महामीडिया न्यूज सर्विस
पराक्रम के कारक भगवान परशुराम

पराक्रम के कारक भगवान परशुराम

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 603 दिन 16 घंटे पूर्व
17/04/2018
भोपाल (महामीडिया) हिंदू संस्कृति व इतिहास में संतों व पर्वों का अद्वितीय स्थान है। भारत की धरती संतों की उर्वरा धरती है। ऐसे ही एक महान समाज सुधारक संत शिरोमणि भगवान परशुराम का उल्लेख रामायण, महाभारत, भागवत पुराण एवं कल्कि पुराण आदि ग्रंथों में मिलता है। मान्यता है कि भगवान परशुराम ने अहंकारी और दुष्टों का पृथ्वी से 21 बार सफाया करने के लिए युद्ध किया। भगवान परशुराम के पिता ऋषि जमदग्नि व माता का नाम रेणुका था। इनको विष्णु का अवतार माना गया है। पुराणों की कथा के अनुसार भगवान परशुराम माता−पिता के अनन्य भक्त थे 'परशु' प्रतीक है पराक्रम का। 'राम' पर्याय है सत्य सनातन का। इस प्रकार परशुराम का अर्थ हुआ पराक्रम के कारक और सत्य के धारक। शास्त्रोक्त मान्यता तो यह है कि परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं, अतः उनमें आपादमस्तक विष्णु ही प्रतिबिंबित होते हैं। 'परशु' में भगवान शिव समाहित हैं और 'राम' में भगवान विष्णु। इसलिए परशुराम अवतार भले ही विष्णु के हों, किंतु व्यवहार में समन्वित स्वरूप शिव और विष्णु का है। इसलिए परशुराम  'शिवहरि' हैं।  ब्रह्रावैवर्त पुराण के अनुसार, एक बार परशुराम भगवान शिव के दर्शन करने के लिए कैलाश पर्वत पहुंचे, लेकिन भगवान गणेश ने उन्हें मिलने नही दिया। इस बात से क्रोधित होकर उन्होंने अपने फरसे से भगवान गणेश का एक दांत तोड़ दिया था। इस कारण से भगवान गणेश एकदंत कहलाने लगे। त्रेतायुग में जनक, दशरथ आदि राजाओं का उन्होंने समुचित सम्मान किया। सीता स्वयंवर में श्रीराम का अभिनंदन किया। द्वापर में उन्होंने कौरव-सभा में कृष्ण का समर्थन किया और इससे पहले उन्होंने श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध करवाया था। द्वापर में उन्होंने ही असत्य वाचन करने के दंड स्वरूप कर्ण को सारी विद्या विस्मृत हो जाने का श्राप दिया था। उन्होंने भीष्म, द्रोण व कर्ण को शस्त्र विद्या प्रदान की थी। इस तरह परशुराम के अनेक किस्से हैं।
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