महामीडिया न्यूज सर्विस
वर्ष का प्रमुख त्यौहारः दीपावली

वर्ष का प्रमुख त्यौहारः दीपावली

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 10 दिन 23 घंटे पूर्व
05/11/2018
भोपाल (महामीडिया) दीप पंक्तियों से सजे घर, बिजली की रोशनी में चमकते बाजार, पटाखे और आतिशबाजियां चलाते बच्चे और लक्ष्मी की पूजा करते श्रद्धालु लोग। यह है दीवाली का उत्सव की प्रतिमा जो इस देश का राष्ट्रव्यापी उत्सव बन गया हैं इसके पहले तीन आयाम सामाजिक हैं, लक्ष्मीपूजन धार्मिक कृत्य है। शताब्दियों से यह समूचे देश में वर्ष का प्रमुख उत्सव बना हुआ है। गुजरात जैसे अनेक प्रदेशों में और देश के अनेक वर्गों में तो इसे नये वर्ष का प्रारंभ का पर्व माना जाने लगा है। इतिहास के झरोखे से झांककर देखें तो यह दिलचस्प निष्कर्श निकलेगा कि इस देश के अनेक त्यौहार- विशेषकर होली और दीवाली जैसे उत्सव मूलत: सामाजिक उत्सव थे, उन्हें धार्मिक आवरण बहुत बाद में जाकर उढ़ा दिया गया। जैसे होली वसंत के उल्लास और रंगों की बौछार का नागरिक उत्सव था और उसके साथ प्रहलाद वाली धार्मिक कथा बाद में जोड़ दील गई उसी प्रकार मूलत: दीवाली भी शरदकाल का नागरिक आमोद-प्रमोद और सार्वजनिक हर्षोंल्लास का पर्व था जिसके साथ न जाने लक्ष्मी पूजा की धार्मिक परंपरा कब आकर जुड़ गई। धार्मिक आवरण में सामाजिक कर्तव्यों का विधान इस देश की पुरानी पद्धति रही हैं।
दीपोत्सव- साहित्य के प्राचिन स्रोतों की खोज की जाए तो विदित होगा कि शरदकाल का एक बहुत बड़ा नागरिक उत्सव दीपोत्सव के रूप में इस देश मं दो-ढाई हजार वर्षों से मनाया जाता रहा है। यह किस दिन मनाया जाता था इस पर अनेक मत अवश्य हैं पर यह शरदकाल का उत्सव होता था इस पर सब एकमत हैं। प्राकृत के सुप्रसिद्ध लोककाव्य गाथा-सप्तशती में गांवों की चैपालों पर और नगरों के चैराहों पर सजधजकर दीप पंक्तियां रखती हुई युवतियों का वर्णन मिलता हैं इसका समय लगभग 2000 वर्ष पूर्व माना जाता है। लगभग इतना ही पुराना है वात्स्यायन का कामसूत्र जिसमें शरदकाल के दो उत्सव बताए गए हैं- कौमुदी-जागर और यक्षरात्रि। इन दोनों में नृत्यगीत, घृतक्रीड़ा और विभिन्न आमोद-प्रमोद के द्वारा नागरिक रात्रि भर खुशियां मनाते थे। लगता है यक्ष संस्कृति ने जो देश के उत्तरी भाग में बहुत समृद्ध और लोकप्रिय हो गई थी तथा जीवन के स्वस्थ उपभोग में विश्वास करती थी, इस देश में उत्सवों के नये कीर्तिमान बनाए थे। यक्षरात्रि उसी का अवशेष है। यह कार्तिकी अमावस्या को मनाई जाती थी तथा जीवन के स्वस्थ उपभोग में विश्वास करती थी, इस देश में उत्सवों के नये कीर्तिमान बनाए थे। यक्षरात्रि उसी का अवशेष है। यह कार्तिक की अमावस्या को मनाई जाती थी जबकि कौमुदी जागर शरद पूर्णिमा का उत्सव था। तब तक ये दोनों उत्सव केवल सामाजिक पर्व थे। लक्ष्मीपूजा जैसी धार्मिक विधियां इसके साथ जुड़ी हुई नहीं थीं। दीपोत्सव को दीवाली नाम देने का श्रेय अपभ्रंश के कवित अद्दहमाण (अब्दुर्रहमान) को जाता है जिसने अपने काव्य 'संदेश-रासक' में दीवाली के दीये रखती हुई युवितयों का अनूठा वर्णन किया है। सर्वप्रथम दीवाली शब्द इसी अवसर पर लिखा मिलता है। यह काव्य कम से कम 800 वर्ष पुराना माना जाता है। इसमें भी सामाजिक आमोद-प्रमोद के प्रकाश पर्व के रूप में ही इसका वर्णन मिलता है।
इस देश में ध्वनि और प्रकाश दोनों प्रसन्नता और उल्लासय के सूचक रहे हैं। प्रसन्नता के अवसर पर दिपक जलाये जाते हैं। घी के दिपक जलाना प्रसन्नता का प्रतीक है जो इस मुहावरे में भी आज तक जीवित है। दीपक बुझाना, अंधकार, शोक और मायूसी का प्रतीक है। न जाने किस घड़ी में इस देश में भी केक काटकर और मोमबत्ती बुझाकर बच्चों का जन्मदिन मनाने की कुप्रभा चल पड़ी अन्यथा हमारे यहां आरती उतारकर और दिया जलाकर ही मंगल कार्य किया जाता है। शौक के अवसर पर दीया बुझाया जाता है, हर्ष के समय दीये जलाये जाते हैं। ऐसी ही परम्परा थी कौमुदी महोत्सव की जो शरदपूर्णिमा को नावों पर दीये सजाकर नागरिकों द्वारा मनाया जाता था। चाणकय और चन्द्रगुप्त के समय जो कौमुदी महोत्सव हुआ था वह आज भी साहित्य में जीवित है। मंगल का प्रतीक यह दीपक हजारों वर्षोंसे हमारी संस्कृति में जगमगा रहा है। आकाशदीप हमारे यहां का बहुत बड़ा सांस्कृतिक प्रतीक था जिसका एक रूप आज भी धर्म-शास्त्रों में मिलता है। उत्तर वैदिक काल में कन्यागत (जिसे कनागत कहा जाता है) अर्थात आश्विन कृष्णपक्ष में पूर्वजों और पितरों का आव्हान करके ब्राह्ममण भोजन द्वारा उन्हें तृप्त किया जाता है और कार्तिक में जब वे अपने लोको को वापिस लौटते हैं तो उन्हें मार्ग दिखाने के लिए ऊंचे स्थानों पर या बांसों पर आकाश में दीपक लटकाने का विधान शास्त्रों में मिलता है जिसे आकाशदीप कहा जाता था। आकाशदीप और कौमुदी महोत्सव की दीप पंक्तियां शरदकाल की अगवानी की हमारी परम्परा थी जिसका उत्तराधिकारी महोत्सव है दीवाली। 11वीं शताब्दी में भारत में आए यात्री अलबरूनी ने कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा (बलि पूजन की प्रतिपदा) को ऐसे ही दीपोत्सव का वर्णन किया है।
आतिशबाजी- यह दीपोत्सव शरदपूर्णिमा या बलि प्रतिपदा (कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा) की बजाए अब कार्तिक की अमास्या को होने लगा है पर है यह शरदकाल की अगवानी का ऋतुपर्व। इसके साथ पटाखे और आतिशबाजी कब से आ जुड़ी हैं इस पर विद्वानों ने बड़े शोध किए हैं। प्रकाश के साथ ध्वनि को भी उल्लास का प्रतीक माना गया है। हर्ष के समय घंटानाद करके नगाड़ा बजाकर या अन्य वाद्यों के साथ गाना उल्लास की अभिव्यक्ति करता है जबकि मौन शोक और मायूसी की। आरती के साथ घंटा या कीर्तिन की ध्वनि जिस प्रकार हमारी संस्कृति में प्रसन्नता की सूचक है उसी प्रकार पटाखे विश्व के अनेक देशों में हर्ष के प्रतीक बने हुए हैं। मुस्लिम संस्कृति में बंदूक दागकर और पश्चिमी सभ्यता में भी पटाखे छोड़कर खुशी मनाना सदियों से चला आ रहा है। क्रिसमस जैसे अवसरों पर तथा शादी विवाह के समय पटाखे चलाने या खाली बंदम दागने की परंपरा में इसका चलन आज भी देखा जा सकता हैं जब से बारूद का आविष्कार हुआ और भारत में उसका प्रसार हुआ तब से पटाखे या बंदूक की ध्वनि यहां भी उत्सवों के साथ जुड़ती चली गई। सामन्ती परम्परा में अब तक शादी जैसे खुशी के अवसरों पर ठाकुरों और जमींदारों द्वारा खाली बंदूक दागी जाती थी। फिर फुलझड़ियें, अनारें और हवाइयां जैसी अनेक आतिशबाजियां ध्वनि और प्रकाश दोनों बिखेरती हैं। रीतिकालीन ब्रजभाषा साहित्य में शताब्दियों से इनका वर्णन पाया जाता है। ये बालाकें, पशु-पक्षियों आदि को तथा पर्यावरण को बहुत क्षति पहुंचाते हैं। अत: इन पर प्रतिबन्ध लगे ऐसे प्रस्ताव आते रहते हैं। स्वयं न्यायपालिका भी इसी पक्ष में हैं।
सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था- इसी क्रम में इस उत्सव पर ध्वनि और प्रकाश वर्षों से हर्ष और उल्लास के वाहक बने हुए हैं। धर्म ने उन्हें समाज के हित में अपनी व्यवस्थाएं देते हुए उन्हें धार्मिक कर्तव्यों के आवरण में इस प्रकार पिरो दिया कि लक्ष्मी के स्वागत के लिए दीपक जलाना एक धार्मिक कृत्य बन गया। विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि पुराणों और धर्म शास्त्रों ने इस उत्सव पर जो धार्मिक कार्य बताये उनमें शरीर की शुद्धि के साथ-साथ घरों की शुद्धि तथा सार्वजनिक स्थानों और देवालयों पर दीप पंक्तियां रखना विशेषकर बाजारों को जिन्हें क्रय-विक्रय भूमि कहा गया है, दीपकों से सजाना प्रत्येक नागरिक का धार्मिक कर्तव्य बताया गया है। यह माना जाता है कि लक्ष्मी पूजा की धार्मिक विधि और दीपोत्सव आदि परम्पराओं के समन्वय का वर्तमान स्वरूप 500 वर्षों से अधिक प्राचीन नहीं हैं। यही कारण है कि परवर्ती पुराणों में इस उत्सव के जो विधान मिलते हैं उनमें सांयकाल को लक्ष्मीपूजा के साथ-साथ सार्वजनिक स्थानों पर प्रकाश व्यवस्था को सामाजिक और धार्मिक कर्त्तव्य बताकर एक सार्वजनिक दायित्व को धार्मिक आवरण देने का प्रयत्न स्पष्ट परिलक्षित होता है। भविष्य पुराण में लिखा है कि चैराहों, बाजारों और देवालयों पर दीपवृक्ष सजाए जाएं। अपने -अपने घर की लिपाई- पुताई और सफाई के साथ-साथ अत्यंग (मालिश) और गर्म जल से स्नान के साथ शरीर की सफाई को जिस प्रकार धार्मिक कार्य बता दिया गया उसी प्रकार उन स्थानों में प्रकाश करना जो किसी की मिल्कियत नहीं हैं किन्तु सब के हैं, धार्मिक दायित्व बताया गया।
द्युतक्रीड़ा- इस प्रकार एक सामाजिक उत्सव को धार्मिक आवरण देकर जनमानस में कर्तव्य भावना को स्थायित्व देने की भारतीय परम्परा इस उत्सव में स्पष्ट परिलक्षित होती है। लक्ष्मी पूजा भी जो आश्विन में की जाती थी इसके साथ जोड़ दी गई और इसे लक्ष्मीजयन्ती बता दिया गया। द्यृतक्रीड़ा भी किसी न किसी रूप में आज तक इसके साथ जुड़ी हुई है जिसके हानिकारक और अशोभनीय पक्ष सबके ध्यान में हैं। यह परम्परा कैसे चली इसकी खोज की जाए तो यह कटुसत्य उभरे बिना नहीं रहता कि द्यूत की परम्परा हमारे यहां भी बहुत पुरानी है। इतनी पुरानी जिता कि वेद। वेदकाल में भी जुआ खेला जाता था। तभी तो वेद ने स्पष्ट शब्दों में उसका निषेध किया है- अक्षेर्मा दीव्या: कृषिमित् कृषस्य (ऋग्वेद)। जुआ खेलना अधर्म है क्योंकि यह अनुपार्जित धन है। ऐसा धन वर्जित है। उसके पीछे मत भागो, कृषि और श्रम से धन कमाओ। वेदों के बाद पुराण और धर्म-शास्त्रों ने भी इसका निषेध किया किन्तु यह चलता ही रहा। ठीक उसी प्रकार जैसे आज सिगरेटों पर धूम्रपान हानिकारक है छपा रहात है पर उनका चलन बढ़ता रहता है। नगर जीवन में द्यूतक्रीड़ा प्राचीन भारत में भी विलासी नागरिकों की एक कला मान ली गई थी। वात्स्यायन ने 64 कलाओं में इसे स्थान दिया और इसके 20 प्रकार बतलाए गए। पासों, कौड़ियों, ताशों आदि अनेक वाहनों पर चलकर यह कला बराबर दौड़ती आ रही है। महाभारत का युद्ध और विनाश इस कला के ही करिश्में थे। इसका निषेध और वर्जन बराबर होता रहा किन्तु इस पर पूरी तरह रोक नहीं लग पाई। आज भी यह कला नाना रूपों में विचरण कर रही है। घुड़दौड़ों पर बाजी लगाना, लाटरी के टिकट, शेयर बाजार का सट्टा, मटका और आंक लगाना, ब्रिज और पपलू खेलना, ये सब अभिजात वर्ग के विनोद और क्लबों के आभूषण क्या आज भी नहीं बने हुए हैं? समाज का यह रोग आदिकाल से आज तक चल रहा है। साहित्य में हर युग में इसका वर्णन पाया जाना इसके कालजयी होने का प्रमाण है। जब धर्म को यह लगा कि निषेध कर करके वह हार गया है और इसका उपचार नहीं हो रहा है तो एक उपाय यह सोचा गया कि इसे धार्मिक पैकेज में परोसा जाए और एक दिन के लिए सीमित कर दिया जाए। पुराणों ने शिव पार्वती के खेल से इसकी उत्पत्ति बताई और पार्वती का शाप दिलवाकर यह धारणा प्रतिष्ठित करने का प्रयत्न किया कि द्यूतकला में पूरे वर्ष भर भाग्य आजमाते रहने की आवश्यकता नहीं है, केवल एक दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को जुआ खेला जाए। उस दिन जिसकी जीत होगी वर्ष भर उसे सफलता मिलती रहेगी। धर्मशास्त्रों में और प्राचीन ग्रंथों में दीवाली के दूसरे दिन की प्रतिपदा का नाम द्यूतप्रतिपद मिलता है। लक्ष्मीपूजा के दिन लक्ष्मीभक्तों को इस कार्य से नहीं रोका जाए किन्तु इस विकार को वर्ष में एक दिन तक ही सीमित कर दिया जाए, धर्मशास्त्रों का यही प्रयत्न इस दिन द्यूतक्रीड़ा के विधान में प्रतिबिम्बित होता है। किन्तु नये युग में इस पर पूर्ण प्रतिबन्ध हो यह सर्वथा वांछनीय है। आज हमारे सारे प्रमुख पर्व धार्मिक कर्तव्यों, सामाजिक दायित्व और वैज्ञानिक वांछनीयता तीनों की त्रिवेणी में नहाकर अनेक युगों की यात्रा के बाद एक कालजयी परम्परा के प्रतिनिधि हो गए हैं और जनजीवन में इतने गहरे घुलमिल गए हैं कि एक स्वच्छ दर्पण की तरह उनमें आप हमारे विकास की और हमारी मान्यताओं की छवि स्पष्ट देख सकते हैं। उनमें इतिहास की खोजबीन मनोरंजक हो सकती है किन्तु उनके स्वरूप का निर्धारण तो वह लोकमनास करता है जिसकी थाह पाना आसान नहीं।
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