महामीडिया न्यूज सर्विस
स्नान-ध्यान-पूजा

स्नान-ध्यान-पूजा

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 87 दिन 7 घंटे पूर्व
19/08/2019
भोपाल (महामीडिया) ईश्वर ने सबका सृजन किया है। वह सबके पिता जैसा है। अत: उसकी आराधना सबको करनी चाहिए। यह काम किसी अकेले का नहीं है; वह सबका है। अपने-अपने अनुकूल समय, अनुकूल रीति से कर सकते हैं। फिर भी घरों में आरती तथा प्रसाद के समय, सब एकत्रित होते हैं, तो घर की संस्कृति, शक्ति दोनों बलवती होती है।
पूजा करना सबका कर्तव्य है। पूजा करने वाले को फूल, फल, दुर्वा, तुलसी, बिल्वपत्र, नैवेद्य, जल- आदि लाकर देने में सहायता कर सकते हैं। कुछ लोग मंत्र व सेवा के माध्यम से, तो कुछ दूसरों को स्वच्छता आदि अन्य काम करने के द्वारा सहयोग करना चाहिए। पूजा में कोई भी बाधा न आए, ऐसा बरतना भी सहयोग ही होता है। पूजा में सहयोग करना भी पूजा ही होती है।
पूजा अर्थात अंतरंग में घटने वाली एक भक्तियुक्त अर्चना होेती है। उसके पूरक अनिवार्य ऐसे बाहयाचार हैं। बाहयाचार ही सर्वस्व नहीं है। फिर भी वह एक अनिवार्य भाग है। सामान्यत: किए जाने वाली पूजा के औपचारिक आधार पर सब तैयारियाँ करनी चाहिए। स्थानशुद्धि, पात्रशुद्धि, पूजाद्रव्यों की शुद्धि, वहाँ के परिसर की शुद्धि-इनके साथ-साथ हल्दी, कुंकुम, अक्षत, पुष्प, फल, धूप, दीप, नैवेद्य आदि वस्तु कब उपलब्ध कराना है, इसे समझ कर ठीक उसी समय उनको उपलब्ध कराना होगा।
उसकी शुद्धता एक नितयकर्तव्य ही है। क्योंकि, हमारा सृजन करने वाले की, इस जगत् के अधिपति की अर्चना हमें शुद्ध मन, शुद्ध तन से करनी चाहिए। इसीलिए वह स्थान भी नित्य ही शुद्ध रखना होगा।
'मननात् त्रायते इति मन्त्र:' (अर्थ: मंत्र उसे कहते हैं, जिसके मनन से हमारी रक्षा होती है) श्लोक, मंत्र आदि का शब्दरूप में उच्चार करना चाहिए। इस प्रकार उसे पूर्णत: समझ लेना चाहिए। यदि विदित नहीं है, तो जानकारों से समझ लेना होगा। हर बात को समझ कर तद्नुसार आचरण करना चाहिए। यह अनिवार्य नहीं है कि मंत्र, श्लोक आदि संस्कृत में ही हो। अपनी-अपनी भाषाओं के उत्तम भावमय शब्दसंपदा से युक्त पदावलि का प्रयोग करते हुए, हम पूजा कर सकते हैं। वचन, अभंग, ओवी, दोहा, त्रिपदी, चौपदी, तिरूप्पावै, नालायिरं, गुरूबानी आदि का प्रयोग करते हुए ही पूजा चलती आयी है।
हिंदू सभ्यता की परंपरा में उत्सव-पर्वों, तीज-त्यौहारों, जन्मदिन आदि के अवसर पर भगवान की आराधना करते की पद्धति है। उसी दिन विशेष पूजा-पाठ आदि किया जाता है। उस दिन बुजुर्ग, बंधु-मित्र, पड़ोसी, सहयोगी आदि सबको आमंत्रित करने से हमें श्रेयप्राप्ति होती है तथा अन्यों को भी प्रेरणा मिलती है। 
पूजा संपन्न होने के बाद की व्यवस्थाएँ आरंभ से भिन्न होती हैं। बिना उपयोग की हुई सभी वस्तुएँ निर्माल्य बनती हैं। उनको ऐसे स्थान पर या पेड़ के तले डालना चाहिए, जहाँ उन्हें कोई भी पैरों तलें रोंद न सके। पूजा के उपरांत, बिना-पूजा के फूल तथा पूजा किए प्रसादरूपी फूल दोनों भी अलग-अलग कर के रखना चाहिए। तीर्थ-प्रसाद स्वीकृति के बाद, बचे फूलों का समुचित रीति से उपयोग करना चाहिए। स्नानघर के नाली आदि में नहीं फेंकने चाहिए। पंचवाल, पंचपात्र आदि समुचित स्थान पर रखना चाहिए। बलिहरण, बची हुयी अक्षत आदि सब भक्तिपूर्वक पक्षिंयों को डालना चाहिए। पूजास्थान को झाडू आदि से साफ न करते हुए, किसी साफ सुथरे कपड़े से शुद्ध करना चाहिए। फूल आदि द्रव्यों पर अपने पैर न पड़े ऐसी सावधानी बरतनी चाहिए।
पूजा सामग्री के साथ-साथ, खास कर मंगलारती के समय घंटा, शंख, ताल, भेरी, नगाड़ा आदि उपलब्ध सभी मंगल वाद्यों का प्रयोग करना चाहिए। हमारे प्रभु वेदप्रिय भी है: नादप्रिय और भक्तिप्रिय भी हैं। इसीलिए इन सभी वाद्यों का प्रयोग वांछनीय है। ईश्वर पूजा के पश्चात्, गंध-फूल-अक्षत आदि चढ़ा के इनकी भी पूजा करते हुए, समुचित स्थान पर रख देना चाहिए।
भारत के सभी कुटुंबों में तुलसी, तुलसी-पूजन निरंतरता से चला आ रहा है।
यन्मूले सर्वतीर्थनि यन्मध्ये सर्वदेवता:।
यदग्रे सर्ववेदाश्च तुलसि त्वां नमाम्यहम्।।
?जिसकी जड़ें सब तीर्थों का, मध्य सब देवताओं का व अग्र सर्व वेदों का वासस्थान है, ऐसी हे तुलसी! मैं तुम्हें वंदन करता/करती हूँ?- ऐसा कहते हुए, घर की सभी महिलाएँ तुलसी-पूजन करती हैं।
तुलसी समुद्र मंथन के दौरान प्रकट हुई वनस्पति है। अत: यह 'ओजोन' से भरी हुयी एक वनस्पति है। सभी रोगों का निवारण करती है। जहाँ पर यह है, वहाँ रोग नहीं होतें। इसके ऊपर से बह कर आने वाली हवाओं से मानव की आयुर्वृद्धि होती है।
देवपूजा में भी तुलसी को प्राधान्य है। तुलसी दल के जल का तीर्थ के रूप में स्वीकार किया जाता है। इसके पत्ते विष्णु को प्रिय हैं। श्रीविष्णु को तुलसी-माला चढ़ा के लोग आनंदित होते हैं। वर्ष में एक बार कार्तिक मास में दीपोत्सव मनाते समय तुलसी वृंदावन के सामने दीपक जलाए जाते हैं। देवोत्थान द्वादशी को तुलसी वृंदावन की पूजा करते हैं।
तुलसी सर्व रोगहारी वनस्पति है। वह कफनिवारक है: पाचन शक्ति बढ़ाती है। उससे प्राणवायु व ओजोन का उत्सर्जन होता है। जहाँ तुलसी होती है, वहाँ रोगाणु नहीं रहते। यह अपनी सुगंध से वातावरण को शीतल बनाती है। शालीग्राम की पूजा करने वाले तुलसीपत्र का उपयोग करते हैं। फिर भी, ये सारे बाहरी कारण हैं।
प्रमुखता से भाव ही पूजा का कारण है।
तुलसी सभी देवताओं का वासस्थान है। यह श्रीविष्णु की भार्या है। अत: जगद्रक्षक, पालनकर्ता श्रीविष्णु की सहचारिणि इस नाते तुलसी की पूजा करते हैं। जैसे शंख से आने वाला जल ही तीर्थ होता है: वैसे ही दान करते समय तुलसी-पत्र चाहिए। इस प्रकार, पूजा-दान आदि के लिए तुलसी अनिवार्य है।
तुलसी की पूजा करो, तुलसी-तीर्थ का सेवन करो, तुलसी का स्वीकार करो, तुलसी से बना कषाय, तुलसी-मिश्रित रस का पान करो। आदि वाक्य निर्देश भारतीय जीवन में बार-बार, उदरशूल, अमर आदि रोगों पर तुलसीपुत्र, तुलसी का कषाय फलप्रद होता है। घाव पर तुलसी-रस का लेपन किया तो घाव जल्दी भर जाता है और त्वचा ठीक होती है। तुलसी के पौधे से युक्त स्थान के आसपास कृमि-कीट कम होते हैं। सांक्रामिक रोगों का प्रसार नहीं होता। साथ ही तुलसी के कारण मन को शांति, संतोष मिलता है। इस प्रकार, तन-मन बुद्धि को सांत्वन प्राप्त होने के लिए तुलसी का प्रयोग अतीव लाभकारी होता है।
पत्रं पुष्पं फलं तोयं या मे भक्तया प्रयच्छति।
तदहं भक्तयुपहृतमश्नामि प्रयतात्मन:।।
?जो कोई मुझे भक्ति से पर्ण(पत्ते), फूल, फल या पानी चढ़ाता है, उस भक्ति के नैवैद्य (भोग) का स्वीकार मैं संतोष के साथ करता हूँ? - ऐसा आश्वासन भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने दिया है। भगवान को भक्ति चाहिए। केवल भक्ति ही पर्याप्त है। उसे आडंबर नहीं चाहिए। सुलभता से प्राप्त होने वाले, रोशनाशक पर्णों (पत्तों)- फूलों से ही वह तृप्त होता है। तुलसी, दुर्वा, दौना, बिल्व, आक आदि पत्ते नाना संदर्भों में पूजाओं में पूजा के लिए प्रयोग होते हैं। गणेशजी को दुर्वा, शिवजी को बिल्वपत्र, विष्णुजी को तुलसी, सूर्य भगवान को आक, इस प्रकार संबंधित देवताओं के लिए प्रिय रहे पत्तों को चुनके लाकर पूजा करते हैं। कार्तिक मास में खाने के पानों का अलंकार देवताओं के लिए अतीव प्रिय होता है। इस प्रकार फूलों जैसे ही पत्तें भी देवताओं को
अर्पित करते हैं।
तीन पान वाला थोड़ासा खुरदरा बिल्वपत्र पतों में विशेष होता है। यह शिवजी को अतिप्रिय
होता है।
त्रिदलं त्रिगुणाकारं त्रिनेत्र च त्रियायुधम्।
त्रिजन्म पापसंहारं एकबिल्वं शिवार्पणाम्।।
?तीन पत्ते, त्रिगुणाकार, शिवजी की तीन आँखों जैसा, त्रिशूल जैसा रहा, तीन जन्मों के पापों का परिहार करने वाला एक बिल्वपत्र शिवजी को समर्पित कर रहा हूँ?- ऐसी एक ध्यानश्लोक भी है।
शिवरात्री में शिवजी की बिल्वार्चना अनिवार्य है। बिल्वपत्र की ही माला तैयार कर, शिवजी को पहनाते हैं। साथ ही, बिल्वपत्र, बिल्वफल औषधि के रूप में भी उपयोग में आता है। पित्त, रक्तचाप आदि रोगों में बिल्वपत्र के सेवन से परिहार प्राप्त होता है। बिल्वफल से पेय-पानीय बनाते हैं। कहते हैं कि इससे पित्त कम हो सकता है।...(निरंतर)
(प्रस्तुति महामीडिया डेस्क)

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