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धारणा-ध्यान-समाधि

धारणा-ध्यान-समाधि

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 411 दिन 8 घंटे पूर्व
07/08/2018
धारणा-ध्यान-समाधि
भोपाल (महामीडिया) धारणा - तीन अंतरङ्ग विषय धारणा, ध्यान और समाधि हैं। इन्हें ही 'संयम' कहा गया है। बहिरङ्ग के अन्तिम पड़ाव प्रत्याहार में इन्द्रियाँ बाह्य जगत के व्यवहार से अलग होकर अन्तर्मुखी होने लगती हैं। धारणा में यही क्रम आगे बढ़ता है और अब चित्त कहीं एक स्थान में ठहर जाता है। यह स्थान वास्तव में चेतना है जहां ध्यान की प्रक्रिया प्रारम्भ होती है। धारणा का आधार है और ध्यान समाधि की अवस्था का आधार है।
देशबन्धश्चित्तस्य धारणा
योगदर्शन अध्याय-3 सूत्र-1
धारणा के माध्यम से हम जाग्रत, स्वप्न व सुशुप्ति की चेतना के स्तर को पार करके चेतना की चौथी स्थिति-तुरीय या भावातीत चेतना की स्थिति में पहुंचने के लिये तैयार हो जाते हैं। प्रत्याहार से धारणा, धारणा से ध्यान और ध्यान से समाधि में पहुंचने की क्रिया अत्यन्त सरल है, स्वाभाविक है और प्रयासरहित है। यदि हम धारणा, ध्यान या समाधि लगाने का प्रयत्न करेंगे, बल प्रयोग करेंगे तो तीनों ही अवस्थाओं का अनुभव नहीं होगा। पत्ते पर स्थित जल की बूंद स्वयं फिसलकर गिर पड़ती है। यदि उसे अंगुली से आगे बढ़ाकर गिराने का प्रयत्न करें तो जल अंगुली में चिपककर रह जाता है आगे नहीं बढ़ता। अत: संयम की प्रक्रिया बहुत स्वाभाविक रूप से घटित हो जाती है।
ध्यान-
तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्
योगदर्शन अध्याय-3 सूत्र-2
धारणा से होते हुये मन या चित्त जिस किसी एक देश या क्षेत्र में स्थित हो जाये और फिर वहां पूर्ण जाग्रत तो रहे किन्तु मन या चित्त या चित्तवृत्तियाँ या इन्द्रियवृतियाँ पूर्णत: शाँत रहें, किसी तरह का विचार न रह जाये, कोई मनोवृत्ति हलचल न करें, तो ये ध्यान की अवस्था है। मन की पूर्ण शाँति होना, कर्म, हर्ष, विषाद, वासना आदि सभी वृत्तियों का लोप होना ध्यान की अवस्था है। स्वाभाविक रूप से प्रयासरहित होकर भी विश्रान्ति की प्राप्ति ही ध्यान की अवस्था है।
महर्षि महेश योगी जी ने अष्टांङ्ग योग को भारतवर्ष के कोने-कोने में 1957-58 में फैलाया और फिर समस्त विश्व में पिछले 58 वर्षों में 100 से भी अधिक राष्ट्रों में इस योग विद्या की ध्वजा फहराई। महर्षि जी ने भावातीत ध्यान की तकनीक के माध्यम से करोड़ों लोगों को ध्यानस्थ और समाधिष्ट होने का अनुभव दिया और इसके अनेकानेक लाभकारी प्रभाव दिये जो महर्षि पतञ्जलि और अन्य महर्षियो ने बताये हैं।
भावातीत ध्यान सम्पूर्ण विश्व में इसलिए बहुत अधिक स्वीकार्य हुआ क्योंकि इस तकनीक में कोई प्रयत्न की आवश्यकता नहीं है। किसी भी धर्म, जाति, वर्ग, लिंग, विश्वास या आस्था का व्यक्ति ध्यान की इस सरल प्रक्रिया को सीखकर आजीवन इसका अभ्यास करके अनेक लाभों की प्रप्ति कर सकता है।
समाधि-
तदेवार्थमात्रनिर्भांस स्वरूपशून्यमिव समाधि:
योगदर्शन अध्याय-3 सूत्र-3
ध्यान की अवस्था में वृत्तियाँ पूर्णत: शाँत हो जाती हैं, मात्र अपने स्वयं की जागृति, एक भास सा बना रहता है, यह एक अत्यन्त आनन्दायक अवस्था है। ध्यान के लगातार अभ्यास से स्वाभावत: ही मन या चित्त अगले स्तर पर पहुंचता है जिसे समाधि के नाम से जाना जाता है। समाधि की स्थिति में जो भी वृत्ति ध्यान में कहीं मात्र भास रूप भी रह जाती है, उसकी उपस्थिति भी अब नहीं रह जाती। समझने के लिये कह सकते हैं कि एक शून्य की अवस्था होती है। मन, चित्त, चेतना जिस नाम से भी कहें ब वह तदरूप हो जाता है, मात्र अपने आप में रह जाता है, मात्र स्व अर्थात् आत्मरूप हो जाता है, चिद्रूप हो जाता है, यह समाधि की अवस्था है। यहाँ समस्त इन्द्रियों, वृत्तियों, इच्छाओं, विचारों, विकारों की परम अनुपस्थिति होती है। मात्र आत्मा, आत्मा को जानती है, उसी विचरती है, रमण करती है। यह स्थिति ही चिदानन्द, परमानन्द, आत्मानन्द, भगवद्आनन्द, आत्मा से परमात्मा के मिलन की स्थित है। यही स्थिति जीव के ब्रह्म हो जाने की स्थिति है। "अयमात्मा ब्रह्म" की स्थिति है, समाधि की स्थिति और उसके परिणामों को सिद्धयों की प्राप्ति बताया गया है। ध्यान की परिपक्वता और परम दृढ़ता ही समाधि की अवस्था है।
त्रयमेकत्र संयम और संयम का परिणाम अव्यक्त आत्म-चेतना तथा व्यक्त भौतिक रूप शरीर का प्रकाशमान होना है।
महर्षि जी ने भावातीत ध्यान के अभ्यास के बाद पतञ्जलि योग सूत्रों पर आधारित ध्यान-सिद्धि कार्यक्रम दिया। जब ध्यान के द्वारा भावातीत चेतना तक पहुंचकर स्व में स्थित हुए, समाधि की अवस्था में स्थिर होते हैं तो यह क्षेत्र समत्व योग का क्षेत्र (आधुनिक भौतिक वैज्ञानिकों ने इसे वल्लारीगिरी का क्षेत्र कहा) कहलाता है। यह क्षेत्र समस्त ज्ञान, प्रकृति के समस्त नियमों का क्षेत्र है, घर है, यहीं समस्त सम्भावनएं सुलभ हैं। परमेव्योमन, चिदाकाश का यही क्षेत्र देवताओं का क्षेत्र है, समस्त ऋषियों और सिद्धयों का स्त्रोत है। यहीं विश्व के समस्त देवताओं का वास है ऋचो अक्षरे परमे व्योमन, यस्मिन देवा अधि विश्वें निषेदु:।
चेतना की प्रथम अवस्था जागृत की चेतना से स्वप्न, सुशुप्ति, भावातीत, तुरीयातीत, भगवत् और ब्राह्मीय चेतना तक पहुंचने की यात्रा ही योग की स्थिति है जिसे योग की भाषा में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि कहा गया।
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