महामीडिया न्यूज सर्विस
प्रेम एवं सर्मपण

प्रेम एवं सर्मपण

admin | पोस्ट किया गया 46 दिन 2 घंटे पूर्व
01/10/2018
भोपाल (महामीडिया) हम सब लोग सम्पूर्ण जीवन प्रतिदिन विभिन्न प्रकार कि परिस्थितियों का सामना करते हैं कुछ परिस्थितियां को मात्र अनदेखा कर उनसे बच लिया करते हैं, किंतु कभी-कभी कुछ परिस्थितियां ऐसी होती है जिससे हमें पार पाना आवश्यक होता है। ऐसे समय में हमें सदैव भगवान स्मरण होते हैं और भगवान की हि कृपा से हम उन समस्याओं से सकुशल निकल जाते हैं। यही तो जीवन का आनंद है क्योंकि यह छोटी- छोटी सी विजय हमें सतत् चलने आगे बढ़ने के लिये प्रेरित करती है। किंतु इस प्रक्रिया में हम भूल जाते हैं, तो वह है ईश्वर कि "कृपा" जो, कि अनवरत व अनन्त हैं हम सभी के ऊपर इसको समझने के लिये मैं आपको एक कथा सुनाता हूं। कबीर दास जी जुलाहे थे वह कपड़ा बुनकर ही अपना जीवकोपार्जन करते थे। वह भगवत भक्त थे सदैव प्रभु का स्मरण करते रहते थे। परिवार कि आर्थिक स्थिति ढीक नहीं थी। किंतु फिर भी वह अन्य किसी भी निर्धन कि सहायता सदैव किया करते थे वह भी स्वयं के अभाव को भूलकर। प्रतिदिन के समान ही भक्त कबीरदास जी ने एक सुन्दर चादर बुना और उसको बेचने बाजार की ओर जाने कि तैयारी कर रहे हि थे कि तभी उनकी पत्नी ने जोर देकर कहा कि इस बार वस्त्र को बेचने से जो भी राशी प्राप्त हो उसे किसी को मत दे आना घर में अनाज बिल्कुल नहीं है यह सुनते हुए और हामी भरते हुए वह बाजार कि ओर चल दिये। बाजार में वस्त्र भी हाथो-हाथ बिक गया जैसे ही राशी हाथ में आई वह घर के लिये अनाज खरीदने बढ़ हि रहे थे कि उनको किसी के रोने कि आवाज सुनाई दी वह सुनते हि वह उस और बढ़ चले देखा तो एक निर्धन वृद्ध रो रहा था वह कह रहा था कि मैंने दो-तीन दिनों से कुछ भी नहीं खाया है मेरे परिवार के सदस्य भी भूखे है मेरी सहायता करें। इतना सुनते हि कबीरदास जी ने अपने हाथ में रखी राशी उस वृद्ध व्यक्ति को दे दी। और अपने घर कि ओर चल दिये यह चिन्ता उन्हें भी सता रही थी कि उनके घर पर भी खाने को कुछ नहीं है और अब क्या होगा यह सोचते-सोचते कि घर पर सभी लोग भूखे होंगे वह मुझे पुन: कुछ कहेंगे यह सोचते-सोचते वह घर पहुंच गये। किन्तु वह परिवार के सदस्यों का उनके प्रति व्यवहार देखकर आश्चर्य चकित थे विशेषकर उनकी पत्नी का जो अत्यधिक प्रसन्न थी। उनकी पत्नी ने कहा कि आज तो आपने अपने घर आने से पहले हि समस्त खाद्यान्न घर पहुंचा दिये यह बहुत अच्छा किया यह सुनकर कबीर ने आश्चर्य चकित होकर पूछा कौन को भेजा था मैंने... इस पर उनकी पत्नी ने कहा कि एक गाड़ीवान अपनी बैलगाड़ी में यह सब सामग्री लाया था उसने कहा कि कबीरदास जी ने मुझे ये सामग्री दी हे घर तक पहुँचाने के लिये और वह रख गया। यह सुनते कि कबीरदास जी ने ईश्वर को धन्यवाद किया और बाजार की समस्त घटना सभी घर वालों को बताई सभी बहुत आश्चर्य चकित थे। ठीक इसी प्रकार ईश्वर हम सभी के कठिन समय में आकर हमारी सहायता करते है। किंतु कदाचित हम उसका उपकार भूलकर स्वयं के द्वारा किये गये प्रयासो को अधिक महत्त्व देने लगते हैं, यही वह भ्रम है, ईश्वर न तो किसी व्रत का भूखा है और न किसी उपहार या भोग का वह तो मात्र प्रेम और समर्पण चाहते हैं वह भी स्वयं के प्रति नहीं इस चराचर विश्व के समस्त प्राणियों के प्रति किंतु हम किसी भ्रमवश या माया ग्रस्त होकर सभी के प्रति यह भाव नहीं रख पाते फलस्वरूप हमें और अधिक समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। रामचरित मानस में एक बहुत ही सुंदर दोहे कि एक पंक्ति यहां पर वांछित है वो इस प्रकार है- 
"प्रिया सोचु परिहरहु सब सुमिरहु श्रीभगवान पारबतिहि निरममउ जोहि सोच करिहि कल्यान।।" 
अर्थात: पावर्ती जी के जन्म के समय उनके जीवन के प्रति जो भविष्यवाणी नारदजी ने की थी सभी उस भविष्यवाणी को सुनकर जब भयभीत हो गए तब नारदजी ने कहा कि आप सभी समस्त चिन्ताओं का त्याग कर दो क्योंकि जिस भगवान ने पावर्ती को यहां भेजा है वही उनकी रक्षा भी करेंगे अत: आप सभी चिन्तामुक्त होकर हरिभजन करें। अर्थात प्रेम व समर्पण के साथ जिस प्रकार परमपूज्य महर्षी जी सदैव कहा करते थे कि 
"जो इच्छा करिहहु मन माहीं। 
प्रभु प्रताप कहु दुर्लभ नाहीं।" 
अर्थात आप मात्र प्रेम व समर्पण भाव से जो चाहते है, वो भगवान को भी मत बताओ मात्र अपने मन में भी रखोगे तो प्रभु का प्रताप ऐसा है कि वह आपकी इच्छा को जान कर यदि वह आपके कल्याणकारी है, तो उसे पूरा कर देंगे। और रही बात प्रेम व समर्पण कि तो भावतीत ध्यान का प्रतिदिन प्रात: एवं संध्या का अभ्यास आपके मन के प्रेम व समर्पण का भाव उत्पन्न कर देगा। प्रभु कृपा आपके जीवन को असीम आनन्द से भर देंगी क्योंकि जीवन आनंद है।
।। जय गुरुदेव, जय महर्षि।।
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