महामीडिया न्यूज सर्विस
हर व्यक्ति को श्रद्धा से सराबोर कर देती है "चार धाम यात्रा"

हर व्यक्ति को श्रद्धा से सराबोर कर देती है "चार धाम यात्रा"

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 103 दिन 12 घंटे पूर्व
13/05/2019
भोपाल (महामीडिया) ईश्वर में विश्वास हमारे देश की सदियों पुरानी है। इसके कई कारण हैं जैसे कि- भक्तिमय माहौल हमारे विचारों को शुद्ध करता है और मन को शांति देता है। जब भी हमें खुशी मिलती है या हमारे कोई भी कार्य जो अथक प्रयासों के बाद सफल हो जायें तो हम अनायास ही मंदिरों की ओर कदम बढ़ाने लगते हैं। ऐसा ही भक्तिमय स्थल उत्तराखंड के चार धाम हैं। चार धाम आस्था के वे पावन स्थल हैं, जहां सदियों से हमारी संस्कृति जीवंत रही है। मान्यता है कि यदि एक ही यात्रा में चारों धामों के दर्शन करने हों तो पहले यमुनोत्री, फिर गंगोत्री उसके बाद केदारनाथ और आखिर में बदरीनाथ जाना चाहिए। चार धाम यात्रा का पहला तीर्थ यमुनोत्री धाम है। यमुनोत्री तीर्थ धार्मिक महत्त्व के साथ ही साथ मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य के कारण भी तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहां पर दिखाई देने वाले बर्फ से ढके ऊंचे पर्वत शिखर, देवदार और चीड़ के हरे-भरे जंगल, उनके बीच फैला कोहरा, बर्फीले पहाड़ों पर चांदी सी चमकती हुई सूर्य की रोशनी, पहाड़ों के बीच बहती सुगन्धित हवाओं की ध्वनि के साथ बहती हुई यमुना नदी की शीतल धारा मन को मोह लेती है। पुराणों में यमुनोत्री के साथ असित ऋषि की कथा भी जुडी है। कहा जाता है कि वृद्धावस्था के कारण असित ऋषि कुंड में स्नान करने नहीं जा पाते थे। उनकी श्रद्धा देखकर यमुना स्वयं उनकी कुटिया में ही प्रकट हो गईं। इसी स्थान को यमुनोत्री कहा जाता है। कालिंद पर्वत से निकलने के कारण इसे कालिंदी भी कहा जाता है। माना जाता है कि यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने वाले दिन अक्षय तृतीया को भगवान कृष्ण ने सूर्यपुत्री यमुना का वरण किया था। सूर्यपुत्री तथा शनि एवं यमराज की बहन यमुना मनुष्य को ग्रहजनित कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती हैं। यमुनोत्री में स्थित ग्लेशियर और गरम पानी के कुंड सभी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। मंदिर में दिव्य शिला है। मां यमुना के दर्शन और पूजा के साथ ही दिव्य शिला की पूजा की जाती है। इसी शिला के पास से गुफानुमा द्वार से जल की एक पतली धारा बहती है, यही यमुना का उद्गम स्थल है। इस पवित्र स्थल के पास सप्तऋषि कुंड एवं सप्तसरोवर है, जिनमें तीर्थयात्री स्नान करके अपना जीवन धन्य करते हैं। प्रकृति का करिश्मा यहां स्थित सूर्यकुंड है। इसका जल इतना गरम है कि पोटली में डालकर चावल और आलू कुछ ही देर में पक जाते हैं। 
चार धाम की यात्रा का दूसरा धाम गंगोत्री धाम है। गंगा का अवतरण होने के कारण यह स्थान गंगोत्री कहलाया। गंगा भारत की प्रमुख नदी है, जो हिमालय के पर्वतों से निकलकर पूर्व की ओर बहती हुई बड़े मैदानी इलाकों से गुज़रकर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। पौराणिक मान्यताओं के आधार पर स्वर्ग से अवतरित होकर गंगा तीन धाराओं में विभाजित हो गई - भागीरथी, अलकनंदा और मंदाकिनी। जो गंगा राजा भागीरथ के पीछे गई वह भागीरथी कहलाई। देवप्रयाग में ये नदियां एकत्रित होकर गंगा के नाम से जानी जाने लगीं। अपने पूर्वजों को श्रापमुक्त करने के लिए राजा भागीरथ ने यहीं पर तपस्या की थी। मान्यता है कि यहां उत्तरमुखी बहने वाली गंगा के स्नान और पूजा-अर्चना करने से मनुष्य को पापों से मुक्ति मिलती है। यहां महालक्ष्मी, अन्नपूर्णा जाह्नवी, सरस्वती, यमुना, भागीरथ जी और शंकराचार्य जी की मूर्ति प्रतिष्ठित है। साथ ही शिव व भैरव के मंदिर हैं। एक विशाल शिला है, जो भागीरथ शिला कहलाती है। गंगोत्री से 19 कि.मी. दूर स्थित गौमुख भागीरथी नदी का उद्गम स्थल है। गंगोत्री से पहले बालशिव का प्राचीन मंदिर है। इसे बाल कंडार मंदिर के रूप में भी जाना जाता है। गंगोत्री धाम का प्रथम पूजा स्थल यही है। गंगा माँ के दर्शन से पहले बाल शिव के दर्शन ज़रूरी माने जाते हैं।  
चार धाम की यात्रा का तीसरा धाम केदारनाथ धाम है। उत्तरी हिमालय की तलहटी में बसे इस क्षेत्र में लोग धार्मिक आस्था के कारण आते हैं। केदारनाथ मंदिर के कपाट अप्रैल से अक्टूबर तक खुले रहते हैं। कार्तिक पूर्णिमा के दिन मंदिर में स्थापित शिव प्रतिमा को उखीमठ में ले जाया जाता है। मान्यता है कि गोत्रहत्या के पाप से मुक्ति के लिए जब पांडव भगवान शिव के दर्शन के लिए यहां आए, तो शिव उन्हें दर्शन नहीं देना चाहते थे। इस वजह से भगवान शिव भैंसे का रूप धारण करके इधर-उधर घूमने लगे, ताकि पांडव उन्हें पहचान न पाएं। महिष रूप धारी शिव एक जगह से धरती में समाने लगे तो भीम ने उनकी पूंछ पकड़ ली। भगवान का पृष्ठ भाग केदारनाथ में प्रकट हुआ। यहां शिव के इसी भाग की पूजा की जाती है। केदारनाथ पहुंचने से पहले गौरीकुंड में स्नान का विधान है। गौरीकुंड के अलावा केदारनाथ में शिवकुंड, रेतकुंड, हंसकुंड, उदीकुंड आदि हैं। भैरोनाथ जी के मंदिर की भी यहां बहुत मान्यता है। हर साल इन्हीं की पूजा के बाद मंदिर के कपाट खोले और बंद किए जाते हैं। मंदाकिनी नदी के किनारे बसा केदारनाथ मंदिर का तीन वर्ष पूर्व आई प्रलय के बाद बचना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इस प्रलय रुपी विनाश में सब कुछ ध्वस्त हो गया था। केदारनाथ मंदिर के पीछे पानी के वेग के साथ आई एक बड़ी चट्टान इस तरह कवच बनी रही कि मंदिर की एक ईंट को भी नुकसान नहीं हुआ। मंदिर को बचाने वाली इस शिला का नामकरण भीमशिला के रूप में किया गया। 
चार धाम की यात्रा का तीसरा और आखिरी धाम बद्रीनाथ धाम है। बद्रीनाथ धाम, नर और नारायण पर्वत श्रृंखलाओं से घिरा, अलकनंदा नदी के बाएं तट पर नीलकंठ पर्वत श्रृंखला की पृष्ठभूमि पर स्थित है। बद्रीनाथ मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यहां पर भगवान विष्णु की एक मीटर ऊँची काले पत्थर की प्रतिमा जिसमें भगवान विष्णु ध्यानमग्न मुद्रा में सुशोभित हैं। यह पवित्र स्थल भगवान विष्णु के अवतार नरकृनारायण की तपोभूमि है। हिमालय की तलहटी में बसे बद्रीनाथ धाम को ?धरती का बैकुंठ? कहा जाता है। बद्रिकाश्रम यानी ?बदरी सदृशं तीर्थम् न भूतो न भविष्यति? अर्थात् बद्रीनाथ जैसा स्थान मृत्युलोक पर न पहले था, न भविष्य में होगा। माना जाता है कि यहाँ विष्णु भगवान तपस्यारत हैं। बद्रीनाथ का मुख्य आकर्षण है भगवान बद्रीनारायण का भव्य मंदिर। कई रंगों से सजे इस मंदिर का प्रवेश द्वार दूर से ही पर्यटकों को आकर्षित करता है। इसे सिंह द्वार कहा जाता है। मंदिर के निकट बनी व्यास और गणेश गुफाओं में बैठकर ही वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना की थी। माना जाता है कि पांडव द्रौपदी के साथ इसी रास्ते होकर स्वर्ग गए थे। माना जाता है कि बद्रीनाथ धाम में स्थित ब्रह्मकपाली में पितरों को तर्पण देने से व्यक्ति को सात जन्मों के पापों से मुक्ति मिलती है। बदरी-केदार के रास्ते में भी खूबसूरत घटियां, पहाड़ियां, नदियां, ट्रैकिंग के लिए लम्बा रास्ता, कस्तूरी मृग, भोजपत्र के पेड़ और ब्रह्मकमल जैसी कई अद्भुत चीज़ें देखने को मिलती हैं। बद्रीनाथ के तप्तकुण्ड और नारदकुण्ड सल्फर के ही झरने हैं। कुंड के गरम पानी में नहाने से त्वचा सम्बन्धी कई रोगों से छुटकारा मिल जाता है। 

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