ा आंका जाता है। विशाल वर्गाकार प्लेटफार्म पर यह मंदिर चार ऊंचे स्तंभों के सहारे खड़ा है। मंदिर में उत्कीर्ण मूर्तियां दर्शनीय हैं। दीवारों पर विलक्षण चित्रकारी भी की गई है। डॉ. नारायण व्यास बताते हैं, पुरावशेषों से ज्ञात होता है कि कई बार प्रयास किए गए होंगे किंतु मंदिर का शिखर पूर्ण नहीं हो सका। शिखर यदि पूरी तरह निर्मित होता तो यह निश्चित ही भवन से भारी होता, जिसका भार भवन सहन नहीं कर पाता। यही तकनीकी समस्या कारण बनी होगी। सभी पहलुओं का अध्ययन किया जा रहा है।
भोजपुर गांव रायसेन जिले में बेतवा नदी के किनारे बसा है। इसकी स्थापना धार के महान परमार राजा भोज (1000-1053 ईसवी) ने की थी। 
 

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