महामीडिया न्यूज सर्विस
भारतीय सिनेमा ने भी मानव और मशीन के द्वंद्वों को उजागर किया

भारतीय सिनेमा ने भी मानव और मशीन के द्वंद्वों को उजागर किया

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 507 दिन 13 घंटे पूर्व
01/05/2018
भोपाल (महामीडिया) किसी भी देश और समाज की प्रगति में मजदूरों का बड़ा अहम योगदान होता है. 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है. बॉलीवुड में भी इस मुद्दे को काफी भुनाया जाता रहा है. एक वक़्त था जब बॉलीवुड में ऐसी कई फिल्में बनती थी जिसमे मजदूर और उसके संघर्ष को दर्शाया जाता था. फिल्म की पूरी कहानी उनके इर्द-गिर्द ही बुनी जाती थी. जिसमे अमीरी और गरीबी के बीच की लड़ाई दिखाकर दर्शकों का दिल जीत लिया जाता था. इन फिल्मों की तरह ही कई ऐसे गाने भी बने जिसमे मजदूरों की मेहनत और उनके संघर्ष को भी दिखाया गया. सिनेमा कर्मियों ने अपने-अपने ढ़ंग से उभरती हुई प्रवृतियों और विमर्शों को पकड़ने की कोशिश की। यह अकारण नहीं था कि महबूब खाँ ने 'औरत' बाद में 'मदर इंडिया' के नाम से बनी फिल्मों में कृषि समाज की महाजनी अर्थव्यवस्था और तदजनित अंतर्विरोधों को प्रस्तुत किया। इसके साथ ही भारतीय कृषि समाज में औरत की क्या हैसियत है, इसे भी सामने रखा। किसान समस्या से संबंधित कई और भी फिल्में बनीं। उदाहरण के लिए उत्तर औपनिवेशिक भारत में बिमल रॉय ने बहुत ही सशक्त फिल्म 'दो बीघा जमीन' का निर्माण कर देश के संक्रमणकालीन द्वंद्वों को उजागर किया। 1953 में बनी ये फिल्म देश के बदलते राजनीतिक-आर्थिक दौर को सामने रखती है और बतलाती है कि औद्योगिकीकरण कृषियुगीन भारत से किस प्रकार की कीमत वसूल करेगा; भूमि का विलगन; सीमांत किसानों का खेतों से बेदखल होना, गाँवों से पलायन; विस्थापन व भूमिहीनता तथा शहरी सर्वहारा में किसान का तब्दील होना; पारंपरिक भू स्वामी या जमींदार और शहरी पूँजीपति का जन्म लेता गठबंधन जैसी प्रवृत्तियाँ नेहरूयुगीन समाजवाद की विसंगतियों को उघाड़ती हैं। पाँचवें दशक में ही आदिवासी अंचलों में औद्योगिक सभ्यता ने अपनी घुसपैठ की लंबी यात्रा की शुरुआत की थी। यह वह दौर भी जब मानव और मशीन के बीच प्रतिस्पर्धा तेज होने लगी थी, मशीन मानव को प्रतिस्थापित करने पर तुली हुई थी। इसका खूबसूरत फिल्मांकन बी.आर.चोपड़ा की फिल्म, 'नया दौर' में देखा जा सकता है। इसी प्रकार राजकपूर द्वारा अभिनीत 'जागते रहो' में भी गाँवों से गमन और शहर में ग्रामीण हिंदुस्तानी का हाशियाकरण व हताशाकरण सामने आता है। इसी संक्रमणकालीन भारत के अंतर्विरोधों को ख्वाजा अहमद अब्बास ने अपने फिल्म 'शहर और सपना' में भी प्रभावशाली ढ़ंग से सामने रखा है। वामपंथी अब्बास बतलाते हैं कि एक महानगर का निर्माण किस प्रकार मानवीय मूल्यों के दम पर किया जाता है। महानगर की संस्कृति किस तरह से संवेदनाशून्य होती है और किस प्रकार के नारकीय जीवन को जन्म देती है इसका उदाहरण मजदूर, इंसान जाग उठा, काला पत्थर इत्यादि फिल्में हैं।
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