कोरोनावायरस को लेकर डब्ल्यूएचओ खुद ही नहीं बना पाया गाइडलाइंस

कोरोनावायरस को लेकर डब्ल्यूएचओ खुद ही नहीं बना पाया गाइडलाइंस

जेनेवा [ महामीडिया ] कोरोनावायरस के प्रकोप से दुनियाभर के तमाम देश परेशान है। सबसे बुरा हाल अमेरिका का है। अब बाकी देशों में भी कोरोना के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इस बीच कुछ वैज्ञानिकों ने कोरोनावायरस को लेकर डब्ल्यूएचओ की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए हैं।वैज्ञानिकों का कहना है कि डब्ल्यूएचओ यानि विश्व स्वास्थ्य संगठन कोरोनावायरस के मामले में सही चीजें देशों के सामने नहीं ला पाया। इस वायरस के संक्रमण को रोकने के लिए जिस मास्क की बहुत अधिक जरूरत है उसी को आवश्यक घोषित किए जाने के बारे में अब तक उचित निर्णय नहीं दे सका है। जबकि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि संक्रमण रोकना है तो चेहरे पर मास्क का होना बहुत जरूरी है। इसके अलावा कई अन्य बिंदु भी ऐसे रहे जिस पर डब्ल्यूएचओ की ओर से समय पर ध्यान नहीं दिया इस वजह से इस संक्रमण को फैलने से रोकने में समस्या हुई।वैज्ञानिकों का कहना है कि डब्ल्यूएचओ की ओर से पूरे विश्व के लिए काम करता है। तमाम देश उसे शोध और अनुसंधान के लिए फंड देते हैं। यदि ऐसी कोई महामारी सामने आती है तो पूरी दुनिया डब्ल्यूएचओ की ओर ही देखती है और उनकी ओर से जो नियम कायदे बताए जाते हैं उसी का पालन सभी करते हैं मगर कोरोनावायरस के मामले में ऐसा देखने को नहीं मिला। डब्ल्यूएचओ कोरोनावायरस के मामले में हुए अनुसंधान की रिपोर्टों से भी ठीक तरह के निर्णय नहीं निकाल पाया जिसकी वजह से समस्या हुई।सभी वैज्ञानिक और सरकारें कोरोनावायरस के सामने आने के बाद से मास्क लगाने की सिफारिश कर रही हैं मगर डब्ल्यूएचओ की ओर से अब तक इसे आवश्यक करार नहीं दिया गया। मास्क की वजह से इससे बचाव हो सकता है, इस वजह से सभी को इससे बचने के लिए मास्क लगाना जरूरी किया जाना चाहिए, ये बात भी डब्ल्यूएचओ की ओर से नहीं कही गईइसके अलावा डब्ल्यूएचओ के एक सदस्य ने ये भी कहा कि बिना लक्षण वाले कोरोना के मरीज मिलना संभव नहीं है फिर उन्होंने बाद में इस बात से इनकार किया। बोले ऐसा भी हो सकता है। कई जगह ऐसा भी देखने में आया कि जिनकी कोई ट्रैवल हिस्ट्री नहीं थी जिनके अंदर कोरोनावायरस से संबंधित लक्षण नहीं दिख रहे थे वो भी कोरोना संक्रमित हो सकते हैं।  डब्लूएचओ ने बार-बार कहा है कि छोटे हवाई बूंदों या एरोसोल महामारी के प्रसार में महत्वपूर्ण कारक नहीं हैं। जबकि कई जगह डॉक्टरों ने इस बात को कहा कि बूंदें या एरोसोल इस बीमारी के कारक हो सकते हैं। जब चीन वैज्ञानिकों ने पहले ही ये बात कह दी थी कि ये वायरस छींकने और एक दूसरे को छूने से भी फैल सकता है। कई वैज्ञानिकों ने भी इस पर अपनी सहमित जताई, उसके बाद भी डब्ल्यूएचओ इन चीजों के लिए मना करता रहा।मिनेसोटा विश्वविद्यालय के एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ माइकल ओस्टरहोम ने कहा कि डब्लूएचओ बूंदों और एरोसोल के मुद्दे पर दुनिया के अधिकांश वैज्ञानिकों की शोध से बाहर हो गया है। वैज्ञानिक कह रहे हैं कि ऐसा संभव है मगर फिर भी डब्ल्यूएचओ इसको नहीं मान रहा है। इस वजह से अब लोगों का डब्ल्यूएचओ की ओर से विश्वास उठ रहा है।संयुक्त राज्य अमेरिका सहित कई देशों ने लॉकडाउन रणनीतियों को अपनाया क्योंकि उन्होंने माना कि केवल बीमार लोगों को अलग करना महामारी को रोकने के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता है। यदि वायरस छोटी हवाई बूंदों द्वारा फैल रहा है तो लोगों को ऐसी जगहों पर जाने से रोकना चाहिए, उनको ऐसी जगहों पर जमा होने से मना करना चाहिए। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि शुरूआत में इन्हीं सब चीजों का ध्यान रखकर रिसर्च की गई होती तो शायद अब तक टीका बनाने की दिशा में आगे बढ़ चुके होते।

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