महामीडिया न्यूज सर्विस
शक्ति की उपासना

शक्ति की उपासना

admin | पोस्ट किया गया 42 दिन 2 घंटे पूर्व
10/10/2018
भोपाल (महामीडिया) नवरात्रि एक सनातन भारतीय पर्व है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है, जिसका अर्थ होता है 'नौ रातें'। इन नौ रातों और दस दिनों के समय, शक्ति/देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवाँ दिन विजय दशमी के नाम से प्रसिद्ध है। नवरात्रि वर्ष में चार बार आती है। पौष, चैत्र, आषाढ़, अश्विन प्रतिपदा से नवमीं तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों- महालक्ष्मी, महासरस्वती और महादुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजन होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। दुर्गा का मतलब जीवन के दु:ख को हरने वाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है, जिसे पूरे भारत में महान उत्साह के साथ मनाया जाता है।
नौ देवियाँ है:-
- शैलपुत्री- पहाड़ों की पुत्री होता है।
- ब्रह्मचारिणी- ब्रह्मचर्य वृत को धारण करने वाली।
- चंद्रघंटा- चन्द्रमा की तरह शीतलता वाली।
- कूष्माण्डा- सम्पूर्ण जगत उनके चरणों में है।
- स्कंदमाता- कार्तिक स्वामी की माता।
- कात्यायनी- कात्यायन आश्रम में जन्मि।
- कालरात्रि- काल को विजय करने वली।
- महागौरी- गौरे वर्ण वाली मां।
- सिद्धिदात्री- सर्व सिद्धि देने वाली।
शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्रि प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। सर्वप्रथम श्रीरामचंद्रजी ने इस शारदीय नवरात्रि पूजन का प्रारंभ समुद्र तट पर किया था और उसके बाद दसवें दिन लंका विजय के लिए प्रस्थान का विजय प्राप्त की। तब से असत्य, अधर्म पर सत्य, धर्म की जीत का पर्व विजयादशमी मनाया जाने लगा। आदिशक्ति के प्रत्येक रूप की नवरात्रि के नौ दिनों में क्रमश: अलग-अलग पूजन की जाती है। माँ दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियाँ देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है। नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियाँ प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।
गरबा नृत्य- नवरात्रि भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न प्रकार से मनायी जाती है। गुजरात में इस त्यौहार को बड़े पैमाने से मनाया जाता है। गुजरात में नवरात्रि समारोह डांडिया और गरबा के रूप में जान पड़ता है। यह पूरी रात भर चलता है। डांडिया का अनुभव बड़ा ही असाधारण है। देवी के सम्मान में भक्ति प्रदर्शन के रूप में गरबा, ?आरती? से पहले किया जाता है और डांडिया समारोह उसके बाद। पश्चिम बंगाल के राज्य में बंगालियों के मुख्य त्यौहारो में दुर्गा पूजा बंगाली कैलेंडर में, सबसे अलंकृत रूप में उभरा है। इस अदभुत उत्सव को दक्षिण, मैसूर के राजसी प्रसाद को पूरे महीने प्रकाशित करके मनाया जाता है।
महत्व- नवरात्रि उत्सव देवी अंबा (विद्युत) का प्रतिनिधित्व है। वसंत के प्रारंभ और शरद ऋतु के प्रारंभ, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते हैं। त्योहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति (उदात्त, परम, परम रचनात्मक ऊर्जा) की पूजा का सबसे शुभ और अनोखी अवधि मानी जाती है। यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से है। ऋषि के वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के समय की भक्ति प्रथाओं में से मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं।
नवरात्रि के पहले तीन दिन- नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उसकी ऊर्जा और शक्ति की होती है। प्रत्येक दिन मां दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है। त्योहार के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है उसकि पूजा की जाती है। देवी दुर्गा के विनाशकारी अस्त्र शस्त्र सब नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने के प्रतिबद्धता के प्रतीक है।
नवरात्रि के चौथे से छठे दिन- व्यक्ति जब अहंकार, क्रोध, वासना और अन्य पशु प्रवृत्ति की नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लेता है, वह एक शून्य का अनुभव करता है। यह शून्य आध्यात्मिक धन से भर जाता है। प्रयोजन के लिए, व्यक्ति सभी भौतिकवादी, आध्यात्मिक धन और समृद्धि प्राप्त करने के लिए देवी लक्ष्मी की पूजा करता है। नवरात्रि के चौथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी, की पूजा करने के लिए समर्पित है। व्यक्ति नकारात्मक प्रवृत्तियों और धन पर विजय प्राप्त कर लेता है, पर वह अभी सच्चे ज्ञान से वंचित है। ज्ञान एक मानवीय जीवन जीने के लिए आवश्यक है भले ही वह सत्ता और धन के साथ समृद्ध है। इसलिए नवरात्रि के पांचवें दिन देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। सभी पुस्तकों और अन्य साहित्य सामग्रियों को एक स्थान पर एकत्रित कर दिया जाता हैं और एक दिया देवी आह्वान और आशीर्वाद लेने के लिए, देवी के सामने जलाया जाता है।
नवरात्रि का सातवां और आठवां दिन- सातवें दिन, कला और ज्ञान की देवी, सरस्वती की पूजा की जाती है। तथा प्रार्थनायें आध्यात्मिक ज्ञान की खोज के उद्देश्य के साथ की जाती हैं। आठवें दिन पर एक 'यज्ञ' किया जाता है। यह एक पूर्णता का यज्ञ है जो देवी दुर्गा को सम्मान तथा उनको विदा करता है। नवरात्रि का नौवां दिन- नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन कन्या पूजन होता है। उन नौ बालिकाओं की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुँची है। इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। बालिकाओं का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में उन्हें उपहार के रूप में नए वस्त्र, बर्तन, फल, फूल, मिष्ठान आदि भेंट किए जाते हैं। नवरात्रि के समय कुछ भक्त उपवास और प्रार्थना, स्वास्थ्य और समृद्धि के संरक्षण के लिए रखते हैं। नवरात्रि आत्मनिरीक्षण और शुद्धि की अवधि है और पारंपरिक रूप से नए उद्यम प्रारम्भ करने के लिए एक शुभ और धार्मिक समय है। इस पर्व से जुड़ी एक अन्य कथा के अनुसार देवी दुर्गा ने एक असुर महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजेय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा और प्रत्याशित प्रतिफल स्वरूप महिषासुर ने नरक का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया तब उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए। और स्वयं स्वर्गलोक का स्वामी बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा था। तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की। ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में समस्त देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र-शस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गर्इं थीं। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्तत: महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं जय दुर्गे।
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