महामीडिया न्यूज सर्विस
बाढ़ का प्रभाव: आइए हम अपनी दृष्टि और विकास की परिभाषा को फिर से परिभाषित करें

बाढ़ का प्रभाव: आइए हम अपनी दृष्टि और विकास की परिभाषा को फिर से परिभाषित करें

admin | पोस्ट किया गया 30 दिन 15 घंटे पूर्व
17/08/2019
भोपाल (महामीडिया) देश के कई राज्य भारी बारिश और बाढ़ से बुरी तरह प्रभावित हैं। हाल ही में हुई बारिश के कहर से गाँव ही नहीं बल्कि शहर भी बुरी तरह प्रभावित हुए । गुजरात, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र और उत्तराखंड जैसे राज्यों में सैकड़ों लोगों की जान चली गई और दस लाख से अधिक लोग विस्थापित हुए। ऐसी खबरें हैं कि अकेले केरल में दो लाख से अधिक लोग राहत शिविरों में रह रहे हैं। कर्नाटक और महाराष्ट्र में स्थिति समान रूप से गंभीर है। अंतरिम उपाय थोड़े समय के लिए तो उपयुक्त हैं लेकिन यह अंतिम उत्तर नहीं है।
मौसम विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, इस सप्ताह (रविवार-सोमवार), दुनिया भर में जिन 15 स्थानों पर सर्वाधिक वर्षा हुई है, उनमें से आठ भारत में हैं। आमतौर पर ऐसे विकराल मौसम की स्थिति के लिए जलवायु परिवर्तन को ही जिम्मेदार ठहराया जाता है, पर इन घटनाओं के लिए अकेले उसको  दोष देने का कोई औचित्य नहीं है, इसके बजाय अच्छा यह होगा कि, ऐसे विकराल जलवायु प्रकरण को स्वीकार करके, उसको सामान्य करने और उनके प्रभाव को कम करने के तरीकों को ढूंढ़ना चाहिए ।
यह गंभीर समस्या कई सवाल खड़े करती है? क्यों हमारी नदियाँ जो परंपरागत रूप से परोपकारी और जीवनदायिनी कही जाती हैं, अचानक वह जानलेवा कैसे हो गई ? हमारे पूर्वज इन पहाड़ियों और नदियों की छत्र-छाया में आराम से रहा करते थे और प्रकृति की सुविधाओं और प्रचुरता का आनंद लेते थे। पहाड़ियों, नदियों और वर्षा को किसने विनाशकारी बना दिया?
क्यों बाढ़ का शहरों और कस्बों पर विनाशकारी प्रभाव पड़ता है? मुख्य कारणों में से एक यह है कि अतिरिक्त पानी की निकासी के लिए पर्याप्त नालियां नहीं है और जो हैं भी वो प्लास्टिक के कचरे से भरी रहती हैं, इसके कारण आर्द्रभूमि, बाढ़ के मैदानों में पानी भर जाता है।  नदी के किनारे भी अतिक्रमण और अत्यधिक निर्माण से नष्ट हो गए हैं। इस तरह के अनियोजित विकास का असर मुंबई (2005 और 2017), उत्तराखंड (2013), श्रीनगर (2014), चेन्नई (2015) और केरल (2018) की बाढ़ में भी देखा गया है।
प्लास्टिक बाढ़ के खतरे को बढ़ाता है। जबकि कई शहरों ने प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया हुआ है, लेकिन कानून के कमजोर कार्यान्वयन के कारण इसका ज्यादा असर नहीं हुआ । बाढ़ के हालिया प्रदर्शन से देश में बांधो के प्रबंधन पर भी सवाल खड़े किए हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार यह विषय तब सामने आया है जब राज्यों को भारी वर्षा की शुरुआती चेतावनी के बावजूद, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे राज्य समय पर बांधों से पानी छोड़ने में विफल रहे। यही कारण है कि इस हफ्ते केरल में भूस्खलन हुआ है।
यह समय है कि सिविल सोसाइटी, मीडिया और राजनेता जागें और साथ मिलकर इस स्वीकृत जीवन शैली पर दृढ़ता से सवाल उठाएं। यह समय है कि हम व्यक्तिगत स्तर पर, उन आदतों और जरूरतों को बदलें, जो इस विकास की रफ़्तार को कम कर रहा है। सादगी की ओर बढ़ना असंभव नहीं है। आइए हम अपनी दृष्टि और विकास की परिभाषा को संशोधित करें। इन सभी मुद्दों से निपटने की आवश्यकता है, यदि भारत लगातार जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप तूफान का सामना नहीं करना चाहता है।
केंद्र और राज्य सरकारों को बाढ़ की रोकथाम और राहत के लिए अलग मंत्रालय की स्थापना करनी चाहिए। इस मंत्रालय को अन्य सभी सम्बंधित विभागों के साथ मिलकर काम करना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि बाढ़ को रोकने के लिए सभी आवश्यक कदम उठाए गए हैं और अगर फिर भी जरुरत लगती है, तो वो प्रभावित आबादी को राहत पंहुचा सकते हैं ।
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