फिल्म समीक्षाः ‘‘शकुंतला देवी’’ और ‘‘गुंजन सक्सेना द कारगिल गर्ल’’ 

फिल्म समीक्षाः ‘‘शकुंतला देवी’’ और ‘‘गुंजन सक्सेना द कारगिल गर्ल’’ 

भोपाल (महामीडिया) सिनेमाघर बंद होने की वजह से जहां पिछले पखवाड़े शकुंतला  देवी बायोपिक देखी वहीं इस हफ्ते गुंजन सक्सेना देखने का अवसर मिला। दोनों ही फिल्में लाजवाब है।शकुंतला देवी एक जानी-मानी गणितज्ञ थी। बाद  में  एस्ट्रोलॉजर के रूप में भी उनकी पहचान बनी। इसमें कोई संदेह नहीं कि उन्होंने भारत का गौरव बढ़ाया ।उनके जीवन को दिखाती फिल्म विद्या बालन के सशक्त अभिनय से बहुत जानदार बन गई है ।फिल्म में विद्या बालन के अलावा अन्य लोगों को अभिनय के अधिक अवसर ही नहीं मिले हैं बल्कि यूं कहें कि अन्य अभिनेताओं, अभिनेत्रियों को अधिक अभिनय  कर पाने की संभावनाएं  ही उपलब्ध  नहीं थी तो गलत नहीं होगा। शकुंतला देवी अपने जीवन में जिस द्वंद से गुजरती हैं  वो था उनकी बेटी का  मां के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण और बाद के वर्षों में उसमें आया सकारात्मक परिवर्तन  जरूर सुखद रहा।पति के साथ अनबन के बाद स्वतंत्र रहने की चाह पूरी न कर सकी शकुंतला देवी, क्योंकि दुनिया भर में होने वाले उनके शोस के साथ बेटी की केयर का जिम्मा भी उनके साथ  था।इसे निभाते हुए अपने कैरियर को ऊंचाइयां देती हैं शकुंतला देवी।उन्होंने बचपन में परिवार में जो  एक दृश्य देखा और मां  और पिता के लिए नफ़रत का दृष्टिकोण अपनाया उस अफसोस  को जीवन भर महसूस करती हैं। अपनी बहन के सही इलाज न करवाने के लिए अभिभावकों को जिम्मेदार मानती हैं।  कालांतर में खुद अपनी बेटी की बढ़-चढ़कर केयर कर उस  नेराश्य से मुक्त भी होना चाहती हैं ।सफल मां सफल गणितज्ञ और  एस्ट्रोलॉजर एक असफल  पत्नी भी है। यह मलाल उनके चेहरे पर अक्सर दिखाई देता है । शकुन्तला देवी के वास्तविक जीवन को रील में कैद करने की कोशिश तारीफ के काबिल है।इसी तरह बात करें गुंजन सक्सेना की, तो यह फिल्म भी पायलट गुंजन सक्सेना की जिंदगी के उतार-चढ़ाव और हासिल कामयाबी को सेल्यूलाइड  पर लाने की कोशिश है। कहीं-कहीं नायिका के चेहरे पर आए सुकोमल भाव उसके पायलट होने की पोजीशन को खारिज करते हैं। लेकिन मंझी हुई अभिनेत्री दिवंगत श्रीदेवी की बेटी होने की वजह से अभिनय के जो संस्कार जानहवी के रक्त में प्रवाहित हैं उसका लाभ  भी श्री देवी की शोहरत के साथ  फिल्म को  मिला है । वायु सेना के अफसरों की छवि को विवाद का विषय भी बनाया जा रहा है जिसका कोई औचित्य नहीं है। वरिष्ठ फिल्म समीक्षक लेखक विनोद नागर भी इसे फिजूल का विवाद मानते हैं।मैं जीवन में एक बार एडमिरल तहलियानी से मिला था जो नेवी और एयरफोर्स दोनों में दखल रखते थे। मैंने उनके कक्ष में दो टेलीफोन सैट देखे। एक टेलीफोन से वे अपने परिवार में बात किया करते थे और उसका बिल स्वयं भरा करते थे। सदाशयी और संवेदनशील लोग हर संस्थान में होते हैं। वही  हम जालिम अफसरों के किस्से  भी सुनते  रहते हैं। मुझे एक ऐसे अफसर याद आते हैं जो  गाय  पालने का शौक रखते थे।गाय के दूध नहीं देने पर कार्यालय के एक छोटे कर्मचारी को चौपाया बनाकर कंबल ओढ़ाकर खड़ा कर दिया करते थे। गाय बछड़े के मर जाने के बाद दूध नहीं देती थी और इस वैकल्पिक व्यवस्था को अपनाए जाने से  गाय  दो-तीन महीने तक दूध देती रही।  दफ्तरों की स्थितियां हास्यास्पद हो सकती हैं लेकिन ये हमारे समाज में आए कारुणिक अवमूल्यन का उदाहरण भी होती हैं।  एयर फोर्स के  किसी एक बड़े अफसर की वजह से सभी अफसरों को क्रूर नहीं माना जा सकता।यह सच है कि जहां पूरा विश्व हैप्पीनेस की खोज में है, वहीं आज भी किसी बॉस के बहुत कठोर और अमानवीय व्यवहार के कारण कई भले लोग  नौकरियां छोड़ कर चले जाते हैं । बहरहाल गुंजन सक्सेना के बहाने नारी सशक्तिकरण का संदेश समाज तक पहुंचा है ।दुनिया का ऐसा कोई कार्य नहीं  है जो महिलाएं नहीं कर सकती हैं ।यह बात सिद्ध हो गई है। प्लेन उड़ाने के लिए बलशाली व्यक्ति की नहीं काबिल,हुनरमंद व्यक्ति की जरूरत होती है,चाहे महिला ही क्यों न हो।फिल्म निर्देशन और सिनेमेटोग्राफी बहुत अच्छी है। यह दोनों फिल्में मुझे नेटफ्लेक्स पर देखने का अवसर मिला ।थियेटर्स पर ताले लगे हैं। अच्छे मनोरंजन की खोज में नाट्य प्रेमी और सिने रसिक चैनलों को बदल बदल मनोनुकूल मनोरंजन की तलाश में लगे रहते हैं ।जल्द ही सिनेमाघर खुलेंगे लोग उसी वातावरण के बीच सिनेमा देखेंगे जिस तरह देखना चाहते हैं ।आखिर पथरीली जमीन पर कोई कब तक चलेगा ।जल्द ही हम सब नंगे पांव नर्म दूब पर चलेंगे।
*अशोक मनवानी

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