महामीडिया न्यूज सर्विस
समर्थन मूल्य में ऐतिहासिक वृद्धि

समर्थन मूल्य में ऐतिहासिक वृद्धि

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 77 दिन 10 घंटे पूर्व
09/07/2018
भोपाल (महामीडिया) एक समय था जब किसान को उम्मीद थी कि जमीदारी के शोषण से छुटकारा मिलेगा। जमीदारी उनमूलन से छुटकारा तो मिल गया लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों ने किसान की फसल के उत्पादन पर जबरिया लेव्ही लगा दी और लेव्ही न देने वाले किसान को दंड का भागी घोषित कर दिया। किसान इस तरह नजराना देने के लिए विवश रहा। समय परिवर्तनशील है। सरकार ने फसल का समर्थन मूल्य घोषित करके किसान को मंदी के दौर में फौरी राहत दी, लेकिन बढ़ती लागत को देखते हुए जब किसान के माथे पर चिंता की लकीरे नजर आयी नरेन्द्र मोदी ने 16 वी लोकसभा चुनाव में किसान की बढती लागत को दृष्टि में देखते हुए कृषि की लागत पर पचास प्रतिशत अधिक मूल्य निर्धारित कर न्यूनतम समर्थन मूल्य बढाने का 2014 में भरोसा दिलाया। गत 4 जुलाई को नरेन्द्र मोदी सरकार ने अपना वायदा पूरा करते हुए नजराना लेव्ही वसूलने के बजाए अधिक मूल्य की गारंटी के रूप में शुकराना अदा करके देश के सोलह करोड किसान परिवारों को हौसल बुलंद किया है। एनडीए सरकार अपने वायदे पर खरी उतरी है।इतना ही नहीं नरेन्द्र मोदी ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि किसान की पूरी फसल की गणना कर उसे लाभ पहंुचाने के लिए जल्दी ही नई नीति जल्दी ही लायी जायेगी। क्योंकि मौजूदा समर्थन मूल्य खरीदी का लाभ सभी किसानों को नहीं मिल पाता। एक तिहाई किसान है। न्यूनतम समर्थन मूल्य खरीदी योजना के अंचल में आ पाते है अधिकृत सूत्रों का मानना है कि अक्अूबर 2018 तक सगम्र फसल उपार्जन की प्रस्तावित योजना किसानों के सामने आ जाने की संभावना है। हरित क्रांति ने देश में कृषि उत्पादन में वृद्धि करके भारत केा अन्न के मामले में आत्मनिर्भर बनाया लेकिन जिन संसाधनों का हरित क्रांति लाने में उपयोग हुआ वे समय के साथ महंगे साबित हुए। सभी संसाधनों पर कार्पोरेट का कब्जा हो गया। किसानों को मिलने वाली सब्सिडी किसानों तक पहंुचने के बजाए खाद, बीज, कृषि उपकरण बनाने वाले कार्पोरेट घरानों ने हडप ली। मोदी सरकार ने इस खेल को बंद करने के लिए डायरेक्ट बेनीफिट ट्रांसफर प्रक्रिया को अपना कर कमोवेश 90 करोड रूपए की बचत की है। किसान के पंसदीदा रासायनिक उर्वरक के मामले में तो एनडीए सरकार ने यूरिया को नीम कोटेड बनाकर ऐतिहासिक कदम उठाया हैं इससे यूरिया हडपने, भ्रष्टाचार करने के सभी रास्ते बंद हो गए है। मोदी सरकार ने बढती कृषि लागत पर प्रहार करते हुए हर किसान की जमीन का स्वाइल हेल्थ कार्ड बनाकर अनावश्यक खाद डालने की प्रवृत्ति को रोका है। जैविक खेती को बढावा दिया गया है। इससे लागत में तीस से 35 प्रतिशत की कमी आयी है। ऐसे में न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि करके सरकार ने किसानों की हताशा को दूर करने का प्रयास किया है। इससे एक मोटे अनुमान के अनुसार किसान को प्रति एकड़ 6 से 8 हजार रूपए रूपए का लाभ हो सकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने समर्थन मूल्य वृद्धि करते हुए कहा है कि इससे किसानों डेढ गुना समर्थन मूल्य देने का वायदा पूरा हुआ है। तथापित किसान हित में नई नीति लायी जायेगी। और किसान के हित में केन्द्र सरकार सहानुभूति पूर्वक कदम उठाती रहेगी। राजनैतिक दलों ने किसानों की आत्महत्या को लेकर चिंता व्यक्त की है। लेकिन उनकी चिंता किसान हित में होने के बजाए सियासी हथकंडा रहा है। यह बात इससे ही साबित हो जाती ळै कि पूर्ववर्ती सरकारों ने किसानी के लिए जाने वाले कर्ज पर उद्योगों के समकक्ष रियासत नहीं बरती। इस गंभीर मामले पर सबसे पहले विचार अटलबिहारी वाजपेयी सरकार ने किया और उस एजेंडा को प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने सर्वोच्च प्राथमिकता देकर किसान की आय 2022 स्वतंत्रता की 75 वी वर्षगांठ तक दोगुना करने का संकल्प लिया। धान पर समर्थन मूल्य 200 रूपए क्विंटल बढाया गया हैै। यह वृद्धि 12.90 प्रतिशत है जबकि धान ग्रेड ए पर वृद्धि 11.32 प्रतिशत, ज्वार हाइब्रिड 42.94, ज्वाल मालदंडी 2.03, बाजरा 36.84, कपास मध्यम 28, कपास लंबारेशा 26.16, अरहर 4.13, मूंग 25.11, उड़द 3.70, अलसी 52.47, मक्का 19.30, मूंगफली 9.89, सूरजमुखी 31.42, सोयाबीन 11.44 और तिल 17.01 प्रतिशत मूल्य वृद्धि की गई है।  जब किसान हितैषी बात आती है अर्थशास्त्री हर वृद्धि के साथ सवाल उठा देते है कि इस मूल्य वृद्धि से महंगाई में उछाल आयेगा। लेकिन केंद्र सरकार का दावा है कि इससे न तो बजट घाटा प्रभावित होगा और न मुद्रा स्फीति बढ़ने दी जायेगी। हांलाकि कुछ अर्थशास्त्रियों ने 0.5 प्रतिशत महंगाई बढ़ने की आशंका जताई है। नरेंद्र मोदी सरकार का ध्यान जब देश में अधोसंरचना पर केन्द्रित है। कृषि को लाभकारी बनाने के लिए सिंचाई का बजट बढ़ाया गया है। देश में नदी जोड़ो अभियान में तेजी लायी जा रही है। समर्थन मूल्य में वृद्धि करके श्री नरेंद्र मोदी सरकार ने 15000 करोड़ रूपए से अधिक का आर्थिक बोझ उठाया है। यह वास्तव में परिवर्तनकारी अभियान है और इसकी सराहना की जाना चाहिए। तथापि आने वाले समय के लिए कुछ ज्वलंत सवाल भी सरकार के सामने है। समर्थन मूल्य खरीदी का आधार यही है कि बाजार में समर्थन मूल्य किसी जिसका गिर जाता है तो सरकार को तय कीमत पर उस जिंस को खरीदना चाहिए जिससे दाम गिरने न पाये। लेकिन अब इसका जवाब भी चलता है, व्यवहारिक नहीं है। कृषि लागत और मूल्य आयोग एक ही वाक्य दोहराता है कि आशा की जाती है कि किसान को समर्थन मूल्य से अधिक कीमत मिलती रहेगी। इस बात में कही संदेह नहीं है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य काम करता है, लेकिन खेती की परिस्थति अजीब और गड़बड़ है। इससे किसान का अर्थशास्त्र गडबडा जाता है। गैर कृषि क्षेत्र में मासिक आय का एक जरिया होता है जो अर्थ के प्रवाह को बनाये रखताहै लेकिन खेती में काश्तकार जिस दिन से फसल लेने के लिए खेत की जुताई शुरू करता है। फसल आने तक उसे धनराशि का इंतजार करना पड़ता है, उस पर दोहरी मार पड़ती है खेती में निवेश और परिवार का भरण पोषण करना। उसकी सहनशीलता देखे कि छैः माह फसल के इंताजार में व्यतीत कर देता है। इसलिए फसल खलिहान में आते ही उसे बेचने की जल्दी पड़ती है। छैःमाह में जितनी उधारी होती है साहूकार किसान के दरवाजे खड़ा हो जाता है। विवशता का लाभ जमाखोर उठाते हैं। मध्यप्रदेश में श्री शिवराज सिंह चैहान ने इस मजबूरी को समझकर किसान को फसल मंडी में लाने का भाड़ा मंजूर किया है और फसल की भरपूर कीमत मिलने तक लायसेंसशुदा गोदाम में रखने के लिए तीन माह का किराया देने का प्रावधान किया है। इस बीच बैंक से एडवांस भी किसान ले सकता है, लेकिन किसान की मजबूरी है कि तत्काल नकद राशि मिले। ऐसे में आदर्श स्थिति यही हो सकती है कि किसान को समर्थन मूल्य से 20 से 25 प्रतिशत ऊंचा दाम मिले। इसके लिए विपणन व्यवस्था और वणिक मानसिकता में सुधार और परिष्कार की अपेक्षा है। खेती को बाजार मूल्य अर्थव्यवस्था से मुक्त करना होगा। ऐसे में न तो सरकार को फसल खरीदना पड़ेगी और न भंडारण की अड़चन किसान को उठाना पड़ेगी।  लेकिन विडंबना यह है कि तमाम पावंदियां। हालांकि मोदी सरकार ने विपणन का तंत्र विकसित किया है। ई-प्लेटफार्म बना कर देश की मंडियों को जोड़ा है, लेकिन लघु सीमान्त किसान की इन तक पहुंच ही नहीं है। समर्थन मूलय में वृद्धि करके केंद्र सरकार ने किसानों को शुकराना अदा किया है। लेकिन ऐसी परिस्थिति बनाने पर विचार करने की आवश्यकता है कि किसान को जिन्स का भरपूर मूल्य मिले। उससे कम मिले तो जोखिम को न्यूनतम समर्थन मूल्य प्रणाली थामने में समर्थ हो। समर्थन मूल्य वृद्धि की घोषणा के साथ देश में सियासत भी शुरू हो गई है। कुछ अर्थशास्त्रियों ने कहा कि है कि मोदी सरकार ने आंशिक वायदा ही पूरा किया है। उनका कहना है कि न्यूनतम समर्थन मूलय जो घोषित किया गया है उसमें सिंचाई बीज जैसा खर्च तो शामिल है लेकिन भूमि की कीमत, किराया, ब्याज परिवार का श्रम जैसी राशि की गणना नहीं की गई है। यह आरोप अपने आप में सही भी हो सकता है लेकिन जितना कुछ मूल्य वृद्धि के रूप में दिया गया है वह एक सकारात्मक, निर्णायक पहल है। इससे हताशा का कुताशा छटेगा। किसान की क्रयशक्ति बढ़ेगी। उसकी जेब में अधिक पैसा पहुंचेगा। महात्मा तुलसीदास समाज शास्त्री थे लेकिन अर्थशास्त्री नहीं थे, लेकिन उनका यह कथन वास्तव में अर्थपूर्ण है कि "अर्ध तजिय पुनि सर्वस जाता" किसान का संकट दशकों तक कृषि की उपेक्षा का दुष्परिणाम है। आज जो राजनेता किसानों की बेबशी, खुदकशी पर सियासत कर रहे हैं उन्हें आत्म परीक्षण करने का वक्त है कि इस संकट के निवारण में भले ही श्री नरेंद्र मोदी सरकार कोशिश करते हुए दिखाई दे रहे है लेकिन आज आलोचना करने वाले दल सत्ता में रहकर सिवा मंचीय सियासत के मैदान में कुछ करते हुए क्यों नहीं दिखाई दिये। वक्त ने उन्हें भी मौका और सामथ्र्य दिया था। वे क्यों इसमें चूक गये और अब जब एनडीए सरकार ने विपरीत परिस्थितयों में कमर कसकर अन्नदाता की सुधि ली है तो विपक्ष मीन मेख निकाल रहा है।
- भरतचन्द्र नायक
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