महामीडिया न्यूज सर्विस
हलछठ आज

हलछठ आज

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 86 दिन 21 घंटे पूर्व
21/08/2019
भोपाल (महामीडिया) आज हलछठ है। भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम जी के प्राकट्योत्सव हलछठ  का पर्व भादों कृष्ण पक्ष की छठ को मनाया जाता है। इस व्रत को हलषष्ठी, हलछठ, हरछठ व्रत, चंदन छठ, तिनछठी, तिन्नी छठ, ललही छठ, कमर छठ, या खमर छठ भी कहा जाता है। यह व्रत केवल पुत्रवती महिलाएं करती हैं। इस व्रत में पेड़ों के फल बिना बोया अनाज आदि खाने का विधान है। इस व्रत में केवल भैंस का दूध ही लिया जा सकता है। 
इस व्रत में महुआ के दातुन से दाँत साफ किया जाता है। यह पूजन सभी पुत्रवती महिलाएं करती हैं। यह व्रत पुत्रों की दीर्घ आयु और उनकी सम्पन्नता के लिए किया जाता है। इस व्रत में महिलाएं प्रति पुत्र के हिसाब से छह छोटे मिट्टी या चीनी के वर्तनों में पांच या सात भुने हुए अनाज या मेवा भरतीं हैं।
शाम के समय पूजा के लिये मालिन हरछ्ट बनाकर लाती है। हरछठ में झरबेरी, कास और पलास तीनों की एक-एक डालियां एक साथ बंधी होती हैं। जमीन को लीपकर वहां पर चौक बनाया जाता है। उसके बाद हरछ्ठ को वहीं पर लगा देते हैं। सबसे पहले कच्चे जनेउ का सूत हरछठ को पहनाते हैं। महिलाएं भैंस के दूध से बने दही और महुवा (सूखे फूल) को पलाश के पत्ते पर खा कर व्रत का समापन करतीं हैं।
हल पूजा का विशेष महत्व है।
पुराण में छठ पूजा के पीछे की कहानी राजा प्रियंवद को लेकर है। कहते हैं राजा प्रियंवद को कोई संतान नहीं थी तब महर्षि कश्यप ने पुत्र की प्राप्ति के लिए यज्ञ कराकर प्रियंवद की पत्नी मालिनी को आहुति के लिए बनाई गई खीर दी। इससे उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई लेकिन वो पुत्र मरा हुआ पैदा हुआ। प्रियंवद पुत्र को लेकर श्मशान गए और पुत्र वियोग में प्राण त्यागने लगे। उसी वक्त भगवान की मानस पुत्री देवसेना प्रकट हुईं और उन्होंने राजा से कहा कि क्योंकि वो सृष्टि की मूल प्रवृति के छठे अंश से उत्पन्न हुई हैं, इसी कारण वो षष्ठी कहलातीं हैं। उन्होंने राजा को उनकी पूजा करने और दूसरों को पूजा के लिए प्रेरित करने को कहा।
राजा प्रियंवद ने पुत्र इच्छा के कारण देवी षष्ठी की व्रत किया और उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कहते हैं ये पूजा कार्तिक शुक्ल षष्ठी को हुई थी और तभी से छठ पूजा होती है। इस कथा के अलावा एक कथा राम-सीता जी से भी जुड़ी हुई है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब राम-सीता 14 वर्ष के वनवास के बाद अयोध्या लौटे थे तो रावण वध के पाप से मुक्त होने के लिए उन्होंने ऋषि-मुनियों के आदेश पर राजसूर्य यज्ञ करने का फैसला लिया। पूजा के लिए उन्होंने मुग्दल ऋषि को आमंत्रित किया । मुग्दल ऋषि ने मां सीता पर गंगा जल छिड़क कर पवित्र किया और कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को सूर्यदेव की उपासना करने का आदेश दिया। जिसे सीता जी ने मुग्दल ऋषि के आश्रम में रहकर छह दिनों तक सूर्यदेव भगवान की पूजा की थी।
* इस दिन हल से जुता हुआ अन्न नहीं खाया जाता है। 
* इस दिन महुए की दातुन करना चाहिए।
* यह व्रत पुत्रवती स्त्रियों को विशेष तौर पर करना चाहिए।
* हरछठ के दिन दिनभर निर्जला व्रत रखने के बाद शाम को पसही के चावल या महुए का लाटा बनाकर पारणा करने की मान्यता है।

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