महामीडिया न्यूज सर्विस
स्वतंत्रता के रक्षक

स्वतंत्रता के रक्षक

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 117 दिन 9 घंटे पूर्व
13/08/2019
भोपाल (महामीडिया) भारतीय सेना एक रेजिमेंट प्रणाली है, जिसके तीन प्रमुख अंग थल सेना, जल सेना और नौसेना है। तीनों सेनाओं के सर्वोच्च कमांडर भारत के राष्ट्रपति होते हैं। भारतीय सेना अब तक पाकिस्तान के साथ 4 युद्ध व चीन के साथ एक युद्ध लड़ चुकी है। भारतीय सेना ने कभी-भी समर्पण नहीं किया है। प्रत्येक वर्ष 16 दिसंबर को हम लोग विजय दिवस के रूप में मनाते हैं। 1971 की जंग में हमारे देश की सेना ने पाकिस्तान को बुरी तरह से परास्त किया। इस युद्ध के बाद ही पाकिस्तान दो टुकड़ों में बंट गया जिसे आज की तारीख में हम लोग बांग्लादेश के नाम से जानते हैं। 16 दिसंबर, 1971 को पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों ने हमारे देश की सेना के सामने सरेंडर किया था। इस युद्ध के समय लगभग 3900 भारतीय सेना के जवान शहीद हो गए थे। उन शहीदों और वीर योद्धाओं की याद में हम लोग प्रत्येक वर्ष विजय दिवस के दिन श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। हमारी सेना का आदर्श वाक्य है, करो या मरो।
भारतीय सेना के बारे में कुछ रोचक तथ्य-
जंगलों में लड़ने के लिए भारत की सेना को विश्व की सेनाओं में श्रेष्ठ माना जाता है। भारत की सेना की विशेषता जानने के लिए ब्रिटेन, रूस, अमेरिका जैसे देश की सेनायें भारत में आकर प्रशिक्षण और जानकारी लेती हैं। भारत के राष्ट्रपति की सुरक्षा के लिए भारत की सेना की एक टुकड़ी राष्ट्रपति भवन में ही रहती है जो 24 घंटे राष्ट्रपति की सुरक्षा करती है। लद्दाख में द्रास और सुरु नदी के बीच स्थित ?बेली ब्रिज? (जो दुनिया का सबसे ऊंचा ब्रिज है) का निर्माण भारतीय सेना ने 1982 में किया था। भारतीय सेना में घुड़सवारों की एक टुकड़ी है। वर्तमान में सिर्फ 3 देशों में घुड़सवार की सेना है। भारत उनमें से एक है। भारतीय सेना सियाचिन ग्लेशियर (जो विश्व का सबसे ऊंचा युद्ध का मैदान है) पर अभ्यास करती है। यह युद्ध का मैदान समुद्र तल से 5000 मीटर ऊपर है। अत्यंत विषम परिस्थितियों में भारतीय सेना यहां पर युद्ध अभ्यास करती है। पूरे देश में भारतीय सेना के 53 कैंटोनमेंट और 9 आर्मी बेस हैं।
भारत की सेना दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी सेना है। भारतीय मिलिट्री इंजीनियरिंग सर्विसेज भारत की सबसे बड़ी हथियार निर्माता कंपनी है। असम राइफल भारतीय सेना की सबसे पुरानी पैरामिलिट्री फोर्स है। इसकी स्थापना 1835 में की गई थी। संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियान के अनुसार भारत की सेनाओं को विश्व के दूसरे देश में युद्ध करने के लिए भेजा जाता है। भारतीय सेना पर हर भारतीय को गर्व है और हो भी क्यों न, यह भारतीय सेना ही है जो भारत को सदैव दुश्मनों से दूर रखती है। भारतीय सैनिक अपनी जान पर खेलकर हमारे राष्ट्र को सुरक्षित और स्वतन्त्र बनाये रखते हैं। उनकी वीरता और कर्त्तव्य-भावना के लिए पूरा देश उन्हें सम्मान की दृष्टि से देखता है। वैसे तो हममें से लगभग सभी को उनके योगदान और उनकी उपलब्धियों के बारे में कुछ न कुछ तो पता ही है, परन्तु यहाँ हम जिन बातों का उल्लेख करने जा रहे हैं, उससे आपका भारतीय सेना के प्रति सम्मान और बढ़ जाएगा। सीयाचिन ग्लेशियर इस दुनिया का सबसे ऊँचाई पर स्थित रणक्षेत्र है, जो कि समुद्र तल से 5000 मीटर की ऊंचाई पर है। यहाँ पर तापमान 50 डिग्री से नीचे चला जाता है और इतने कठिन वातावरण में भारतीय सेना हर पल सीमा की सुरक्षा करती रहती है। भारतीय सेना चीन और अमेरिका के बाद विश्व की सबसे तीसरी बड़ी सेना है। भारत की पूरी सेना में 13 लाख 25 हजार सक्रिय सैनिक और 21 लाख 43 हजार से भी अधिक रिजर्व सैनिक है। 1970 के आरम्भ और 1990 के आखिर में भारत ने गुपचुप तरीके से अपने परमाणु परीक्षण कर लिया और अमेरिका के गुप्तचर संगठन सीआईए को इसकी भनक तक नहीं लगी। इन घटनाओं को आज तक सीआईए की एक बड़ी विफलता और भारतीय सेना की एक बड़ी सफलता माना जाता है। लोंगेवाला की लड़ाई बहुत ही मशहूर लड़ाई है। बाद में जिसकी कहानी से प्रभावित होकर बॉलीवुड में 'बॉर्डर' नाम से एक फिल्म भी बनाई गई। यह लड़ाई वर्ष 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच हुई थी। इसमें जहाँ एक ओर तो 2000 पाकिस्तानी सैनिक थे, तो दूसरी ओर मात्र 120 भारतीय सैनिक थे। भारतीय सैनिकों के पास एक जीप पर लगी हुई एक एम40 रिक्वाइल-लेस के अतिरिक्त कोई भी विशेष घातक हथियार नहीं था, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तानी सैनिकों के पास 45 टैंक और एक मोबाइल इन्फेंट्री ब्रिगेड थी। बहुत ही कम संख्या और लगभग हथियारविही न होने की विपरीत परिस्थितियों में भी भारतीय सैनिकों ने दुश्मनों को अपनी पीठ नहीं दिखाई। वो मैदान-ए-जंग में पूरी रात तब तक डटे रहे जब तक कि उनकी सहायता को सुबह वायुसेना न आ गई और शत्रुओं को उल्टे पैर भागने को मजबूर न कर दिया। भारत के पास दुनिया की सबसे बड़ी 'स्वैच्छिक' सेना है। भारतीय संविधान में अनिवार्य भर्ती (जबरन भर्ती) का प्रावधान होते हुए भी भारतीय सेना को अपने पूरे इतिहास में कभी भी ऐसा करने की आवश्यकता नहीं पड़ी। पूरी सेना का हर-एक सैनिक अपने स्वयं की इच्छा से इसमें सम्मिलित हुआ है। 
भारत के अन्य सरकारी संगठनों एवं संस्थाओं के विपरीत, भारतीय सेना में जाति या धर्म के आधार पर किसी भी प्रकार के आरक्षण का प्रावधान नहीं है। सैनिकों को उनके परीक्षणों में केवल उनके द्वारा प्रदर्शित की गई उनकी योग्यताओं और शारीरिक क्षमताओं के आधार पर ही चुना जाता है। वर्ष 1971 में भारत-पाक युद्ध, 93 हजार पाकिस्तानी सैनिकों और अधिकारियों के आत्मसमर्पण के साथ समर्पण हुआ। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद, युद्धबंदियों को इतनी बड़ी संख्या में हिरासत में लेने की यह सबसे बड़ी घटना है यही वह युद्ध था। जिसकी समाप्ति ने एक स्वतन्त्र बांग्लादेश की नींव रखी।
ऑपरेशन राहत (2013) अब तक का किया जाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा असैनिक बचाव कार्य है। इस अभियान को भारतीय वायु सेना ने उत्तराखंड में बाढ़ से प्रभावित नागरिकों को बचाने के लिए संचालित किया था। इसके पहले चरण, 17 जून, 2013 से आगे, में वायु सेना ने हेलीकॉप्टरों की सहायता से कुल 2 लाख लोगों को बचाया और 3 लाख 82 हजार 4 सौ किलोग्राम की राहत सामग्री और उपकरणों को पहुँचाया। 
भारतीय सेना ने दुनिया के सबसे ऊँचे सेतु का निर्माण किया है। बेली ब्रिज दुनिया में सबसे ऊंचा सेतु है, जो कि हिमालय पर्वत शृंखला में द्रास और सुरु नदियों के बीच स्थित लद्दाख घाटी पर बना है। भारतीय सेना ने इसे वर्ष 1982 में बनाया था। 
भारतीय सेना की स्थापना एक अप्रैल, 1895 में हुई थी। भारतीय सेना के पास 12.5 लाख सक्रिय सैनिक और 11.5 लाख सुरक्षित सैनिक हैं (जवानों की संख्या दुनिया में चीन के बाद सबसे अधिक है)। भारत की आजादी के बाद भारतीय सेना ने पाकिस्तान की सेना को चार बार हराया है (1948, 1965, 1971 तथा 1999) तथा 1962 में चीन से एक बार हार मिली है। भारतीय सेना के प्रमुख कमांडर भारत के राष्ट्रपति हैं।  
भारतीय सेना आण्विक हथियार से लैस है और उनके पास उचित मिसाइल तकनीक भी उपलब्ध है। भारतीय सेना की ओर से दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान परमवीर चक्र है। इस लेख में हमने भारतीय सेना के 15 ऐसे कथनों को बताया है जो कि भारतीय सेना में ऊर्जा का संचार करते हैं तथा भविष्य में आने वाले सैनिकों को भी ऊर्जावान बनाकर भारतीय सरजमीं की रक्षा करने की प्रेरणा प्रदान करते रहेंगे। 
एक दुस्साहस का जिम्मेदार उत्तर-  वर्ष 1999 का कारगिल युद्ध भारतीय शौर्य और गौरव के इतिहास की एक अमिट गाथा तो है ही, इस युद्ध ने दुनिया भर में भारत की छवि एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित की। प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की इस संकट से निपटने की परिपक्व कूटनीति ने पाकिस्तानी ने दुस्साहस को उसकी करारी हार में परिवर्तित कर दिया। शत्रु को न मात्र सीमा पर घुटने टेकने पड़े, बल्कि इस घटना के लिए पूसे संसार में उसे अपमान भी सहना पड़ा।
इतिहास में अगर कोई ऐसा क्षण है, जिसके कारण भारत का एक जिम्मेदार और दमदार ताकत के रूप में पर स्वीकार किया गया, तो वह कारगिल युद्ध है। यह क्षण 1971 का बांग्लादेश का मुक्ति युद्ध भी हो सकता था। मगर उस युद्ध में भारत को एक अलग रूप से देखा गया, जिसने पाकिस्तान को तोड़ा था। एक ऐसे देश के रूप में नहीं, जिसके सैन्य हस्तक्षेप ने पाकिस्तानी सेना के नरसंहार और अत्याचार को रोका था। यह क्षण 1974 में हुआ पहला परमाणु परीक्षण भी हो सकता था, पर हम स्वयं ही इसे 'शांतिपूर्ण' कहने से घबराए हुए थे। हालांकि, संसार ने हमारा खेल देखा और हमें गैर-सैन्य परमाणु तकनीक की पहुंच से भी बारह कर दिया। वह भारत एक निर्धन देश था, जो अपने विकास कार्यों के लिए विदेशी सहायता पर निर्भर था। इस स्थिति ने 1971 और 1974 के हमारे दावे को कमजोर कर दिया था। कारगिल युद्ध अनेक अर्थों में असाधारण था। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में 1998 के प्रारंभ में भारतीय जनता पार्टी और इसके सहयोगियों की सरकार बनी थी। उन्होंने शीघ्र ही अत्यंत विवादास्पद कदम उठाए, जिसका सिधा प्रभाव कारगिल युद्ध पर पड़ा। 
पहला कदम, मई 1998 में किए गए परमाणु परीक्षणों की शृंखला थी, जिसने भारत को औपचारिक रूप से परमाणु शक्ति बनाया। हालांकि, देश में परीक्षणों का स्वागत किया था, पर विश्व हैरान था। उसके बाद पाकिस्तानी परीक्षणों ने पश्चिमी देशों में परीक्षणों का स्वागत किया था, पर दुनिया हैरान थी। उसके बाद पाकिस्तानी परीक्षणों ने पश्चिमी देशों के उस संदेह को पुष्ट कर दिया कि दक्षिण एशिया परमाणु युद्ध की ओर बढ़ रहा है। दोनों देशों पर कठोर प्रतिबंध लगाए गए। इसमें मुख्य रूप से भारत को हथियारों की होड़ को बढ़ावा देने वाले देश के रूप में लक्षित किया गया। ऐसे में, भारत का कहना कि वह चीन व पाकिस्तान के परमाणु और मिसाइल सहयोग से देश की सुरक्षा को उत्पन्न हुए संकट के कारण प्रतिरक्षात्मक तैयारी है।
वाजपेयी का दूसरा कदम और भी हैरत में डालने वाला रहा- वह पाकिस्तान पहुचं गए। विश्लेषकों ने तक की परिस्थिति में उसे ऐतिहासिक लाहौर यात्रा कहा। बहुत कम ही लोगों को याद होगा। कि जिस दिन वाजपेयी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ ली, उस दिन अपने अकेले सार्वजनिक कार्यक्रम में उन्होंने नई दिल्ली के नेशनल स्टेडियम में भारत और पाकिस्तान के बीच हो रहे हॉकी टेस्ट मैच में मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए थे। परीक्षणों के बाद द्विपक्षीय संबंधों में आई कमी के बावजूद पीछे के मार्ग से रिश्तों को सुधारने के प्रयास कोलंबो और न्यूयॉर्क में किए गए। उसके बाद फरवरी 1999 में अभूतपूर्व लाहौर यात्रा हुई। वाजपेयी का संदेश स्पष्ट था। भारत, पाकिस्तान को शत्रु नहीं मानता, बल्कि वह चाहता है कि पड़ोसी देश भी समृद्ध बने। बदले में, पाकिस्तान को भारत से डरने की आवश्यकता नहीं है, वह यथास्थिति में परिवर्तन नहीं करना चाहता। यह संदेश नवाज शरीफ और पाकिस्तिानी राजनीतिक प्रतिष्ठानों को समझ आ रहा था, किंतु उस पर चलना पाकिस्तान के सत्ता ढांचे में बड़े परिवर्तन का कारण बनता। पाकिस्तान में सेना मात्र एक अहम संस्था नहीं है, बल्कि भारत, अफगानिस्तान और अमेरिका के साथ रिश्तों पर सदैव से उसको वीटो का अधिकार प्राप्त रहा है और अब भी है। परमाणु कार्यक्रम भी सेना के अधीन हैं। भारत की बढ़ती मजबूती के डर ने पाकिस्तानी सेना के दबदबे को वहां और बढ़ा दिया था। 
प्रथम दृष्टा में, पाकिस्तानी सेना का सर्दियों में कारगिल की चोटिंयों पर कब्जा करना एक सोचा-समझा दुस्साहसी कदम दिखाुई दे रहा था। किंतु भारतीय सेना ने उसे मुक्त करा लिया। वह  भारत की कूटनीतिक व सैन्य जीत थी। इसका श्रेय प्रधानमंत्री वाजपेयी की कुशल नीति को जाता है। प्रारंभिक प्रतिक्रिया अवश्य पड़ोसी देश के धोखा देने और सदमे की थी। 
प्रारंभिक आकलन था कि यह मुजाहिदीन और कुछ छिटपुट घुसपैटियों का काम था। किंतु दूसरी ओर से हुई भीषण गोलाबारी ने शीघ्र ही मुजाहिदीन वाली कहानी पर पानी फेर दिया। कब्जे वाले स्थान भारी संगीनों से लैस था और घुसपैठियों की चोटियों पर चढ़ाई लंबे समय तक जारी रहने वाली थी। सेना को कदम उठाना ही था। सुरक्षा संबंधी मंत्रिमंडलीय समिति की औपचारिक बैठक रोज होती थी, जिसमें सेना के तीनों प्रमुख सक्रिय रूप से भाग लेते थे। हमें युद्ध की बड़े स्तर पर ले जाना पड़ा था। 
वायु सेना को प्रवेश के साथ ही नियंत्रण रेखा को पार न करने की चेतावनी दी गई थी। पाकिस्तान ने दो वायु सेना के विमानों और एक सेना के हेलीकॉप्टर को उतारा, जिसमें जान का नुकासान हुआ और एक पायलट को युद्ध बंदी के तौर पर पकड़ा गया। पर भारतीय सेना तुरंत सक्रिय हुई और सब बदलने लगा। भारतीय सेना ने जनरल परवेज मुशर्रफ और उनके स्टाफ प्रमुख जनरल मोहम्मद अजीज के बीच हुई बातचीत का टेप जारी कर दिया, जिसके साथ पाकिस्तानी सेना के घुसपैठियों के मुजाहिदीन होने के दावे की पोल खुल गई। इससे दुनिया को भी यह समझाने में सहायता मिली कि पाकिस्तान खतरनाक खेल-खेल रहा है, जिसे रोका जाना आवश्यक है। 
दूसरी बात नियंत्रण रेखा को पार नहीं करने का निर्णय, भारत के पक्ष में निर्णायक साबित हुआ। हालांकि इसने क्षेत्र को वापस लेने के प्रयास को कठिन बना दिया था। नियंत्रण रेखा का सम्मान किए जाने के निर्णय को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत व पाकिस्तान के बीच शांति बनाए रखने के मजबूत कदम के तौर पर देखा गया। भारत का जिम्मेदारी पूर्ण रैवया, पाकिस्तान के दुस्साहसी कदम के उलट था। मेरा मानना है कि वाजपेयी के इस निर्णय से युद्ध की अवधि को कम करने में सहायता मिली। अमेरिका ने हस्तक्षेप किया और पाकिस्तान वापस जाने को मजबूर हो गया। अन्यथा युद्ध में कहीं अधिक खून बहा होता कारगिल ने पीएम वाजपेयी के राजनय को स्थापित किया।
(प्रस्तुति महामीडिया डेस्क)

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