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सभी देवताओं में प्रथम पूज्य व अग्रणी हैं भगवान श्रीगणेश

सभी देवताओं में प्रथम पूज्य व अग्रणी हैं भगवान श्रीगणेश

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 70 दिन 23 घंटे पूर्व
02/09/2019
भोपाल (महामीडिया) हमारे देश में गणेश उत्सव धार्मिक पहचान के साथ ही हमारी संस्कृति का भी परिचायक है। भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को गणेश चतुर्थी कहा जाता है और इसी दिन भगवान श्रीगणेश जी स्थापना कर गणेश उत्सव का आरंभ होता है। यह उत्सव लगभग दस दिनों तक चलता है। चूंकि गणेश जी को विघ्नहरता भी कहते हैं इसलिए दस दिनों का यह उत्सव बहुत ही शुभ माना जाता है। भगवान श्रीगणेश की जन्म की कथा से पता चलता है की श्रीगणेश का जन्म न होकर उनका निर्माण पार्वती जी की शरीर के मैल से हुआ था। स्नान पूर्व श्रीगणेश को अपने रक्षक के रूप में बैठा कर वो चली गईं और शिव जी इससे अनभिज्ञ थे। पार्वती जी से मिलने में श्रीगणेश को अपना विरोधी मानकर शिवजी ने उनका सिर काट दिया था। जब सत्यता का आभास हुआ तो अपने गणो को उन्होंने आदेश दिया की उस पुत्र का सिर लाओ जिसकी ओर उसकी माता की पीठ हो। शिव-गणो को एक हाथी का पुत्र जब इस दशा में मिला तो वो उसका सिर ही ले आए और शिव जी ने हाथी का सिर उस बालक के सिर पर लगाकर बालक को पुनर्जीवित कर दिया। मान्यता है कि यह घटना भाद्रमास की चतुर्थी को हुई थी इसलिए इसी दिन को भगवान श्रीगणेश का जन्म दिवस माना जाता है। भगवान गणेश जो कि सभी देवताओं में प्रथम पूज्य व अग्रणी हैं। यदि हम श्रद्धा व विधि-विधान से गणेश जी स्थापना कर पूजन करते हैं तो हमारे जीवन की समस्त समस्यायें, बाधाओं का अन्त होता है और हमें सौभाग्य, समृद्धि व सुखों की प्राप्ति होती है। गणेश प्रतिमा की स्थापना व पूजा विधि का विशेष ध्यान रखा जाता है। प्रातःकाल स्नानादि से निवृत्त होकर घर में सोने, तांबे, मिट्टी या गाय के गोबर की प्रतिमा बनाई जाती है। इसके बाद एक कोरा कलश लेकर उसमें जल भरकर कोरे कपड़े से बांधकर कलश स्थापना कर गणेश प्रतिमा की स्थापना करनी चाहिए। भगवान श्रीगणेश को पुष्प, दूर्वा, धूप, दीप, कपूर, लाल मौली, चंदन, मोदन शमी के पत्ते व सुपारी इत्यादि सामग्री एकत्रित कर व्यवस्थित करना चाहिए। तत्पश्चात् भगवान श्रीणेश का ध्यान कर षोडशोपचार से विधिपूर्वक पूजन करना चाहिए। इसके बाद गडाधिप, उमापुत्र, अघनाशक, विनाशक, ईशपु, सर्वसिद्धपुत्र, एकदंत, इभवक्म, मूषकवाहन नाम लेकर श्रीगणेश जी का आहवान करना चाहिए। भगवान श्रीगणेश को अर्घ, आचमन, स्नान, वस्त्र, गंध और पुष्पादि से पूजन कर धूप, नैवेद्य, आचमन, पान और दक्षिणा के बाद आरती करना चाहिए एवं उन्हें सिर झुकाकर वंदन करना चाहिए। 'विघ्नानि नाशमायान्तु सर्वाणि सुरनायक। कार्यं मे सिद्धिमायातु पूजिते त्वयि धातरि', मंत्र से प्रार्थना करें। श्रीगणेश जी को अर्पित किया गया नैवेद्य सबसे पहले उनके सेवकों- गालव, गार्ग्य, मंगल और सुधाकर को देना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि गणेश चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन से बचना चाहिए। गणपति अथर्वशीर्ष के पाठ के साथ गणेश मंत्र - 'ॐ गणेशाय नमः' का जाप 108 बार करना चाहिए।
इस बार गणेश चतुर्थी का शुभ मुहुर्त इस प्रकार हैः-
गणेश चतुर्थी तिथि : 2 सितंबर 2019
गणेश विसर्जन तिथि : 12 सितंबर 2019
मध्यान्ह गणेश पूजा : दोपहर 11:05 से 01:36 तक
चंद्रमा न देखने का समय : सुबह 8:55 बजे से शाम 9:05 बजे तक

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