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वेदांता का इतिहास पर्यावरण और मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाला रहा है

वेदांता का इतिहास पर्यावरण और मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाला रहा है

admin | पोस्ट किया गया 297 दिन 8 घंटे पूर्व
26/05/2018
नई दिल्ली (राजकुमार शर्मा) वेदांता का इतिहास जनविरोधी गतिविधियों का ही रहा है वेदांता की छवि हमेशा से ही पर्यावरण और मानवाधिकारों का उल्लंघन करने वाली कंपनी की रही है. दिलचस्प ये है कि कंपनी नरेंद्र मोदी सरकार के विकास एजेंडा के झंडाबरदारों में से एक है अप्रैल में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंदन के दौर पर थे तब वेदांता के मालिक अनिल अग्रवाल उस वक्त काफी परेशान चल रहे थे. प्रदर्शनकारी तमिलनाडु में उनकी तांबा कंपनी के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे और मोदी के ब्रिटेन आने से दो हफ्ते पहले उनकी कंपनी को तात्कालिक तौर पर राज्य सरकार की ओर से अनुमति नहीं लेने की वजह से बंद कर दिया गया था.अनिल अग्रवाल इस बीच मोदी की यात्रा से उम्मीद लगाए बैठे थे. पिछली बार जब 2015 में मोदी ब्रिटेन की यात्रा पर गए थे तब वेदांता ने फ्रंट पेज पर मोदी के स्वागत में पूरे पन्ने का इश्तेहार दिया था और इस बार भी कुछ ऐसा ही इश्तेहार कथित तौर पर वेदांता ने मोदी के स्वागत में दिया था.भारत-ब्रिटेन सीईओ बैठक में अनिल अग्रवाल भी शामिल थे. इस बैठक में प्रधानमंत्री मोदी के साथ ब्रिटेन की प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे भी शामिल थी.इस दौरान पर्यावरण और प्रदूषण को लेकर तूतीकोरिन के स्टारलाइट कॉपर फैक्ट्री के बाहर हो रहे व्यापक आंदोलन पर कभी ध्यान नहीं दिया गया. इस हफ़्ते इस आंदोलन में शामिल 11 लोगों को पुलिस ने गोली मार दी. मोदी की लंदन यात्रा से कुछ ही हफ्ते पहले ब्रिटेन में रह रहे तमिलों ने लंदन में वेदांता के मालिक के घर के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया था.इस पर कोई भी प्रतिक्रिया देने के बजाए अनिल अग्रवाल ने ट्वीट किया, #PMInLondon को सुनना सुखद है. उन्होंने कहा है कि एक लाख गांवों को पिछले चार सालों में ऑप्टिकल फाइबर से जोड़ा गया है. संक्षेप में बात यह है कि कैसे पर्यावरणीय और मानवाधिकार नियमों का उल्लंघन करने को लेकर वेदांता की आलोचना हो रही है और इसी के साथ वो मोदी सरकार के अंदर एक महत्वपूर्ण कॉरपोरेट साझेदार भी बनी हुई है.हाल के सालों में वेदांता ने सांस्कृतिक गतिविधियों में खूब आर्थिक सहायताएं प्रदान की हैं. फिर बात चाहे लंदन में हुए जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल की हो या फिर डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माण की. सामाजिक जागरूकता वाले कार्यक्रमों में भी उसने भागीदारी निभाई है.साल 2000 से लेकर 2010 तक ओडिशा के लांजीगढ़ ज़िले और नियमगिरी पहाड़ियों में चलाए गए वेदांता के एल्यूमिना और बॉक्साइट खनन ऑपरेशन के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध-प्रदर्शन हुए थे. इससे कंपनी की छवि प्रदूषण नियंत्रण के नियमों और आदिवासी और मानवाधिकार का उल्लंघन करने वाली एक कंपनी की बनी.इन दस सालों में कंपनी ने कांग्रेस और भाजपा को चंदा भी दिया, जो विदेशों से चंदा लेने के क़ानून एफसीआरए का उल्लंघन है. कंपनी की ओर से पर्यावरण संरक्षण के मापदंडों का उल्लंघन करना जल्दी ही लोगों की नज़र में आ गया. न सिर्फ स्थानीय कार्यकर्ता बल्कि अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और संस्थाओं का भी ध्यान इस ओर गया. पर्यावरण संरक्षण के मापदंडों और मानवाधिकार उल्लंघन के मसले पर साल 2007 में नार्वे के सरकारी पेंशन फंड ने कंपनी से अपने हाथ वापस खींच लिए.तीन साल बाद जोसेफ राउनट्री चैरिटेबल ट्रस्ट जैसे इसके प्रमुख निवेशक ने भी इसी वजह का हवाला देते हुए अपने शेयर बेच डाले. ओडिशा में वन क़ानूनों का उल्लंघनकरने की वजह से इसी साल भारत के पर्यावरण मंत्रालय ने इससे पर्यावरण संबंधी मंजूरी वापस ले ली थी.अप्रैल 2010 में फोर्ब्स इंडिया ने एक गहरी पड़ताल करते हुए स्टोरी की थी जिसका शीर्षक था क्या वेदांता अपनी अंतरात्मा की सुन सकेगा  और अनिल अग्रवाल को इसमें नैतिकता के दोराहे पर खड़ा हुआ दिखाया गया था.कंपनी ने कुछ लंबे समय से वादे किए हुए प्रोजेक्ट जो कभी पूरे नहीं हुए जैसे छत्तीसगढ़ में एक विशाल कैंसर रिसर्च सेंटर की स्थापना और ओडिशा में अरबों डॉलर की लागत से विश्वस्तरीय बनाई जाने वाली यूनिवर्सिटी को ठंडे बस्ते में डाल दिया. इसके बदले उसने कुछ और नए वायदे किए.2014 में कंपनी को नियमगिरी की पहाड़ियों में बॉक्साइट के खनन से रोक दिया गया था. उस वक्त अनिल अग्रवाल ने अपनी संपत्ति का 75 फ़ीसदी हिस्सा दान में देने का वादा किया था जो कि करीब 23 हज़ार करोड़ रुपये होते है. तब से कई मौकों पर वो ये बताना नहीं भूलते कि इस पैसे का बड़ा हिस्सा वो भारत के मानव संसाधन में निवेश? कर रहे हैं और सात साल से कम उम्र के बच्चों की बेहतरी के लिए लगा रहे हैं2012 में कंपनी ने शॉर्ट फिल्मों की प्रतियोगिता का आयोजन किया. इसमें कंपनी के सामाजिक कार्यों से पड़ने वाले प्रभावों के ऊपर फिल्म दिखाने को कहा गया. वेदांता को उस समय बहुत ही शर्मिंदगी झेलनी पड़ी जब प्रतियोगिता के निर्णायक मंडल में शामिल दो सदस्य गुल पनाग और श्याम बेनेगल ने पर्यावरण को लेकर कंपनी के खराब रिकॉर्ड की वजह से खुद को आयोजन से अलग कर लिया.श्याम बेनेगल ने तब प्रतिक्रिया दी थी, मेरी मूल आस्था मुझे इसके लिए हामी भरने से मना करती है. गुल पनाग ने एक कदम और आगे बढ़ते हुए ट्वीट किया, मेरी बदकिस्मती कि मुझे अभी इसके बारे में पता चला रहा है. मुझे नहीं पता था कि ये प्रतियोगिता वेदांता के महिमामंडन के लिए था. मैंने इससे खुद को अलग कर लिया है.चार साल बाद 2016 में जब कंपनी लंदन में जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का आयोजन कर रही थी उसे विरोध का सामना करना पड़ा था. सैकड़ों शिक्षाविदों और लेखकों ने इसके खिलाफ अभियान छेड़ रखा था और वेदांता जेएलएफ़ लंदन का बहिष्कार करते हैं का नारा दिया. उस समय लेखकों ने कहा कि इस बेशर्म पीआर अभियान? के  खिलाफ हमारी आवाज़ प्रदूषण, बीमारी, उत्पीड़न, विस्थापन और गरीबी झेल रहे लोगों के साथ एकजुटना प्रदर्शित करने के लिए है.अनिल अग्रवाल ने उन परियोजनाओं में निजी दिलचस्पी दिखाई है जो प्रधानमंत्री मोदी के दिल के करीब हैं. 2017 के आख़िर में लंदन में यातायात मंत्री नितिन गडकरी ने इस बात की घोषणा की थी, अनिल अग्रवाल ने पटना में गंगा के तट को सुंदर बनाने की जिम्मेदारी ली है.गडकरी उस वक्त किसी ऐसे अमीर भारतीय की तलाश में थे जो गंगा और भारत से भावनात्मक स्तर पर जोड़ा जा सके. अनिल अग्रवाल ने बाद में द टेलीग्राफ से कहा था,  नितिन गडकरी जी ने मुझे पटना के गंगा तट को खूबसूरत बनाने का प्रस्ताव दिया जो कि मेरा जन्मस्थान है. गडकरी जी एक आधुनिक भारत जो अपने संस्कृति और मूल्यों से जुड़ा हो, के निर्माण के लिए एक दूरदर्शी आदमी है. गंगा के कायाकल्प करने की योजना इसका एक उदाहरण है. मैंने खुशी-खुशी इसे स्वीकार कर लिया है. मुझे बहुत खुशी हुई इस बहुमूल्य परियोजना से जुड़कर.?उन्होंने आगे यह भी बताया था कि उन्होंने गडकरी को लंदन में अपने घर पर आने का न्योता भी दिया है. उद्योग दुनिया के सूत्रों का मानना है कि खनन व्यवसाय की दुनिया का यह बेताज बादशाह लंदन में मोदी सरकार का सबसे महत्वपूर्ण आदमी है मई 2017 में ब्रिटेन में मोदी सरकार की उजाला योजना को सबसे पहले वेदांता ने ही अपनाया था. इस योजना के तहत सभी पुराने बल्ब हटाकर उनकी जगह ऊर्जा की बचत करने वाले एलईडी बल्बों को प्रचलन में लाना था. कोयला मंत्री पीयूष गोयल जो उस समय ब्रिटेन में थे, ने वेदांता और भारतीय उच्च आयोग को एलईडी बल्ब देकर इन योजना की शुरुआत की.


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