महामीडिया न्यूज सर्विस
ऋषि पंचमी आज

ऋषि पंचमी आज

Admin Chandel | पोस्ट किया गया 15 दिन 23 घंटे पूर्व
03/09/2019
भोपाल [ महामीडिया ] सावन मास यदि देवादिदेव महादेव को समर्पित है तो भाद्रपद मास में भी कई विशेष तिथियां आती है, जिन तिथियों पर देवी-देवताओं की आराधना कर उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है। गणेशोत्सव के दूसरे दिन ऐसी ही एक विशेष तिथि है जिसको महिलाएं विधि-विधान के साथ व्रत रखकर मनाती है। इस तिथि का नाम ऋषि पंचमी है और मान्यता है कि इस तिथि को व्रत, पूजा और कथा सुनने से माहवारी के दौरान लगने वाले दोष का निवारण होता है।ऋषि पंचमी की एक पौराणिक कथा प्रचलित है जिसके अनुसार विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक सर्वगुण संपन्न ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी बहुत पतिव्रता थी, उसका नाम सुशीला था। उस ब्राह्मण दंपति की दो संतानें एक पुत्र तथा एक पुत्री थी। विवाह योग्य होने पर ब्राह्मण दंपत्ति ने सुयोग्य वर के साथ कन्या का विवाह कर दिया। दुर्भाग्य से कुछ दिनों बाद वह विधवा हो गई। दुखी होकर ब्राह्मण दम्पति अपनी पुत्री के साथ गंगा तट पर कुटिया बनाकर रहने लगे।एक दिन ब्राह्मण पुत्री सो रही थी कि अचानक उसका शरीर कीड़ों से भर गया। पुत्री सुशीला ने सारी बात मां को बताई। मां ने पति से इसका कारण पूछा- हे पतिदेव! मेरी पुत्री की यह गति होने का क्या कारण है? उत्तंक ने समाधि के जरिए इस घटना का पता लगाकर बताया- पूर्व जन्म में भी हमारी पुत्री ब्राह्मणी थी। इसने रजस्वला होते ही बर्तन छू लिए थे। इस जन्म में भी इसने ऋषि पंचमी का व्रत नहीं किया। इसलिए इसके शरीर में कीड़े पड़ गए हैं।धर्म-शास्त्रों के अनुसार रजस्वला स्त्री पहले दिन चाण्डालिनी, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी तथा तीसरे दिन धोबिन के समान अपवित्र होती है और वह चौथे दिन स्नान करने के बाद शुद्ध होती है। यदि यह पवित्र मन से अब भी ऋषि पंचमी का व्रत करें तो इसके सारे दुख दूर हो जाएंगे और अगले जन्म में अटल सौभाग्य को प्राप्त करेगी। पिता की आज्ञा से पुत्री ने विधि- विधान से ऋषि पंचमी का व्रत एवं पूजन किया। इस व्रत के प्रभाव से वह सारे दुखों से मुक्त हो गई। अगले जन्म में उसे अटल सौभाग्य सहित सभी सुखों का भोग किया।ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार ऋषि पंचमी के दिन महिलाएं घर को स्वच्छ कर विधि विधान से सात ऋषियों के साथ देवी अरुंधती की स्थापना करती हैं। सप्त ऋषियों की हल्दी, चंदन, रौली, अबीर, गुलाल, मेंहदी, अक्षत, वस्त्र,फूलों आदि से पूजा करके उनसे माहवारी के दौरान के दोषों की क्षमा याचना करती है। पूरे विधि- विधान से पूजा करने के बाद ऋषि पंचमी व्रत की कथा सुनी जाती है इस दिन हल से जोते हुए अर्थात जमीन से उगने वाले अन्न को ग्रहण नहीं किया जाता हैं। व्रत में पसई धान के चावल खाए जाते हैं। माहवारी के समाप्त होने यानी वृद्धावस्था में इस व्रत का उद्यापन किया जाता है।इस साल ऋषि पंचमी 3 सितंबर मंगलवार को है। इस दिन शुभ मुहूर्त सुबह 11 बजकर 5 मिनट से दोपहर 1 बजकर 36 मिनट तक रहेगा। यानी महिलाएं इस अवधि के दौरान 2 घंटे 31 मिनट तक पूजा और कथा को सुन सकती हैं।

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