महामीडिया न्यूज सर्विस
आत्मबल का आधार तप

आत्मबल का आधार तप

admin | पोस्ट किया गया 46 दिन 1 घंटे पूर्व
01/10/2018
भोपाल (महामीडिया) हमारा यह दुर्लभ मानव जीवन वास्तव में हमें तपस्या के लिए ही मिला है। यह तपस्या हमें स्वयं के कल्याण और दूसरों को सुख प्रदान करने के लिए करनी है। तपस्या अर्थात तप से ही मानव जीवन के दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों ताप मिट जाते हैं। तप के लिए मानव के मन में अटल व अडिग दृढ़ निश्चय व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक व विश्व कल्याण की भावना, कष्ट सहिष्णुता एवं त्याग की प्रवृत्ति होना अत्यावश्यक है। त्याग और तपस्या से व्यक्ति तेजस्वी और मनस्वी बनता है।
ज्ञान बढ़े निज चिंतन से,
मान बढ़े परकाज किए से।
त्याग तपस्या से तेज बढ़े,
और आयु बढ़े सत्कर्म किए से।।
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित 'रामचरित मानस' के बालकाण्ड में नारद जी माता मैना और पिता हिमवान् और उनकी पुत्री पार्वती से विवाह के लिए तप करने की बात कहते हैं। उनके जाने के बाद माता मैना जब अपने पति से नारद जी की बात का अर्थ जानना चाहती है तब हिमवान् उन्हें समझाते हुए कहते हैं कि तुम जाओ और पार्वती को ऐसा तप करने के लिए कहो, जिससे शिव जी पति के रूप में मिल जाए। पार्वती भी अपनी माता के स्वप्न की बात सुनते हुए कहती हैं कि मुझे स्वप्न में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण ने उपदेश दिया है कि नारद जी ने जो कहा, उसे सत्य मानकर तुम तप करो क्योंकि तप सुख देने वाला और दु:ख-दोष का नाश करने वाला है"
"तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा।" (बाल/73/2)
देवता भी तप से ही आत्मबल प्राप्त करके कार्य करते हैं। ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना, विष्णुजी संसार का पालन और शिवजी जगत् का संहार करते हैं। इसलिए ब्रह्मा स्वप्न में पार्वती जी से तप करने के लिए कहते हैं-
तप आधार सब सृष्टि भवानी।
करहिं जाइ तपु अस जिय जानी।।
(हे भवानी, समस्त सृष्टि तप के ही आधार पर है, ऐसा जी में जानकर तुम जाओ और तपस्या करो।)
भारतीय संस्कृति प्राचीन काल से ही त्याग और तपस्या को महत्त्व देती रही है। हमारे ऋषि-मुनियों ने कभी-भी व्यक्तिगत सुख को अत्यधिक महत्त्व नहीं दिया, उन्होंने सदैव दूसरों के सुख व कल्याण को सर्वोपरि माना। इसीलिए हमारे शास्त्रों में कहा गया है- "तेन व्यक्तेन भुंजीधा" भोगों को त्यागपूर्वक भोगना ही सबसे बड़ा तप है। तप की विशद व्याख्या 'श्रीमद्भगवद्गीता' में भी भगवान श्रीकृष्ण ने की है। सत्रहवें अध्याय के चौदहवें श्लोक में वे कहते हैं- ??देवता, ब्राह्मण, गुरु और ज्ञानीजनों का पूजन, शारीरिक पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा ये शरीर संबंधी तप हैं।" पन्द्रहवें श्लोक में कहा गया है- "जो उद्वेग न करने वाला, प्रिय और हितकारी एवं यथार्थ भाषण है तथा जो वेद शास्त्रों के पठन का एवं परमेश्वर के नाम जप का अभ्यास ही वाणी का तप है।" सोलहवें अध्याय में भगवान कहते हैं- "मन की प्रसन्नता, शान्त भाव, भगवद् चिन्तन करने का स्वभाव, मन का निग्रह और अन्त: करण के भावों की पवित्रता ही मन का तप है।" गीता में ही सत्, रज और तम इन तीन गुणों के आधार पर तप भी तीन प्रकार के बताये गए हैं। सत्रहवें अध्याय के सत्रहवें श्लोक में भगवान ने कहा है 
श्रद्धा परया तप्तं तवरूतत्त्रिविधं नरै:।
अफलाकांक्षिभिर्युक्तै: सात्विकं परिचक्षते।।
(फल को न चाहने वाले योगी पुरुषों द्वारा परम श्रद्धा से किए हुए कायिक, वाचिक, मानसिक तप को सात्विक तप कहा है।)
अठारहवें श्लोक में भगवान् अर्जुन से कहते हैं कि "जो तप स्वभाव से या पाखंड से किया जाता है वह अनिश्चित एवं क्षणिक फल वाला राजस तप कहा जाता है।" भगवान ने उन्नीसवें श्लोक में तामस तप
का वर्णन किया है- "जो तप मूढ़ता पूर्वक हठ से मन, वाणी और शरीर की पीड़ा के सहित अथवा दूसरे का अनिष्ट करने के लिए किया जाता है, वही तामस तप है।" इन तीनों प्रकार के तप में से सात्विक तप करने से ही व्यक्ति को आत्मबल मिलता है और इस आत्मबल के कारण ही वह जीवन की प्रत्येक परीक्षा में सफल होता है। पार्वती जी की तपस्या पूर्ण होने के उपरान्त शिव जी उनकी परीक्षा लेने के लिए सप्त ऋषियों को भेजते हैं। सप्त ऋषि पार्वती जी के सामने शिवजी की बुराई करते हैं तब पार्वती जी उन्हें कहती हैं कि मैंने अपना यह जीवन शिवजी को समर्पित कर दिया है अब उनके गुण-दोषों पर कौन विचार करें? यह कहने के बाद भी सप्त ऋषि उनको समझाते रहते हैं तब वे कहती हैं-
"तजउँ न नारद कर उपदेसू। आप कहहिं सत बार महेसू।।" (बाल/81/6)
इस प्रसंग से यह प्रमाणित हो जाता है कि तप के कारण व्यक्ति में अपने निर्णय पर दृढ़ रहने, अपने निर्णय के परिणाम को सहर्ष स्वीकार करने, गुरु के प्रति अटूट आस्था, स्पष्टवादिता और निर्भीकता के गुण स्वत: ही विकसित हो जाते हैं। पार्वती जी ने तो शिव जी को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए अत्यंत कठिन शारीरिक तप किया किन्तु वर्तमान में ऐसा कठिन तप प्रत्येक व्यक्ति के लिए संभव नहीं है। आज के समय में तो व्यक्ति में वर्णित शारीरिक, वाचिक, मानसिक तप अर्थात सात्विक तप कर ले, वह ही बहुत है। यह कैसी विडम्बना है कि विजयादशमी के पर्व के दिन हम रावण के पुतले का दहन करते हैं किन्तु अपने मन में बसे राणत्व को नहीं मार पाते हैं। यदि हम रावणत्व को वास्तव में मारना चाहते हैं तो हमें अपने अन्त:करण में रामत्व को जगाना होगा और रामत्व को जगाने के लिए हमें सात्विक तप को अपने जीवन और आचरण में अपनाना होगा। मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम दायित्व और कर्तव्य निभाने वाले व्यक्ति के प्रतीक हैं और ऐसा व्यक्ति कार्य तत्परता और दूरदर्शिता से करता है साथ ही प्रतिकूलताओं को एक स्वर्णिम अवसर में बदलने की सामर्थ्य रखता है। श्री राम जी ने भी चौदह वर्ष के वनवास की प्रतिकूलता को अपने सात्विक तप से स्वर्णिम इतिहास बना दिया-
तप के बल से थम जाते हैं,
बड़े बड़े भूचाल।
लिख जाते हैं शिलालेख,
उस महाकाल के भाल।।
वैसे तो रावण बहुत विद्वान था किन्तु उसने तामस तप किया इस कारण अहंकार और स्वार्थ के कारण उसका विवेक नष्ट हो गया, जिसके कारण न तो वह अपनी सोने की लंका बचा पाया और न ही अपने कुल को। आज के व्यक्ति भी अपनी तामसिक वृत्तियों के कारण स्वयं तो पतन और विनाश की ओर अग्रसर होते ही हैं, अपने परिवार के दु:ख का कारण भी बनते हैं।
आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है कि व्यक्ति सात्विक तप से आत्मबल प्राप्त करते हुए अपने अन्त: करण के रामत्व को जगाकर अपने रावणत्व पर विजय प्राप्त करके विजयादशमी पर्व को सार्थक करें। 
(वरिष्ठ व्याख्याता एवं लेखिका, बांसवाड़ा, राजस्थान)
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