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परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम कुंभ

परंपरा और आधुनिकता का अद्भुत संगम कुंभ

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 33 दिन 8 घंटे पूर्व
14/01/2019
भोपाल (महामीडिया) भारत का विश्व प्रसिद्ध कुंभ मेला परंपरा में आधुनिकता का अद्भुत संगम करने जा रहा है। यहां यह भी एक सर्वमान्य तथ्य है कि संस्कृतियों के पनपने में मेलों और विभिन्न पर्वों का विशेष योगदान है। यदि हम यह कहें कि तीज-त्योहारों और मेलों आदि ने ही सच्चे अर्थों में हमारे सांस्कृतिक विकास में मदद की है और उसे हर पल जीवंत बनाए रखा है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। एक ऐसा ही पर्व-कुंभ मेला पुनः हमारे सामने है जो सिर्फ हिंदू संस्कृति का ही नहीं वरन पूरे भारतवर्ष की समस्त संस्कृतियों के उनयन का प्रबल प्रतीक है। इस बार जन-जन का यह पर्व कुछ विशिष्टता लिए हुए है। यह इस शताब्दी का अंतिम कुंभ पर्व भी है। इस कारण इसे देखने-परखने और अगली सदी के कुंभ पर्वों की तैयारियों के लिए पर्व का आकलन करने के उद्देश्य से भी यह कुंभ मेला महत्त्वपूर्ण है।
कुंभ शब्द का अर्थ ही होता है अमृत का घड़ा यानि ज्ञान का घड़ा और कुंभ प्रथा से स्पष्ट अभिप्राय है, ज्ञान के घड़े का सदुपयोग। हमारा राष्ट्र भारत आदिकाल से ही संतो, ऋषियों और मुनियों की धरती रही है। भारत राष्ट्र पूरे विश्व को अज्ञानता रूपी अंधकार से ज्ञानरुपी प्रकाश की ओर ला रहा है जिससे विश्व गुरु से भी यह राष्ट्र विभूषित हुआ है। जिस समय यूरोप के लोग जंगलों में निर्वस्त्र भ्रमण करते हुए कच्चा मांस खाते थे। उस समय इस देश में गंगा सिन्धु के तटों पर बच्चे बच्चे वेद पुराणों को कंटस्थ करते थे। कुंभ प्रथा भी इसी श्रृंखला की एक कड़ी है।
स्कंध पुराण और रुद्रयामल तंत्र और अन्य अनेक ग्रंथों में वर्णित है कि किसी समय देश के 12 स्थानों पर कुंभ का आयोजन होता था। वैदिक युग में सिमरिया (बिहार), गुवाहाटी (असम), कुरुक्षेत्र (हरियाणा), पूरी (ओडिशा), गंगा सागर (बंगाल), द्वारिका (गुजरात), कुंभ्कोनाम (तमिलनाडु), रामेश्वरम (तमिलनाडु), हरिद्वार (उत्तराखंड), प्रयाग (उत्तर प्रदेश), उज्जैन (मध्य प्रदेश), नासिक (महाराष्ट्र) लेकिन दुःख के साथ ये कहना पड़ता है की नियति के चक्र, विदेशी कुचक्रो और इन सबसे ऊपर परंपरा के प्रति भारतीयों की उदासीनता के कारण देश के सबसे बड़े इन आयाजनों में से मात्र चार (हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन एंव नासिक) को ही हम बचा पाए और 8 स्थानों पर लगने वाले कुंभ पर्वों का लोप हो गया।
वैसे मूल संकल्पना की बात करें तो ज्योतिश में कुंभ एक योग है जिसमें खगोलीय रूप से जब सूर्य, चंद्रमा और ब्रहस्पति एक राशी में आते हैं तो कुंभ योग बनता है। दरअसल मानव जीवन पर इन दोनों ग्रहों और चंद्रमा का विशेष प्रभाव बन गया है और इस विशेष खगोलीय अवशता में गंगा में स्नान का महत्व 12 साल के स्नान के बराबर मन गया है। इन्ही बातों के आधार पर प्रत्येक वर्ष के 12 मास में भारत की एकता और अखंडता को ध्यान में रखते हुए देश के 12 स्थानों पर नदियों के किनारे कुंभ का संकल्प लिया गया। वर्ष के 12 मास में, 12 राशियां जिनमें से प्रत्येक 12 वर्ष पर ब्रहस्पति का शुभागमन होने से 12-12 साल के बाद महाकुंभ का आयोजन होने लगा। इस हिसाब से एक स्थान पर 12 साल के बाद महाकुंभ का योग होने लगा और हर साल कहीं न कहीं महाकुंभ का योग बनता रहा। 12 मास में एक कार्तिक मास भी है जिसमे तुला संक्रांति में ब्रहस्पति का योग होने से महाकुंभ उद्घोषित हुआ।
पौराणिक महत्व: पर्व जितना पुरातन माना जाएगा, उसकी आधार गाथाएं भी उतनी ही प्राचीन ठहरेंगी। यही कारण है कि इस प्राचीन पर्व-कुंभ की मान्यताओं की बेल वेद-पुराणों के पृष्ठों तक पहुंचती है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में ?कुंभ? शब्द की व्याख्या करते हुये कुछ ऐसे मन्त्र मिलते हैं जिन्हें परोक्षतः कुंभ पर्व से जोड़ा जाता है अथर्ववेद के काण्ड-19, सूक्त-53 के तीसरे मन्त्र में कुंभ के बारे में कहा गया है-
पूर्ण कुंभोऽधि कालं आहितस्तं, वै पश्यामो बहुधानु संतः।
स इमा विश्वास भुवनानि प्रत्यंड, कालं तमाहुः परमे व्योमन्।।
अर्थात काल यानी समय के ऊपर भरा हुआ कुंभ रखा हुआ है और हम उस घड़े को विविध दृष्टियों से देखते हैं। ऐसे में वह अर्थात समय सभी सत्ता वालों के सम्मुख चलता है। उस काल को लोग अति उच्च रक्षा स्थान में बताते हैं।
वेदों में कुंभ संबंधी जो भी उल्लेख हैं वे प्रायः सांकेतिक ही हैं और उनसे कुंभ पर्व की स्पष्ट व्याख्या नहीं मिलती। ऐसे में पुराण सामने आते हैं। पुराणों में विभिन्न कथाओं के माध्यम से कुंभ पर्व की मान्यताएँ स्थापित की गई हैं। पुराणों में जो कथाएं वर्णित हैं वे स्पष्ट करती हैं कि कुंभ पर्व कैसे प्रारंभ हुआ। ऐसी कथाओं में ?श्रीमद्भागवतपुराण? और ?स्कंध पुराण? के कुंभ प्रसंग उल्लेखनीय हैं। श्रीमद्भागवतपुराण में सागर-मंथन की जो कथा मिलती है वह प्रायः सभी संबंधित पुराणों में समान रूप से थोड़े-बहुत फेर बदल के साथ विद्यमान है। इस कथा के अनुसार देवासुर संग्राम के मध्य अमृत प्राप्ति के ध्येय को लेकर सागर मंथन की प्रक्रिया संपन्न हुई।
सागर मंथन के फलस्वरूप जो चौदह रत्न क्रमशः कालकूट विष, कामधेनु गाय, कल्पवृक्ष, पारिजात वृक्ष, कौस्तुभ मणि, उच्चैश्रवा अश्व, ऐरावत हाथी, रंभ अप्सरा, वारुणि, लक्ष्मी, चंद्रमा, शंख, वैद्यराज धन्वंतरि एवं अमृत निकले, उनमें पहले ही रत्न अर्थात विष ने समस्त ब्रह्मांड में हाहाकार मचा दिया। तब भगवान शंकर ने उसे अपने कंठ में स्थान दिया और संसार को उसके भय से मुक्त कर दिया। शेष अन्य रत्नों पर तो नहीं किन्तु अमृत की प्राप्ति को लेकर देवताओं और असुरों में एक बार पुनः विवाद उत्पन्न हो गया। इस अमृत कुंभ से अमृत देवलोक और भूलोक के कुल बारह स्थानों पर कैसे छलक कर गिरा, इस सन्दर्भ में दो-तीन पुराण कथाएँ प्रचलित हैं। इनमें से एक ?भगवान पुराण? के कथानुसार आचार्य बृहस्पति का संकेत पाकर इन्द्र-पुत्र जयंत अमृत-घट छीनने में सफल रहा और उसे लेकर चतुर्दिक ब्रह्मांड में भागने लगा। दैत्य भी उसके पीछे भागे और इस प्रकार कुल बारह दिनों तक उनमें परस्पर संघर्ष होता रहा। इस संघर्ष के दौरान ही आकाश यानी देवलोक के आठ स्थानों और भूलोक के चार स्थानों- हरिद्वार, प्रयाग, उज्जैन और नासिक में अमृत की कुछ बूंदें छलक कर गिर पड़ी। जिन घट-पलों में ये अमृतकण इन स्थानों पर गिरे, उन घड़ियों और नक्षत्रा-योगों में ये चारों स्थान अमृत-तुल्य कुंभ-तीर्थ बन गए और यहां कुंभ पर्व मनाने की परंपरा विकसित हो गई। सागर मंथन की कथा का उल्लेख ?स्कंध पुराण? में भी देखने को मिलता है।
यह तो प्रायः स्पष्ट है कि अमृत की बूंदें गिरने के कारण ही उक्त चारों स्थान कुंभ तीर्थ कहलाए लेकिन यहां कुंभ पर्व कब मनाया जाए- इसकी अनेक खगोलशास्त्रीय मान्यताएं हैं। अलग-अलग स्थानों पर विविध नक्षत्र योग ही यह बताते हैं कि किस अवधि अथवा किस दिन कुंभ पर्व मनाया जाए। जैसे हरिद्वार में कुंभ पर्व का योग तब पड़ता है जब बृहस्पति कुंभ राशि में हो तथा सूर्य मेषस्थ हो। ?स्कंध पुराण? भी इस मान्यता को पुष्ट करता है-
पद्मिनी नायके मेषे कुंभ राशि गते गुरो।
गंगा द्वारे भवेद्योग कुंभनान्मातदोत्तमः।।
अर्थात सूर्य मेष राशि में हो और बृहस्पति कुंभ राशि में प्रविष्ट हो चुका हो तभी हरिद्वार में पूर्ण कुंभ का सुयोग बनता है। प्रयाग में यह पर्व तब पड़ता है जब सूर्य मकर राशि में और बृहस्पति वृष राशि में तथा माघ मास हो जबकि उज्जैन में इस पर्व की अवधारणा तब साकार रूप धारण करती है जब सूर्य मेष राशि में तथा बृहस्पति सिंह राशि में हो। उज्जैन में कुंभ पर्व के लिये दस अन्य योग होना भी अनिवार्य है। बृहस्पति के सिंह राशि में होने से यहाँ का पर्व ?सिंहस्थ पर्व? कहलाता है। उधर, नासिक में कुंभ पर्व का आयोजन तब होता है जब सूर्य और बृहस्पति दोनों ही सिंह राशि में हों। इसके अतिरिक्त पूर्णिमा की तिथि और दिन बृहस्पतिवार होना भी यहाँ के पर्व के लिये एक अनिवार्य शर्त है।

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