शक्ति की उपासना

शक्ति की उपासना

भोपाल (महामीडिया) 
या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।

जड़ चेतन सभी प्राणियों के भी के भीतर कहीं गुप्त और कहीं व्यक्त भाव से अवस्थित शक्तिरूपिणी देवी को हम बारंबार प्रणाम करते हैं । मां दुर्गा की पूजा को शक्ति-पूजन भी कहा जाता है। अधर्म की लंका पर धर्म की स्थापना के लिये रावण के वध के लिये मर्यादा पुरूषोत्तम भगवान राम ने शक्ति उपासना की थी। क्योंकि मां दुर्गा शक्ति स्वरूपा है शक्ति के स्त्रोत से ही ''शक्ति" प्राप्त की जा सकती है। वेद कहते हैं- प्राचीन होने पर भी शक्ति नित्य नवीन है, अव्यक्त भाव से जब वह व्यक्त होती है तब वह नवीन प्रतीत होती है।
एक शक्ति ही न जाने कितनी बार गुप्त से व्यक्त और व्यक्त से गुप्त भाव को प्राप्त हुई, इसे कौन बता सकता है ? जितनी बार व्यक्त होती है, उतनी बार वह नयी प्रतीत होती है, जितनी बार गुप्त होती है, उतनी बार लुप्त के समान अनुभूत होती है। अनादिकाल से शक्ति का यही क्रम चला आ रहा है। देश, महादेश, पृथ्वी, अनन्त जगत् तथा जाति, परिवार, समाज आदि को लेकर यही क्रम सदा से चला आ रहा है। न जाने कितने ग्रह विचूर्ण हुए, कितने देश पर्वत में परिणत हो गये, कितने देश समुद्र के गर्भ में लीन हो गये, कौन इसका निर्णय करेगा? हिमाच्छन्न हिमालयश्रृंग में समुद्रगर्जन का तथा समुद्रगर्भ में देशों और नगरों के अस्तित्व का इतिहास विद्यमान है। यह बात प्रसिद्ध ही है- 'शत वर्ष में जनपद, फिर शत वर्ष में अरण्य।
समय-समय पर यह शक्ति ऋषि-मुनियों, महर्षियों के रूप में जन्म लेकर इस सृष्टि का कल्याण करती रही है और करती रहेगी, यह क्रम अविरल है और अविरल ही रहेगा।
वेदमुख से देवी कहती हैं-
''मया सोडन्नमत्ति यो विपश्यति य: प्राणिति य: ईं शृणोत्युक्तम्।
अमन्तवो मां त उपक्षियन्ति श्रुधि श्रुतं श्रद्धिवं ते वदामि।।
अहं रूद्राय धनुरातनोमि ब्रह्मद्विषे शरवे हन्तवा उ।
अहं जनाब समदं कृणोम्यहं द्याावापृथिवी आ विवेश।।

-''मेरे द्वारा ही लोग जीवित हैं, अन्नग्रहण और शब्दश्रवण आदि करते हैं। मुझ पर जो उपेक्षा दिखाता है, वह विनष्ट हो जाता है। तुम श्रद्धावान् हो, इस कारण तुम्हें ऐसी बातें कह रही हू। ब्रह्मशक्ति के हिंसक, असुरों के वध के लिए धनुर्धारी रूद्र की भुजाओं में, मैं ही शक्ति रूप से अवस्थित थी। मैं ही लोकरक्षा के लिए युद्धकार्य में नियुक्त होती हूँ। मैं ही आकाश और पृथ्वी के भीतर प्रविष्ट होकर विराजमान रहती हूँ।
शक्तिराज्य की उपर्युक्त अद्भूत विस्तृति की जिसने एक बार उपलब्धि की है वह समझ सका है कि शक्तिपूजा में ही सारा संसार अनादिकाल से लगा हुआ है। शक्ति की आराधना के अतिरिक्त संसार में अन्य किसी प्रकार की उपासना कभी नहीं हुई और न होगी। जड़ और चेतन सभी युग-युगान्तर से जीवनभर शक्ति की आराधना में व्यस्त रहकर भी पूजा समाप्त नहीं कर सके और न कभी कर सकेंगे। यदि कभी कर भी सकें तो वह शक्ति की ही सहायता से। धर्म की रक्षा और अधर्म के विनाश के लिये शक्ति विभिन्न रूप में प्रकट होती है।
शक्ति और भक्ति में सामंजस्य आवश्यक है। कंस और रावण इसके श्रेष्ठ उदाहरण है वह अपनी शक्ति और भक्ति में सामन्जस्य नहीं रख सकें। इसी प्रकार हम सभी को अपनी शक्ति और भक्ति में सामंजस्य की स्थापना के लिये प्रयास करना चाहिये किंतु एक प्रश्न है कि जब रावण जैसा ज्ञानी यह संतुलन नहीं बना पाया तो हम कैसे यह कर सकते है ? परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी द्वारा प्रदत्त भावातीत ध्यान-योग-शैली का प्रतिदिन नियमित रूप से प्राप्त व संध्या १५ से २० मिनट तक का अभ्यास आपको भक्ति और शक्ति के संतुलन में आपका सहयात्री सिद्ध होगा और इसका अनुभव आप स्वयं ही कर सकते हैं- ब्रह्मचारी गिरीश जी 
जय गुरुदेव, जय महर्षि
 

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