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पुष्य नक्षत्र का महत्व

पुष्य नक्षत्र का महत्व

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 171 दिन 5 घंटे पूर्व
01/11/2018
नई दिल्ली (महामीडिया) पुष्य नक्षत्र को नक्षत्रो का राजा भी कहते है। माना जाता है कि पुष्य नक्षत्र की साक्षी से किये गये कार्य सर्वथा सफल होते हैं। पुष्य नक्षत्र का स्वामी गुरु हैं। ऋग्वेद में पुष्य नक्षत्र को मंगल कर्ता, वृद्धि कर्ता और सुख समृद्धि दाता कहा गया है। व्यापारिक कार्यों के लिए तो यह विशेष लाभदायी माना गया है। इस योग में किया गया जप, ध्यान, दान, पुण्य महाफलदायी होता है। कार्तिक अमावस्या के पूर्व आने वाले पुष्य नक्षत्र को शुभतम माना गया है। जब यह नक्षत्र सोमवार, गुरुवार या रविवार को आता है, तो एक विशेष वार नक्षत्र योग निर्मित होता है। जिसका संधिकाल में सभी प्रकार का शुभफल सुनिश्चित हो जाता है। गुरुवार को इस नक्षत्र के पड़ने से गुरु पुष्य नामक योग का सृजन होता है। यह क्षण वर्ष में कभी-कभी आता है। पुष्यामृत योग में ?हत्था जोड़ी?(एक विशेष पेड़ की जड़ जो सभी पूजा की दुकान में मिलती है) को ?चाँदी की डिबिया में सिंदूर डालकर? अपनी तिजोरी में स्थापित करें । ऐसा करने से घर में धन की कमी नहीं रहती है। ध्यान रहे कि इसे नित्य धुप अगरबत्ती दिखाते रहे और हर पुष्य नक्षत्र में इस पर सिंदूर चढ़ाते रहे। पुष्य नक्षत्र में ?शंख पुष्पी की जड़ को चांदी की डिब्बी में भरकर उसे घर के धन स्थान / तिजोरी में रख देने से उस घर में धन की कभी कोई भी कमी नहीं रहती है । इसके अलावा बरगद के पत्ते को भी पुष्य नक्षत्र में लाकर उस पर हल्दी से स्वस्तिक बनाकर उसे चांदी की डिब्बी में घर में रखें तो भी बहुत ही शुभ रहेगा।
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