महामीडिया न्यूज सर्विस
कर्म का प्रतिफल

कर्म का प्रतिफल

admin | पोस्ट किया गया 136 दिन 44 सेकंड पूर्व
03/07/2018
भोपाल (महामीडिया) एक तपस्वी सन्त थे। जिनकी त्याग, तपस्या व चर्या को देखकर न मात्र उनके शिष्य वरन उनके सम्पर्क में आने वाले अन्य व्यक्ति भी उनके गुणों की महिमा का वर्णन करते नहीं थकते। सैकड़ों की संख्या में शिष्य वाले उन गुरू के शिष्य एक दिन बैठकर आपस में चर्चा कर रहे थे कि एक व्यक्ति जो देखने में दरिद्र दिखाई दे रहा था वहाँ आकर गिड़गिड़ाने लगा। वो व्यक्ति बोला मेरी स्थिति बहुत दयनीय है, खाने को कुछ भी नहीं है, कार्य भी नहीं है। परिवार की स्थिति जिस प्रकार की है, मन करता है आत्महत्या कर लूं। शिष्यों ने जब इस बात को सुना तो उन्हें करूणा आई। सन्त जी तुम्हारी सहायता अवश्य करेंगे। वो व्यक्ति ऊपर कमरे के बाहर जाकर बैठ गया। शिष्य भी पीछे-पीछे ऊपर गए इसकी पीड़ा सुनकर सन्त जी पिघल जाएंगे और इसे धनवान होने का मंत्र देंगे, लक्ष्मी यंत्र आदि देगें। मंत्र को हम लोग भी सुन लेगें जिससे फिर कोई दुखियारा आए तो उसकी सहायता कर सकें। कुछ देर प्रतीक्षा करने के बाद सन्त कमरे से बाहर आए उन्होनें रोते गिड़गिड़ाते व्यक्ति को देखकर कहा-कहो क्या बात है? क्यों रो रहे हो? उस व्यक्ति ने अपनी पीड़ा गुरू के सामने रख दी। गुरू ने समस्त व्यथा को सुना फिर कहा- "अच्छा स्थिति दयनीय है, ठीक है जाओ कर्म करों।" उस व्यक्ति ने सुना हाथ जोड़े और सिर झुकाकर रवाना हो गया। शिष्यों ने सुना तो उन्हें कानों पर विश्वास नहीं हुआ। वे सोच में पड़ गए। ये कैसे गुरू हैं। हम तो सोच रहे थे उसे धनवान होने का मंत्र देगें, कर्म करने की क्षमता होती तो क्या यह सहायता मांगने आता और हां यह भी कैसा मूर्ख है कुछ कहने के स्थान पर सर झुकाकर चला गया। उधर शिष्य तनाव में कि हमने तो गुरू की महिमा को सुन रखा था कि ये दयानिधान है, ज्ञानी हैं, दयालु हैं, परोपकारी हैं। पर इनमें तो इनमें से एक भी गुण दिखाई नहीं दिया। हमने गलत गुरू तो नहीं चुन लिए आदि-आदि। गुरू ने उनकी मन की बात को जान लिया, मौन धारण किया, फिर बोले-अच्छा यह बात है। तुम चाहते हो कि मैं उसकी सहायता करता। सबने कहा हाँ। गुरू बोले-क्या तुम चाहते हो मैं उस व्यक्ति के लिए पैसा एकत्रित कर उसे दिलवाता। पर बताओ वह इससे कितने दिन निकाल लेता और फिर हष्ट-पुष्ट व्यक्ति को भिक्षु बनाकर क्या मैं उसके साथ न्याय कर पाता। क्या भीख से गुजर बसर करने वाला व्यक्ति स्वयं अपनी दृष्टि में नहीं गिर जाता। छ:-आठ माह बीते होगें सभी शिष्य सुबह व्यक्तिगत अध्ययन कर रहे थे। उन्हे एक व्यक्ति सुन्दर कपड़ों में परिवार सहित आता दिखाई दिया। सबने उसे पहचान लिया कि अरे यह तो वही है जो...। पर इसकी स्थिति तो परिवर्तित हुई है। वह आदमी सीधे गुरू जी के कक्ष में गया। गुरू जी को नमन किया। गुरु जी उसे पहचान गए और बोले-कर्म कर रहे हो या...। वो बोला गुरूदेव मैं आपकी बात को न तो भूला हूँ और न ही भूलूंगा। मैं छ:-आठ माह पूर्व जब आपके पास आया था उस समय मेरे पास कुछ भी नहीं था मेरी मरने की सी स्थिति थी। उस स्थिति को देखकर भी आपने कहा था कि- "कर्म" करो और मैंने उस बात को स्वीकार किया क्योंकि मैं जानता था और मैंने आपके विषय में सुन रखा था कि आपके श्रीमुख से जो निकल गया वो अवश्य पूरा होगा। यदि आपने कहा है कि कर्म करो तो इसका तात्पर्य हैं मैं इस लायक बनूंगा और मैंने ऐसा ही किया। गुरू की आज्ञा को प्रमाण मानकर मैंने प्रयत्न प्रारंभ किया। जो बचता उसका एक बड़ा भाग मैं सत्कार्य में अथवा सत्पात्र को दान देने में लगाता। आज उसी कर्म का प्रतिफल है कि मैं व मेरा परिवार इस लायक बने है। मैं आज हर दृष्टि से सक्षम हूँ। सन्त मन्द-मन्द मुस्कराए और हाथ उठाकर उसे आशीष दिया। शिष्यों ने जब यह देखा व सुना तो वे ग्लानि व शर्म से पानी-पानी हो गए। उन्होने अपने तब के व्यवहार के लिए गुरू से क्षमा याचना की। गुरू मुस्कराए और बोले प्रत्येक व्यक्ति अपने कर्म के अनुसार फल पाता है। आपने जो किया है उसका फल तो आपको भोगना ही पड़ेगा। कभी तुरन्त हो कभी बाद में। निर्धन की सहायता पैसा या अन्य सुविधा देकर नहीं की जा सकती। इससे उसकी निर्धनता कभी दूर नहीं होगी वो वैसा ही बना रहेगा। सहायता अथवा भीख पर पलने वाले का क्या कभी कल्याण हुआ है। यदि ऐसा होता तो निर्धनता कभी की मिट चुकी होगी। हम सहायता देकर उसे नाकारा बना रहे हैं। अत: उसे लायक बनाओ। चिकित्सक किसी रोगी व्यक्ति को देखकर ही उसे औषधि दे देता है या पहले उसके रोग के कारणों को खोजता है। कारण देखकर औषधि देने पर ही रोगी का उपचार सम्भव है। इसलिए सहायता से पहले व्यक्ति की दशा के कारणों का पता लगाया जाना चाहिए और मैंने वह ही किया। सन्त बोले कर्म की बहुत बडी महिमा है। प्रत्येक व्यक्ति को सत्कार्य, सद्मार्ग व अपनी क्षमतानुसार कर्म  करना चाहिए। कर्म किसान द्वारा खेत में बीज डालने के समान है। कर्म रूपी बीज बोओगे तभी तो फसल रूपी प्रतिफल मिलेगा और उस व्यक्ति के साथ ऐसा ही हुआ। अनेक बार गुरू कुछ अर्थहीन सी लगने वाली बात कह दें तो भी उसे ब्रह्म वाक्य मानकर मानना चाहिये। "गुरूआज्ञा अविचारणीय" ऐसा शास्त्रों का मत है। पावन श्रीगुरू पूर्णिमा के अवसर पर श्री गुरू चरणों में कोटि-कोटि नमन।
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