महामीडिया न्यूज सर्विस
"विश्वास" ही आनन्द है

"विश्वास" ही आनन्द है

admin | पोस्ट किया गया 101 दिन 1 घंटे पूर्व
07/08/2018
भोपाल (महामीडिया) जीवन का मूल आधार ही विश्वास है। भक्त का भगवान पर, गुरु का शिष्य पर, मां का पुत्र पर, पिता का परिवार पर, परिवार को समाज पर और समाज को देश पर और देश को देशवासियों पर। किंतु यह विश्वास परस्पर होना आवश्यक है और दोनों और के प्रयास से यह अदूर हो जाता है।
विश्वास का आधार क्या है? संभवत: प्रेम, श्रद्धा, आस्था, विचार, समझ और इन सब से बढ़कर समर्पण। आज संभवत: यह सब मान बैठे हैं कि उपरोक्त शब्द अब उपयोगी नहीं हैं किंतु जब आप ठहर कर इस पर विचार करेंगे तो आप मानेंगे कि आपके द्वारा जो भी सम्बन्ध या व्यवहार किया जा रहा है उसके मूल में यही विश्वास है जो युवराज राम को भगवान श्रीराम बनाता है और भक्त हनुमान को भक्त से भगवान बनाता है। यह विश्वास ही हमारी संस्कृति का आधार है जब एक बालक के कहने पर भगवान पत्थर के स्तंभ से अवतरित हो जाते हैं और पत्थर रुपी अहिल्या को स्पर्श कर उसमें के प्राण जगाते हैं, शबरी कि अथक प्रतीक्षा को स्वीकार्य कर उसके झूठे फल खाते हैं।
तनिक रुकिये और स्वयं में उस विष्वास को खोजिये जो तुलसी दास जी को रामचरित मानस लिखने के लिये प्रेरित करता है। अपने मन को चेतना कि लगाम से साधते हुए क्षणिक आनंद से परम आनंद कि और प्रशस्त कीजिये। यह एक आंतरिक अनुभव है, जो आपको भीतर से आनन्दित कर देगा। किंतु आप कहां उस आनन्द से सराबोर होना चाहते। आप तो वर्षा की क्षणिक बौछार से डरकर स्वयं को उस आनन्द से दूर कर लेते हैं, कि कहीं यह वर्षा कि बौछार मुझे अस्वस्थ न कर दें। आपको अपनी इस रक्षात्मक काल्पनिक सीमा से बाहर लाना होगा। क्योंकि इसके भीतर आपको सुरक्षित रहने का भ्रम है किंतु जो इस भ्रम से भ्रमित न होकर उस सीमा से बाहर निकलता है, वही उस आनन्द को प्राप्त कर ब्रह्म से अपना सम्बन्ध बना पाता है। क्योंकि संभवत: मीरा ने विष का पान इसी आधार पर किया कि सब कुछ कृष्ण ही है और कृष्ण विष नहीं वह तो अमृत है, वह श्रद्धा, भक्ति और प्रेम का सागर है, वही तो एकमात्र सत्य है और यही विष्वास। हम सभी को अपने जीवन में विष का पान करना है। जिसको उस विष में भगवान दिखाई देता है वह अमर हो जाता अर्थात वह स्वयं, स्वयं में न रहकर ईश्वर में मिल जाता है। अन्तत: भगवान शिव, राम और कृष्ण या हमारे आराध्य क्या हैं? एक विश्वास ही तो हैं। जिनकी प्रेरणा व कृपा से हम अपनी वर्तमान स्थिति में परिवर्तन का प्रयास करते हैं। और अपनी अनुकूल स्थितियों से परिवर्तन चाहते और प्रयास करते हैं। मेरे स्वयं के अध्ययन का मानना है, कि जो अपनी अल्प बुद्धि से कुएं को ही अपनी दुनिया मान लेता है वह कुएं का मेढ़क बनकर ही रह जाता है। जो साहस के साथ अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलकर सृष्टि का आनन्द लेना चाहता है वही प्रयास करता है और पा जाता है। 
हजारों करोड़ों लोगों में संभवत- ऐसे मानव जन्म लेते हैं जो बिना विश्राम के उस अनंत की खोज में यात्रा करते हैं और महामानव होकर उस अन्तिम विश्वास की ओर चलने के लिये सभी को प्रेरित और प्रोत्साहित कर आनन्द कि यात्रा का सहयात्री बनाते हैं। जिस प्रकार परमपूज्य महर्षि महेश योगी जी ने अनन्त आनंद कि गागर "भावातीत-ध्यान" का अनुभव कराया। यह "भावातीत-ध्यान" रूपी आनन्द कि धारा अविरल सम्पूर्ण विश्व में बह रही है जो विश्वास कर उसमें डुबकी लगाता है वह आनन्द से भर जाता है।
जय गुरूदेव, जय महर्षि
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