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नन्द के आनन्द भयो जय कन्हैया लाल की

नन्द के आनन्द भयो जय कन्हैया लाल की

admin | पोस्ट किया गया 104 दिन 21 घंटे पूर्व
02/09/2018
भोपाल (महामीडिया) श्री कृष्णजन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण का जनमोत्स्व है। योगेश्वर कृष्ण के भगवद गीता के उपदेश अनादि काल से जनमानस के लिए जीवन दर्शन प्रस्तुत करते रहे हैं। जन्माष्टमी भारत में हीं नहीं विदेशों में बसे भारतीय भी इसे पूरी आस्था व आनंद से मनाते हैं। श्रीकृष्ण ने अपना अवतार श्रावण माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में लिया। चूंकि भगवान स्वयं इस दिन पृथ्वी पर अवतरित हुए थे अत: इस दिन को कृष्ण जन्माष्टमी के रूप में मनाते हैं। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर मथुरा नगरी भक्ति के रंगों से सराबोर हो उठती है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन अवसर पर भगवान कान्हा की मोहक छवि देखने के लिए दूर दूर से श्रद्धालु आज के दिन मथुरा पहुंचते हैं। श्रीकृष्ण जन्मोत्सव पर मथुरा कृष्णमय हो जात है। मंदिरों को खास तौर पर सजाया जाता है। जन्माष्टमी में स्त्री-पुरुष बारह बजे तक व्रत रखते हैं। इस दिन मंदिरों में झांकियां सजाई जाती हैं भगवान कृष्ण को झूला झुलाया जाता है और रासलीला का आयोजन होता है।
कृष्ण जन्माष्टमी पर भक्त भव्य चांदनी चौक, दिल्ली (भारत) की खरीदारी में सड़कों पर कृष्णा झूला, श्री लाडू गोपाल के लिए कपड़े और उनके प्रिय भगवान कृष्ण को खरीदते हैं। सभी मंदिरों को सुन्दरता से सजाया जाता है और भक्त अर्ध रात्रि तक प्रतिक्षा करते हैं ताकि वे देख सकें कि उनके द्वारा बनाई गई सुन्दर खरीद के साथ उनके बाल गोपाल कैसे दिखते हैं। जन्माष्टमी का उत्सव सभी हिन्दुओं के लिए एक प्रमुख त्योहार है। इसे कृष्ण जन्माष्टमी कहते हैं। इसे अन्य नामों से भी जाना जाता है। जैसे- कृष्णाष्टमी, गोकुलाष्टमी, अष्टमी रोहिणी, श्री कृष्ण जयंती, श्री जयंती इत्यादि। परंतु अधिकांश लोग इसे 'जन्माष्टमी' ही कहते हैं। हिन्दू इस त्योहार को भगवान विष्णु के अवतार कृष्ण के जन्म के रूप में मनाते हैं।
कृष्ण का जन्म रात के 12 बजे उनके मामा कंस के कारागार में हुआ था। कृष्ण जन्माष्टमी हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन रोहिणी नक्षत्र में पड़ती है। यह त्योहार कभी अगस्त और कभी सितम्बर में पड़ता है। कृष्ण जन्माष्टमी से एक दिन पहले सप्तमी को लोग व्रत रखते हैं और आधी रात को 12 बजे कृष्ण का जन्म हो जाने के बाद घंटे-घड़ियाल बजाकर श्री कृष्ण की आरती उतारते हैं। तत्पश्चात् सभी लोग अपने आस- पड़ोस और मित्र-रिश्तेदारों को ईश्वर का प्रसाद वितरण कर के प्रसन्नता प्रकट करते हैं। फिर वे स्वयं खाना खाते हैं। इस प्रकार पूरे दिन व्रत रखकर यह त्योहार मनाया जाता है।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के दिन बच्चे अपने घरों के सामने हिंडोला सजाते हैं। वे हिंडोले (पालने) में छोटे से कृष्ण को सुला देते हैं। कंस का कारागार बना देते हैं। उसमें देवकी और वसुदेव को बिठा देते हैं कारागार के बाहर सिपाही तैनात कर देते हैं। इसी प्रकार उसके आसपास अन्य खिलौने रख देते हैं। इन्हें देखने के लिए आस-पास के बहुत लोग आते हैं। वहाँ मेला-सा लग जाता है। जहाँ स्थान अधिक होता है वहाँ झूले और खिलौने बेचने वाले भी आ जाते हैं। बच्चे वहाँ हिंडोला देखने के साथ-साथ झूला झूलते हैं और खिलौने वगैरह भी खरीदते हैं। विशेषकर जन्माष्टमी के दिन बच्चे बहुत उत्साहित होते हैं क्योंकि अनेक प्रकार के खिलौने खरीदकर उन्हें हिंडोला सजाना होता है। कई स्थान पर कृष्ण-लीला भी होती है। इसमें मथुरा का जन्मभूमि मंदिर और बांकेबिहारी का मंदिर मुख्य है। कहा जाता है कि जब कृष्ण का जन्म हुआ था तब कारागार के सभी पहरेदार सो गए थे देवकी-वसुदेव की बेड़ियाँ स्वत: ही खुल गई थीं और कारागार के दरवाजे स्वत: ही खुल गये थे। फिर आकाशवाणी ने वसुदेव को बताया कि वे अभी कृष्ण को गोकुल पहँचा दें। तत्पश्चात् कृष्ण के पिता वसुदेव कृष्ण को सूप में सुलाकर वर्षा ऋतु में उफनती हुई नदी पार कर के गोकुल ले गए और नंद के यहाँ छोड़ आए। सभी लोग इसे कृष्ण का ही चमत्कार मानते हैं। वर्ना कंस ने तो कृष्ण के सात भाइयों को जन्म होते ही मार दिया था। फिर कृष्ण ने बचपन से युवावस्था तक कंस सहित अनेक राक्षसों का वध किया और अपने भक्तों का उद्धार किया। यही कारण है कि लोग उन्हें ईश्वर का अवतार मानकर उनकी पूजा- अर्चना एवं भक्ति करते हैं। इस प्रकार कृष्ण जन्माष्टमी का त्योहार आनंद, सांप्रदायिक सद्भाव और अनेकता में एकता का त्योहार है।
जब-जब भी असुरों के अत्याचार बढ़े हैं और धर्म का पतन हुआ है तब-तब भगवान ने पृथ्वी पर अवतार लेकर सत्य और धर्म की स्थापना की है। इसी कड़ी में भाद्रपद माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि को अत्याचारी कंस का विनाश करने के लिए मथुरा में भगवान कृष्ण ने अवतार लिया। यशोदा नंदन, देवकी पुत्र भारतीय समाज में कृष्ण के नाम से सदियों से पूजे जा रहे हैं। तार्किकता के धरातल पर कृष्ण एक ऐसा एकांकी नायक हैं, जिसमें जीवन के सभी पक्ष विद्यमान है। कृष्ण वो किताब हैं जिससे हमें ऐसी कई शिक्षाएं मिलती हैं जो विपरीत परिस्थिति में भी सकारात्मक सोच को कायम रखने की सीख देती हैं।
व्रत-पूजन कैसे करें-
1. उपवास की पूर्व रात्रि को हल्का भोजन करें और ब्रह्मचर्य का पालन करें।
2. उपवास के दिन प्रात:काल स्नानादि नित्यकर्मों से निवृत्त हो जाएं।
3. पश्चात सूर्य, सोम, यम, काल, संधि, भूत, पवन, दिक्पति, भूमि, आकाश, खेचर, अमर और ब्रह्मादि को नमस्कार कर पूर्व या उत्तर मुख बैठें।
4. इसके बाद जल, फल, कुश और गंध लेकर संकल्प करें-
ममखिलपापप्रशमनपूर्वक सवार्भीष्ट सिद्धये।
श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रतमहं करिष्ये॥
5. अब मध्याह्न के समय काले तिलों के जल से स्नान कर देवकीजी के लिए ?सूतिकागृह? नियत करें।
6. तत्पश्चात भगवान श्रीकृष्ण की मूर्ति या चित्र स्थापित करें।
7. मूर्ति में बालक श्रीकृष्ण को स्तनपान कराती हुई देवकी हों और लक्ष्मीजी उनके चरण स्पर्श किए हों अथवा ऐसे भाव हो।
8. इसके बाद विधि-विधान से पूजन करें। पूजन में देवकी, वसुदेव, बलदेव, नंद, यशोदा और लक्ष्मी इन सबका नाम क्रमश: लेना चाहिए।
9. फिर निम्न मंत्र से पुष्पांजलि अर्पण करें? 
'प्रणमे देव जननी त्वया जातस्तु वामन:।
वसुदेवात तथा कृष्णो नमस्तुभ्यं नमो नम:।
सुपुत्रार्घ्यं प्रदत्तं में गृहाणेमं नमोऽस्तुते।'
10. अंत में प्रसाद वितरण कर भजन-कीर्तन करते हुए रात जागरण करें।
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