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सम्पूर्ण विश्व में पूज्यनीय हैं गणपति बप्पा

सम्पूर्ण विश्व में पूज्यनीय हैं गणपति बप्पा

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 74 दिन 19 घंटे पूर्व
02/09/2019
भोपाल (महामीडिया) प्यारे बच्चों, आप यह तो जानते ही हैं और देखा भी होगा कि किसी भी शुभ कार्य से पूर्व 'गणपतिजी' का पूजन भारतीय परंपरा की विशिष्टता है। गणपति को विघ्नेश, एकदंत, गणपति, गजानन, गणनायक, गणाधिपति, गणाध्यक्ष तथा लम्बोदर इत्यादि अनेकानेक नामों से पूजा जाता है। गणेश जी का स्वरूप गणपति का आदर्श माना जाता है। यही कारण है कि लोक-चेतना में उनका यह स्वरूप इतना समाया हुआ है कि प्रत्येक मांगलिक कार्य तथा विधि िवधान उन्हीं के पावन स्मरण, आह्वान तथा पूजा- अर्चना से प्रारंभ होता है। ऋद्धि-सिद्धि के देव गणेशजी न मात्र भारत में अपितु विदेशों में भी विभिन्न रूपों में पूजे जाते हैं और उनकी प्रतिमाएं भी चप्पे-चप्पे पर देखने को मिल जाएंगी। आइए जानते हैं किन देशों में और कैसे गणपति की पूजा की जाती है। 
पश्चिम में रोमन देवता 'जेनस' को गणपति के ही समकक्ष माना गया है। ऐसा माना जाता है कि जब भी इतालवी व रोमन लोग पूजा- अर्चना करते थे तो वे अपने इष्ट 'जेनस' का नाम लेते थे। 
जावा में गणेश की मूर्तियों में वे पालथी मारकर बैठे दिखाये गये हैं, उनके दोनों पैर जमीन पर टिके हुए हैं व उनके तलुए आपस में मिले हुए हैं। हमारे देश में गणेश जी की मूर्तियों में उनकी सूंड प्राय: बीच में दाहिनी या बांई ओर मुड़ी हुई है किंतु विदेशों में वह पूर्णतया सीधी, सिरे पर मुड़ी हुई है। 
जापान में गणेश को ?कांतिगेन? नाम से पुकारा जाता है। यहां पर बनी गणेशजी की मूर्तियों में दो या चार हाथ दिखाये गये हैं। यहीं के कोयसान संतसुजी विहार में गणेश की चार चित्रावलियां रखी गयी हैं, जिनमें युग्म गणेश षड्भुज गणेश चतुर्भुर्ज गणेश तथा सुवर्ण गणेश प्रमुख हैं। 
तिब्बत के हरेक मठ में पूजन की परंपरा काफी पुरानी है। यहां गणपति अधीक्षक के रूप में पूजे जाते हैं। नौवी शताब्दी के पूर्वार्द्ध में ही तिब्बत के अनेक स्थानों में गणेश पूजा का प्रचलन शुरू हो गया था। 
चीन के तुन-हु-आंग में एक पहाड़ी गुफा की दीवार पर गणेश की प्रतिमा उकेरी गयी है, तो साथ ही सूर्य, चन्द्र व कामदेव की मूर्तियां भी अंकित हैं। ये मूर्तियां सन् 644 में स्थापित की गयी थीं। गणेश की मूर्ति के नीचे चीनी भाषा में लिखा हुआ है कि ?ये हाथियों के अमानुष राजा? हैं। चीन में भी गणपति कांतिगेन कहलाते हैं। 
कम्बोडिया की प्राचीन राजधानी अंगकोखाट में जो मूर्तियों का खजाना मिला है, उसमें भी गणेश जी विभिन्न रंग-रूप में पाये गये हैं। वैसे यहां कांसे की मूर्तियों का प्रचलन है। 
स्याम देश, जहां पर बसे भारतीयों ने वैदिक धर्म को कई सौ वर्ष पूर्व ही प्रचारित कर दिया था, के कारणवश यहां पनवी धार्मिक आस्था के फलस्वरूप यहां निर्मित की गयी गणेश की मूर्तियां 'अयूथियन' शैली में दिखाई देती हैं। स्याम देश में वैदिक धर्म ?राजधर्म? के रूप में प्रसिद्ध था जिसके कारण यहां आज भी धार्मिक अनुष्ठान वैदिक रीति से ही संपन्न होते हैं।
अमेरिका में तो लंबोदर गणेश की प्रतिमाएं बनायी जाती हैं। वैसे अमेरिका की खोज करने वाले कोलम्बस से पूर्व ही वहां सूर्य, चन्द्र तथा गणेश की मूर्तियां पहुंच गयी थीं। विश्व के कई देश ऐसे भी हैं, जहां खुदाई के दौरान भारतीय देवताओं की मूर्तियां मिली हैं, लेकिन विशेषता यह रही है कि इनमें गणेश जी हर जगह विद्यमान थे। वे मूर्तियां हजारों वर्ष पूर्व की होने का अनुमान लगाया गया है। 
कुल मिलाकर विघ्नहरण विनायक, जहां समूचे विश्व में पूजे जा रहे हैं, वहीं भारत में भी विभिन्न प्रान्तों में 10वीं शताब्दी की प्राचीन मूर्तियों में भी गणेश जी के अनेकानेक रूप मिले हैं, जिन्हें प्रदशों की स्थानीय बोली में विभिन्न नामों से पुकारा जाता है।
गणेश जी का स्वरूप गणपति का आदर्श माना जाता है। यही वजह है कि लोक चेतना में उनका यह स्वरूप इतना समाया हुआ है कि प्रत्येक मांगलिक कार्य तथा विधि-विधान उन्हीं के पावन स्मरण, आह्वान तथा पूजा- अर्चना से शुरू होता है।

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