महामीडिया न्यूज सर्विस
श्री गुरुदेव की कृपा का फल

श्री गुरुदेव की कृपा का फल

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 19 दिन 21 घंटे पूर्व
01/08/2019
भोपाल (महामीडिया) महर्षि जी ने वेद को विश्व ब्रह्मण्ड के संचालन का संविधान बतलाया। उन्होंने बताया कि वेद ही वे प्रकृति के नियम-सृष्टि के संविधान हैं जिनसे समूचे विश्व ब्रह्मण्ड का निर्विघ्न, निरन्तर प्रशासन, अनादि काल से होता आ रहा है और अनन्त काल तक होता जायेगा। इसी सृष्टि के संविधान को आधार बनाकर उन्होंने "प्रशासन के पूर्ण सिद्धांतों" नामक पुस्तक प्रकाशित की और "राजनीति के सर्वोच्च सिद्धांतों" का पाठ्यक्रम उपलब्ध कराया। मनुष्य या किसी भी प्राणी या विश्व ब्रह्मण्ड के जीवन का आधार चेतना है। आज के वातावरण में शिक्षा जगत चेतना की शिक्षा से अनभिज्ञ है। बाल मंदिर से विद्यावारिधि या विद्यावाचस्पति तक के पाठ्यक्रमों में कहीं भी चेतना की शिक्षा का समावेश नहीं है। महर्षि जी ने समस्त विश्व में बड़ी संख्या में शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना की और चेतना पर आधारित-आत्मा पर आधारित शिक्षा को वर्तमान शिक्षा की मुख्य धारा में सम्मिलित किया। महर्षि जी की चेतना पर आधारित शिक्षा की विशेषता यह है कि इस शिक्षा में केवल बुद्धिपरक होकर ज्ञान पूर्ति नहीं की जाती, इस व्यवस्था में चेतना का निरन्तर विस्तार किया जाता है। विद्यार्थी की जिज्ञासा बढ़ती जाती है और नया-नया सम्पूर्ण ज्ञान जो स्वयं उसकी चेतना में ही निहित है, वह प्रस्फुटित होकर व्यक्ति को महाज्ञानी बना देता है। महर्षि जी ने शरीरकी में नाड़ी तंत्र के शीर्ष वैज्ञानिक डॉ. टानी नेडर (एम.डी., पीएच.डी.) एवं कुछ अन्य आधुनिक चिकित्सा वैज्ञानिकों को प्रेरित, प्रोत्साहित और मार्गदर्शित किया कि वे मानव शरीर की संरचना का विस्तृत अध्ययन करें और यह देखें कि वैदिक वांङ्गमय की संरचना और कार्यप्रणाली मं क्या समानतायें हैं। जब डॉ. नेडर और उनके सहयोगी वैज्ञानिकों ने इसका अध्ययन प्रारम्भ किया तो वे चकित रह गये। उन्होंने पाया कि महर्षि जी केवल यूँ ही नहीं कह रहे थे। वास्तविकता यह पाई गई कि वेद और वैदिक वांङ्गमय तथा मानव शरीर, दोनों की संरचना और कार्य प्रणाली एक ही है। अनुसंधानकर्ताओं ने कहा कि शरीर मानो एक भवन है और वैदिक वांङ्गमय उसका मानचित्र है। उसी मानचित्र के आधार पर शरीर का निर्माण हुआ है। महर्षि जी ने डॉ. नेडर के इस महत्वपूर्ण शोध प्रबन्ध और चिकित्सा के क्षेत्र में मानव जाति को इस शोध से होने वाले लाभ को दृष्टिगत रखते हुए उन्हें स्वर्ण से तथा कुछ वैज्ञानिकों को चाँदी से तौला और उन्हें अपने "महर्षि विश्व शांति राष्ट्र" का महाराजा नियुक्त कर उनका राज्याभिषेक करके उन्हें "महाराजाधिराज" की उपाधि से सुशोभित किया। राजाराम की पुस्तक, "एक्सप्रेशन आफ वेद एवं वैदिक लिटरेचर इन ह्यूमन फिजियोलॉजी" प्रकाशित हुई जिसमें विस्तृत रूप से वेद और मानव शरीर की संरचना और कार्य प्रणाली का तुलनात्मक अध्ययन वर्णित है। महर्षि जी ने वैदिक विश्व प्रशासन की स्थापना कर सम्पूर्ण विश्व को 12 समय क्षेत्रों में विभाजित किया। इन समय क्षेत्रों को 12 राशियों से और भारतीय द्वादश ज्यातिर्लिंगों से जोड़कर वैदिक विश्व प्रशासन संचालन की व्यवस्था की। महर्षि जी ने प्रत्येक ज्योतिर्लिंग के साथ 16-16 देशों को जोड़कर राष्ट्रकुल के सभी 192 सदस्य राष्ट्रों के लिये प्रत्येक ज्योतिर्लिंग से 48- 48 नगरों को जोड़कर 576 नगरों के लिये ग्रह शांति की व्यवस्था की। महर्षि जी ने हॉलैण्ड में अगस्त 1997 में ब्रह्मचारी गिरीश को महर्षि वैदिक विश्व प्रशासन का प्रधानमंत्री नियुक्त किया। प्रकृति के संविधान वेद के द्वारा हर व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान देने के उद्देश्य से महर्षि जी ने वैदिक शिक्षा, वैदिक स्वास्थ्य, वैदिक प्रशासन, वैदिक अर्थशास्त्र, वैदिक वास्तुकला, वैदिक सुरक्षा तथा वैदिक कृषि के क्षेत्रों में ज्ञान उपलब्ध कराने और प्रायोगिक कार्यक्रमों को लागू करने का विधान किया। पूर्ण ज्ञान हर व्यक्ति तक और विश्व के कोने-कोने में पहुँचाने के लिये आठ विभिन्न सेटेलाइट चैनल्स् के द्वारा "महर्षि ओपन यूनिवर्सिटी" के माध्यम से पाठ्यक्रम उपलब्ध कराये। "महर्षि वेदा विजन" महर्षि चैनल पर भी महर्षि जी ने वैदिक कार्यक्रमों और पाठ्यक्रमों के प्रसारण का प्रबन्ध किया। महर्षि जी ने प्राचीन स्थापत्यवेद वास्तुकला की विद्या परमार्जित करके सारे विश्व को उपलब्ध करा दी।...(निरंतर)

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