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देवशयनी एकादशी का महत्व

देवशयनी एकादशी का महत्व

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 73 दिन 13 घंटे पूर्व
07/07/2019
भोपाल  [ महामीडिया ]   आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को ही देवशयनी एकादशी के नाम से जाना जाता है क्योंकि इसी दिन से श्रीहरि का शयन-काल प्रारंभ होता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार वर्ष के 12 मास में 4-4 मास तीनों देवता का शयन-काल होता है।देवशयनी एकादशी से देव प्रबोधिनी या देवउठनी एकादशी तक श्रीहरि, देव प्रबोधिनी एकादशी से महाशिवरात्रि तक शिव और महाशिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक ब्रह्मा का शयन-काल होता है। चूंकि यह समय भारत में वर्षाकाल भी होता है, इसलिए इसी दिन से सारे मांगलिक कार्य प्रतिबंधित हो जाते हैं।इसी दिन से चातुर्मास का आरंभ भी माना गया है। देवशयनी एकादशी को हरिशयनी एकादशी और पद्मनाभा के नाम से भी जाना जाता है। इसी रात्रि से भगवान श्रीहरि का शयन-काल आरंभ हो जाता है जिसे चातुर्मास या चौमासा का प्रारंभ भी कहते हैं।देवशयनी या हरिशयनी एकादशी के विषय में पुराणों में विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है जिनके अनुसार इस दिन से भगवान विष्णु चार मास की अवधि तक पाताल लोक में निवास करते है। कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी से विष्णु उस लोक के लिए गमन करते है और इसके पश्चात चार माह के अतंराल के बाद सूर्य के तुला राशि में प्रवेश करने पर विष्णु का शयन समाप्त होता है तथा इस दिन को देवोत्थानी या देवउठनी एकादशी का दिन होता है।इन चार माहों में विष्णु क्षीर सागर की अनंत शय्या पर शयन करते है। इसलिए इन महीनों में कोई भी धार्मिक कार्य नहीं किया जाता है। चातुर्मास नाम के रूप में यह चार महीनों का संकेत देता है जिसमें आषाढ़, श्रावण, भाद्रपद और आश्विन चातुर्मास काल के दौरान, सभी शुभ कार्य वर्जित होते हैं। भक्तों से तपस्या, भक्तिपूर्ण गतिविधियों को पूरा करने और अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण लगाने की उम्मीद की जाती है।
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