महामीडिया न्यूज सर्विस
प्रभु राम ही सुख के धाम हैं: शास्त्री जी

प्रभु राम ही सुख के धाम हैं: शास्त्री जी

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 129 दिन 21 घंटे पूर्व
10/04/2019
भोपाल (महामीडिया) महर्षि महेश योगी संस्थान में चल रहे चैत्र नवरात्र महोत्सव के अर्न्तगत श्रीराम कथा प्रवाह का वाचन प्रसिद्ध कथा वाचक पंडित चतुर नारायण शास्त्री के मुखारबिंद द्वारा किया जा रहा है। राम जन्म प्रसंग से आगे बढ़ते हुए, आम कथा के पंचम दिवस, शास्त्री जी ने कहा बताया की चारांे कुमार के जन्म से पूरी अयोध्या ख़ुशी से भरी हुई थी। धीरे-धीरे वे बड़े होने लगे तो राजा दशरथ को उनके नामकरण की बात सूझी। इसलिए उन्होंने गुरु वशिष्ट को बुलाया गया। गुरु वशिष्ठ ने वहां आकर सर्वप्रथम श्री गणेश और नारायण की पूजा की और कहा की राजा दशरथ आपके जो चारो पुत्र हैं, वो साक्षात चारों वेद हैं और उनका जन्म रघुकुल का उद्धार करने के लिए हुआ हैं। सबसे पहले राम का नामकरण करते हुए कहा की, जो आनंद सिंधु हैं उस सच्चिदानंद परमात्मा का नाम ?राम? रखा गया। उसके बाद भारत लाल का, गुरु वशिष्ट ने कहा की जो विश्व का भरण पोषण करता है उसका नाम भारत रखा गया। अंदर के सत्रु को जो मरे वो शत्रुघन हैं। जो लक्षणों का धाम हैं वो लक्ष्मण हैं।
राक्षसों और असुरो द्वारा अपने आश्रम में यज्ञ में व्यावधान से करने से परेशान महर्षि विश्वामित्र को भी ज्ञात हुआ की प्रभु राम का जन्म में अयोध्या में हुआ है यह सोचकर वहां जाने की सोची और सभा में आकर दशरथ को कारण बताया और दोनों कुमारों को साथ ले जाने का आग्रह किया। यह सुनकर राजा दशरथ ने कहा की सारा राज्य, सब सुख ले लो, पर राम को मत मांगो, चाहो तो मुझसे मेरा शरीर ही माँग लो। राघव के बिना में नहीं रह पाउँगा। गुरु वशिष्ट के समझाने और श्राप के डर से आखि़रकार राजा दशरथ ने दोनों कुमारों को विश्वामित्र के साथ जाने की आज्ञा दे दी। माताओं की भी आज्ञा लेकर राम-लक्ष्मण ख़ुशी-ख़ुशी चल पड़े। रास्ते में उन्हें ताड़का मिली और प्रभु राम ने एक ही बाण में उसके प्राण हर लिए और उसका उद्धार किया। फिर वे सब विश्वामित्र आश्रम पहुंचे। 
शास्त्री जी बताते हैं कि ताड़का और पूतना को शास्त्रों में अविद्या कहां गया है, हमारे जितने भी दुर्गुण हैं वो अविद्या से ही उत्पन्न होते हैं। इसीलिए जब तक अविद्या रूपी पूतना-ताड़का को नहीं मारेंगे दुर्गुण भी नहीं मिट सकते। इसीलिए जहां से राक्षसों का जनम होता है, उसको रोकने के लिए, दोनों राम-कृष्ण ने पहले ताड़का-पूतना का वध किया। सुबह जब महर्षि विश्वामित्र ने अन्य ऋषियों के साथ यज्ञ शुरू किया, मारीच और सुबाहु अपनी सेना के साथ आ पहुंचे। राम और लक्ष्मण भी धनुष-बाण के साथ सजग थे। राम जी ने पावक अस्त्र से सबसे पहले सुबाहु का वध किया। उसके बाद मारीच का भी वध किया और लक्ष्मण ने भी बाकी राक्षसों का संघार कर दिया। इस तरह बिना व्यवधान के विश्वामित्र का यज्ञ भी पूर्ण हुआ।   

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