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अत्यंत पवित्र एवं फलदायी होती है वैशाखी पूर्णिमा

अत्यंत पवित्र एवं फलदायी होती है वैशाखी पूर्णिमा

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 299 दिन 13 घंटे पूर्व
23/04/2018
भोपाल (महामीडिया) वैशाखी पूर्णिमा को भविष्य पुराण, आदित्य पुराण में अत्यंत पवित्र एवं फलदायी माना जाता है। वैशाख पूर्णिमा को महात्मा बुद्ध की जयंती के रूप में भी मनाया जाता है। इस दिन पिछले एक महीने से चला आ रहा वैशाख स्नान एवं विशेष धार्मिक अनुष्ठानों की पूर्ण आहूति की जाती है। मंदिरों में हवन-पूजन के बाद वैशाख महात्म्य कथा का परायण किया जाता है। इस दिन प्रातः नदियों एवं पवित्र सरोवरों में स्नान के बाद दान-पुण्य का विशेष महत्व कहा गया है। 
वैशाख महीने की कथा इस प्रकार है। एक पति-पत्नि थे। लकड़ियां बेचकर अपना पेट भरते थे। वैशाख का महीना आया। सब वैशाख नहाने लगे तो सब औरतों को देखकर वो औरत भी वैशाख नहाने लगी। उसका पति रोज लकडियाँ लाता उसमें से एक-दो लकडी वो निकाल कर रख लेती। रोज वैशाख नहाने जाती, पीपल पथवारी सींचती। ऐसा करते-करते एक महीना बीत गया। नहा-धोकर पूजा-पाठ करके लकडी बेचने जाती। भगवान का नाम लेते ही वे सब लकडियाँ चन्दन की बन गई। एक बार राजाजी को उन लकडियों की सुगन्ध आई तो राजाजी ने उन चन्दन की लकिंडयों का दाम पूछा तो वह बोली आप जितना दोगे उतना ही ले लूँगी। पर मुझे पाँच ब्राह्मणों को भोजन करवाना है। उनको अच्छा भोजन करवा सकूँ उतना सीदा दे दो। राजा ने अपने नौकरों के साथ सीदा भीजवा दिया। घर जाकर उसने बढ़िया चूरमे के लड्डू बनाये, सब्जी-पूरी बनाकर ब्राहा्मों को भोजन कराया और दक्षिणा भी दी। ब्राह्मणों ने उसे आर्शीवाद दिया। उसके पति की लकडियाँ नही बिकीं, इसी कारण से उसे आने मे बहुत देरी हो गयी, उधर ब्राह्मणों के आर्शीवाद से झोंपडी उड़कर महल बन गया। रसोई मे छतीस भोजन-पकवान बन गये। उसका पति देर बाद जब घर लौटा तो झोंपडी को न देखकर पड़ोसन से पूछा तो पड़ोसन बोली, तुम तो लकडियाँ बेचते-फिरते हो मगर तुम्हारी पत्नि पीछे से न जाने क्या-क्या करती है। ब्राह्मणो को बढ़िया भोजन कराती है। पति की आवाज सुनकर वह अन्दर से आई और बोली ये अपना ही घर है। पति को गुस्सा आ गया और बोला तूने चोरी की या डाका डाला, घर कहाँ से बन गया? फिर पत्नि पति को धीरज से समझाते हुए बोली, मै रोज वैशाख नहाती, बड पीपल सींचती, पथवारी सींचती उसी का फल मुझे भगवान ने दिया है। आपकी लाई लकड़ियों मे से दो-चार लकडियाँ मै निकालकर रख लेती, वही लकड़ियाँ भगवान कही कृपा से चन्दन की हो गई। राजाजी ने चन्दन की लकड़ियाँ मुझसे माँगी मैने उससे सीदा माँगा और चूरमे के लड्ड़ू बनाकर बढ़िया रसोई बनाकर ब्राह्मणों को भोजन कराया, दक्षिणा दी। बस उसी का ही फल हमें मिला है। उसकी बातें सूनकर पति प्रसन्न हो गया और दोनो ने खुशी-खुशी भोजन किया महल मे बैठकर दोनो भजन-र्कीतन करने लगे। वैशाखी पूर्णिमा को पुण्य प्राप्त करने के लिये दान का विशेष महत्व होता है।
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