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पितृ ऋण से मुक्ति के लिए किया जाता है श्राद्ध

पितृ ऋण से मुक्ति के लिए किया जाता है श्राद्ध

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 208 दिन 14 घंटे पूर्व
25/09/2018
भोपाल (महामीडिया) पितरों का हमारे जन्म, संस्कार और भावनाओं से संबंध होता है। हमारे परिवार में जिन पूर्वजों का देहअवसान हो चुका है उन्हें हम पितृ रूप में पूजते हैं। मान्यता है कि पितृपक्ष में पितृ धरा पर आकर अपने लोगों की समस्यायें दूर कर उन्हें आशीर्वाद देते हैं। उनकी स्मृति में हम पितृ पक्ष में दान धर्म का पालन करते हैं। शास्त्रों के अनुसार मानव के लिए तीन ऋण बताये गए हैं पहला देव ऋण, दूसरा ऋषि व तीसरा पितृ ऋण। इनमें पितृ ऋण को श्राद्ध या पिंडदान करके उतारना अति आवश्यक है। क्योंकि जिन पूर्वजों ने हमारे आयु, आरोग्यता तथा सुख-सौभाग्य की अभिवृद्धि के लिए अनेककानेक अथक प्रयास किए उनके ऋण से मुक्त न होने पर हमारा इस धरा पर जन्म लेना निरर्थक माना गया है। साल में एक बार उनकी मृत्यु की तिथि को जल, तिल, जौ, कुश और पुष्पादि से उनका श्राद्ध कर एवं दान-पुण्य कर यह ऋण उतारा जाता है। यह श्राद्ध श्रद्धापूर्वक किया जाता है इसे पितृयज्ञ भी कहा गया है। यह सोलह दिवसीय होता है। यह भाद्रपद शुक्ल की पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक रहता है। मान्यता है कि गोत्र के सहारे विश्वदेव एवं अग्निस्वात आदि दिव्य पितर हव्य-कव्य को पितरों को सहज में ही उपलब्ध कराते हैं। यदि पिता देव योनी को प्राप्त हुए हैं तो श्राद्ध में दिया गया है 'अन्न', उन्हें वहां अमृत होकर प्राप्त होता है। मनुष्य योनी में अन्न रूप में, पशु योनी में तृण रूप में, उन्हें प्राप्ति होती है। नागादि योनियों में भी उसे श्राद्धीय भोगजनक तृप्ति कर पदार्थों के रूप में प्राप्त होकर तृप्त करती हैं। श्राद्ध करने से पितरों को प्रतिदिन भोजन प्राप्त हो जाता है। पितृपक्ष में पीपल के वृक्ष में तिल मिला जल अर्पित करना चाहिए। निर्धनों को भोजन कराना चाहिए। जहां तक संभव हो पेड़-पौधे लगाने चाहिए। पितृपक्ष में सात्विक रहना चाहिए। 

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