बस्तर में लगती है देवताओं की अदालत

बस्तर में लगती है देवताओं की अदालत

बस्तर (महामीडिया) आधुनिक न्याय की व्यवस्था के तैयार होने से सदियों पहले से बस्तर में देवता की अदालत की अवधारणा चली आ रही है। गांव में गांव व्यवस्था के सुव्यवस्थित संचालन के लिए दैवीय शक्तियों द्वारा प्रदत देवताओं की अदालत की संकल्पना सदियों से चली आ रही है। माटी कोर्ट, माता कोर्ट, देव कोर्ट, भीमा कोर्ट आदि नामों से यहां के आदिवासी इन दैवीय न्याय के मंदिर को जानते हैं और उनपर अगाध श्रद्धा रखते हैं।
इन अदालतों में देवता ही न्यायाधीश होते हैं और उनके प्रतिनिधि के तौर पर गायता मुकदमों की सुनवाई और फैसला सुनाते हैं। ग्रामीणों के बीच गांव में स्थित इन अदालतों की अपनी एक अलग महत्ता व विश्वास है। आम तौर पर गांव से बाहर कुछ पेड़ों के समूहें के बीच लगने वाली देवता की इस अदालत में दोषी के तौर पर खड़े होने के भय से आज भी ग्रामीण अपराध से डरते हैं।
सुप्रीम कोर्ट की तरह माटी कोर्ट गांव का प्रमुख न्यायालय होता है, जहां गायता या माटी पुजारी देवता रूपी न्यायाधीश के मुख्य प्रतिनिधि होते हैं। गांव की मिट्टी में आयोजित होने वाले शुभ कार्य, चाहे वह शादी ब्याह हों या अन्य आयोजन, इनकी शुरुआत गांव के मिट्टी की पूजन से ही होती है। उसके बाद ही शुभ कार्य की शुरुआत होती है। गायता के गांव में न होने पर शादी-विवाह आदि आयोजनों में ग्रामीणों को दिक्कतें होती हैं। इस स्थिति में गांव के 5 आदमी मिलकर गांव की मिट्टी की पूजन के पश्चात कार्य की शुरुआत करते हैं।
 

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