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नैसर्गिक सौंदर्य के बीच अमरता की यात्रा है बाबा अमरनाथ यात्रा

नैसर्गिक सौंदर्य के बीच अमरता की यात्रा है बाबा अमरनाथ यात्रा

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 297 दिन 13 घंटे पूर्व
28/06/2018
भोपाल (महामीडिया) अमरनाथ यात्रा आज से शुरू हो रही है। अमरनाथ गुफा भगवान शिव के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से एक है। अमरनाथ को तीर्थों का तीर्थ कहा जाता है क्योंकि यहीं पर भगवान शिव ने माँ पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताया था। यह केवल श्रद्धा की यात्रा ही नहीं, वरन भक्ति, ज्ञान और कर्म को सार्थक करती यात्रा भी है। कश्मीर धरती का स्वर्ग कहलाता है, लेकिन भारतीय मानस स्वर्ग को नहीं पाना चाहता। वह तो इस स्वर्ग के सौंदर्य को निहारकर वहां पहुंचना चाहता है, जहां का सौंदर्य अविनाशी है। अमरता की यात्रा तब तक संभव नहीं है, जब तक कि देह के प्रति हमारा अभिमान न समाप्त हो जाए। इससे मुक्त होकर हम बाहर के नैसर्गिक सौंदर्य की तरह अपने भीतर अमरता का एक विराट सौंदर्य रच लेते हैं, जो सत्य है और शिव भी है। माना जाता है कि जब पार्वती ने शिव से अमर कथा सुननी चाही, तो यही स्थान धन्य हुआ था, लेकिन यहां तक आते-आते भगवान शिव ने अपने सभी प्रिय पात्रों- चंद्रमा, नंदी, नाग, गंगा और गणेश को एक-एक कर मार्ग में छोड़ दिया था। वे इन पांचों अर्थात चंद्रमा, नंदी, नाग, गंगा और गणेश को इसलिए छोड़ते हैं, क्योंकि ये पंच महाभूतों के प्रतीक हैं। पंच महाभूत ही देह को रचते हैं। पहले पंच महाभूतों से बनी देह का अभिमान छोड़ना ही पड़ेगा, तभी यह यात्रा संभव होगी। शायद इसलिए यह यात्रा बेहद कठिन भी है। श्रीनगर से यात्री पहलगांव अथवा बालटाल होकर इस पवित्र गुफा तक जाते हैं। बालटाल का मार्ग छोटा है, भगवान शंकर और जगदंबा पार्वती इसी मार्ग से पवित्र गुफा तक गए थे। यह मार्ग चंदनवाड़ी और शेषनाग से होकर पंचतरणी तक पहुंचता है और फिर पवित्र गुफा की यात्रा आरंभ होती है। संपूर्ण मार्ग में प्रकृति का अनुपम सौंदर्य तो है, लेकिन मार्ग कठिन और खतरों से भरा हुआ है। पंच महाभूतों के देहाभिमान को त्यागकर तथा कठिन यात्रा के बाद श्रद्धालु जब पहुंचते हैं तो उन्हें लगता है कि प्राणतत्व सूक्ष्म हो गया है, क्योंकि यहां प्राणदायिनी ऑक्सीजन बहुत कम है। वहां प्रकृति और पुरुष अमरतत्व के लिए संवाद करते हैं, तो फिर प्रकट होता है आत्मतत्व, जो लिंगरूप है। यह आत्मतत्व परमात्मा का अंश रूप है, लेकिन वेदांत कहता है- 'पूर्णात पूर्णं उदच्युते'। पूर्ण से जो प्रकट हुआ, वह स्वयं भी पूर्ण है। इसलिए अमरनाथ बाबा लिंग रूप में आत्म तत्व भी हैं और स्वयं परमात्मा भी। इस स्थान से जुड़ी अनेक कथाएं भी यहां लोग सुनाते हैं। इसी गुफा में माता पार्वती को भगवान शिव ने अमरकथा सुनाई थी, जिसे सुनकर सद्योजात शुक-शिशु शुकदेव ऋषि के रूप में अमर हो गये थे। गुफा में आज भी श्रद्धालुओं को कबूतरों का एक जोड़ा दिखाई दे जाता है, जिन्हें श्रद्धालु अमर पक्षी बताते हैं। वे भी अमरकथा सुनकर अमर हुए हैं। ऐसी मान्यता भी है कि जिन श्रद्धालुओं को कबूतरों को जोड़ा दिखाई देता है, उन्हें शिव पार्वती अपने प्रत्यक्ष दर्शनों से निहाल करके उस प्राणी को मुक्ति प्रदान करते हैं। इस यात्रा में जाने वाले तो धन्य होते ही हैं, जो अपनी जीवन यात्रा में देहाभिमान से मुक्त हो रहे हैं और प्राणों के सूक्ष्म होते क्षणों में भी प्रकृति से आत्म-तत्व तक जाने का संवाद कर रहे हैं, उन सबके भीतर भी स्वयं शिव आकार ले रहे हैं। यही शिवलिंग रूप में आत्मतत्व है, लेकिन मूल रूप में परम ही हैं और इन्हें ही हम श्रद्धावश 'बर्फानी बाबा' अमरनाथ कहकर बुलाते हैं। प्राकृतिक हिम से निर्मित होने के कारण इसे स्वयंभू हिमानी शिवलिंग भी कहते हैं। आषाढ़ पूर्णिमा से शुरू होकर रक्षाबंधन तक पूरे सावन महीने में होने वाले पवित्र हिमलिंग दर्शन के लिए लाखों लोग यहां आते हैं।
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