महामीडिया न्यूज सर्विस
बद्रीनाथ धाम में होने वाली 'आरती' की रचना को लेकर विवाद

बद्रीनाथ धाम में होने वाली 'आरती' की रचना को लेकर विवाद

admin | पोस्ट किया गया 39 दिन 3 घंटे पूर्व
15/06/2019
देहरादून (महामीडिया) बद्रीनाथ धाम करोड़ों हिंदुओं की आस्था का प्रतीक है। यहां यहां होने वाली आरती का भी बहुत महत्व है। बद्रीनाथ धाम में होने वाली आरती 'पवन मंडल सुगंध शीतल' किसने लिखी थी, इसको लेकर विवाद छिड़ गया है। अभी तक माना जाता था कि लगभग 150 साल पहले इस आरती की रचना चमोली जिले के नदंप्रयाग के रहने वाले मुस्लिम बदरुद्दीन ने की थी। भाजपा सरकार ने इसके रचियता को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। सरकार का कहना है कि एक स्थानीय लेखक धान सिंह बर्थवाल ने यह आरती लिखी है। जबकि सालों से यह मान्यता है कि चमोली में नंदप्रयाग के एक पोस्टमास्टर फखरुद्दीन सिद्दीकी ने यह आरती लिखी थी। सिद्दीकी भगवान बदरी के भक्त थे और लोग बाद में उन्हें 'बदरुद्दीन' बुलाने लगे थे। आरती की पांड़लिपि की कार्बन डेटिंग के परिणाम से साबित हो गया है कि यह वर्ष 1775 के आसपास की है और धन सिंह इसी दौर के हैं, जबकि बदरुद्दीन उन्नीसवीं सदी के उत्तरा‌र्द्ध के हैं। धन सिंह के वंशजों ने पांडुलिपि की प्रति मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को भी भेंट की है। इस अवसर पर मुख्यमंत्री ने कहा कि इससे यह साबित हुआ है कि हमारे पूर्वज उस वक्त भी जागरुक थे। धन सिंह के परपोते महेंद्र सिंह बर्थवाल हाल ही में प्रशासन के पास आरती की हस्तलिपि लेकर पहुंचे। कार्बन डेटिंग टेस्ट के बाद मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ऐलान किया कि यह हस्तलिपि 1881 की है, जब यह आरती चलन में आई थी। बदरुद्दीन का परिवार ऐसा कोई सबूत दे नहीं सका, इसलिए बर्थवाल परिवार के दावों को सच मान लिया गया है। 
हालांकि, 1889 में प्रकाशित एक किताब में यह आरतील है और बदरुद्दीन के रिश्तेदारों को इसका संरक्षक बताया गया है। यह किताब अल्मोडा के एक संग्रहालय में रखी है। उसके मालिक जुगल किशोर पेठशाली ने कहरा कि अल-मुश्तहर मुंसी नसीरुद्दीन को किताब का संरक्षक बताया गया है जो हिंदू धर्म शास्त्र स्कंद पुराण का अनुवाद है और इसके आखिरी पेज में आरती लिखी है।
आईआईटी रुड़की के असोसिएट प्रफेसर एएस मौर्या ने कहा है कि कार्बन डेटिंग से सटीक साल का पता नहीं लगता है। उन्होंने कहा कि इसकी अरसली उम्र डेटिंग टेस्ट में मिले नतीजों से 80 साल आगे पीछे हो सकती है। साथ ही उन्होंने कहा कि यह साफतौर पर कहा जा सकता है कि बर्थवाल हस्तलिपि 1881 में ही लिखी गई थी। दूसरी ओर, कार्बन डेटिंग करने वाले उत्तराखंड स्पेस ऐप्लिकेशन सेंटर के निदेशक एमपीएस बिश्ट का दावा है कि टेस्ट के नतीजे एकदम सटीक हैं।। एक पुजारी पंडित विनय कृष्ण रावत ने कहा कि बदरुद्दीन के वंशज निराश हैं कि उन्हें 'परिवार की विरासत को लूट लिया गया है'। उनके परपोते अयाजुद्दीन ने कहा, 'वह भगवान बदरीनाथ के लिए समर्पित हैं, यही वजह है कि परिवार ने उनके विश्वास को जारी रखा है।' 
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